........... श्री मन्महा गणाधिपतये नम: ...........
..... हे गणपति ! आपका हम स्वकार्य सिद्धि हेतु आव्हान करते हैं. आप सबकी
प्रार्थना सुनने वाले हैं. जितने संसार के गण हैं आप सबके स्वामी हैं .
विद्वानों के भी आप विद्वान् हैं. आप सब ब्रह्मवेत्ताओं में ज्येष्ठ हैं.
आप हमारे ह्रदय रूपी आसन में आकर विराजमान हो....
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.....भगवान् गजानन की मान्यता भारतवर्ष में प्राचीन समय से चली आ रही है ,
स्मार्त (गृहस्थ ) उपासना में भी श्री गणेश जी की गणना की जाती है .
यजुर्वेद में भी ' गणानान्त्वा गणपति हवामहे ...' इत्यादि मन्त्र में गणपति
का अर्थ ग्रहण किया गया है , यद्यपि वेद भाष्यकार ' उव्वट महीधर ' ने इस
मन्त्र का अर्थ प्रकरणानुसार अश्व किया है , तथापि ' यास्क मुनि ' के
कथनानुसार तप से वेद मन्त्रों के अनेकार्थ हो जाते हैं . ऐसा सिद्धांत होने
से गणपतिपरक अर्थ की संभावना में कोई संदेह नहीं किया जा सकता .
..... अवैदिक जैन पंथ और बौद्ध पंथ में भी गणेश की मान्यता को स्वीकार किया गया है .
..... बहुत से लोगो का मानना है कि गणेश पूजा अनार्यों से आर्यों में आयी , यह कथन सर्वथा अप्रामाणिक है .
..... नेपाल, तिब्बत , कम्बोडिया , जापान , चीन , मंगोल आदि देशों में भी
गणेश प्रतिमाएं मिली है , जिससे गणेश उपासना की व्यापकता सिद्ध होती है ,
और गणेश का वैज्ञानिक रूप व उपासना क्रम भारतवर्ष से ही इन देशों में गया
है , क्योंकि ' मनु जी ' ने कहा है कि ...
..... एतद्देश प्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मन:| स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरंपृथिव्याम सर्व मानवा:||
..... इस देश में पैदा हुए अग्रजन्मा के द्वारा ही संसार के सभी देशों के
लोगों ने ज्ञान प्राप्त किया है. इसलिए इस गणेश विज्ञान को अनार्यों से
सीखने का कोई प्रमाण नहीं है ...
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----- महाकवि कालीदास ने ' चिदगगन चन्द्रिका ' में श्री गणेश जी के आविर्भाव के सम्बन्ध में लिखा है ......
..... सर्वप्रथम चिद्शक्ति से स्फुरित होता हुआ क्षीर समुद्र पौर्णमासी
चन्द्र के समान जो निस्तरंग स्फुरित हो रहा है , जहां कि इस चिद्व्योम में
नादतत्व का फैलाव हो रहा है , जो तेजोमयी बिन्दुमाला धारण किये हुए हैं ,
आदि शिवशक्ति का स्पंद जिनका स्वरुप है , ॐ कार रूपी शुण्ड से जिनकी
क्रियाशक्ति प्रकट हो रही है , दन्त जिनके मुख से निकला हुआ है , शक्ति से
उत्पन्न होने वाले जो गणेश है वे हमारे क्लेशों को दूर करें...
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..... आप सभी मित्रों के लिए यहाँ पर " श्री श्वेतार्क गणपति ' की दो
दुर्लभ प्रतिमाएं दर्शनार्थ प्रस्तुत कर रहा हूँ , इसमें से एक प्रतिमा में
अभिमंत्रित होते समय ही एक ' नागदेव' आकर लिपट गए थे ...मानो आदिदेव
महादेव ने स्वयं अपने गण को आशीर्वाद देने भेज दिया हो....दर्शन लाभ करें
...श्री महागणपति आपकी मनोकामनाएं पूर्ण करें...
..... आपका ' विजय '
.....भगवान् गजानन की मान्यता भारतवर्ष में प्राचीन समय से चली आ रही है , स्मार्त (गृहस्थ ) उपासना में भी श्री गणेश जी की गणना की जाती है . यजुर्वेद में भी ' गणानान्त्वा गणपति हवामहे ...' इत्यादि मन्त्र में गणपति का अर्थ ग्रहण किया गया है , यद्यपि वेद भाष्यकार ' उव्वट महीधर ' ने इस मन्त्र का अर्थ प्रकरणानुसार अश्व किया है , तथापि ' यास्क मुनि ' के कथनानुसार तप से वेद मन्त्रों के अनेकार्थ हो जाते हैं . ऐसा सिद्धांत होने से गणपतिपरक अर्थ की संभावना में कोई संदेह नहीं किया जा सकता .
..... अवैदिक जैन पंथ और बौद्ध पंथ में भी गणेश की मान्यता को स्वीकार किया गया है .
..... बहुत से लोगो का मानना है कि गणेश पूजा अनार्यों से आर्यों में आयी , यह कथन सर्वथा अप्रामाणिक है .
..... नेपाल, तिब्बत , कम्बोडिया , जापान , चीन , मंगोल आदि देशों में भी गणेश प्रतिमाएं मिली है , जिससे गणेश उपासना की व्यापकता सिद्ध होती है , और गणेश का वैज्ञानिक रूप व उपासना क्रम भारतवर्ष से ही इन देशों में गया है , क्योंकि ' मनु जी ' ने कहा है कि ...
..... एतद्देश प्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मन:| स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरंपृथिव्याम सर्व मानवा:||
..... इस देश में पैदा हुए अग्रजन्मा के द्वारा ही संसार के सभी देशों के लोगों ने ज्ञान प्राप्त किया है. इसलिए इस गणेश विज्ञान को अनार्यों से सीखने का कोई प्रमाण नहीं है ...
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----- महाकवि कालीदास ने ' चिदगगन चन्द्रिका ' में श्री गणेश जी के आविर्भाव के सम्बन्ध में लिखा है ......
..... सर्वप्रथम चिद्शक्ति से स्फुरित होता हुआ क्षीर समुद्र पौर्णमासी चन्द्र के समान जो निस्तरंग स्फुरित हो रहा है , जहां कि इस चिद्व्योम में नादतत्व का फैलाव हो रहा है , जो तेजोमयी बिन्दुमाला धारण किये हुए हैं , आदि शिवशक्ति का स्पंद जिनका स्वरुप है , ॐ कार रूपी शुण्ड से जिनकी क्रियाशक्ति प्रकट हो रही है , दन्त जिनके मुख से निकला हुआ है , शक्ति से उत्पन्न होने वाले जो गणेश है वे हमारे क्लेशों को दूर करें...
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..... आप सभी मित्रों के लिए यहाँ पर " श्री श्वेतार्क गणपति ' की दो दुर्लभ प्रतिमाएं दर्शनार्थ प्रस्तुत कर रहा हूँ , इसमें से एक प्रतिमा में अभिमंत्रित होते समय ही एक ' नागदेव' आकर लिपट गए थे ...मानो आदिदेव महादेव ने स्वयं अपने गण को आशीर्वाद देने भेज दिया हो....दर्शन लाभ करें ...श्री महागणपति आपकी मनोकामनाएं पूर्ण करें...
..... आपका ' विजय '