Showing posts with label धार्मिक जानकारी. Show all posts
Showing posts with label धार्मिक जानकारी. Show all posts

Wednesday, June 25, 2014

सनातन धर्म की स्थिति क्या है ? सोचो और समझो ...

..... एक विवाद जो हमें आभास कराता है कि वर्तमान समय में सनातन धर्म की स्थिति क्या है ? आज हमारे ही देश में सनातन धर्म के सर्वोच्च पद पर विराजमान हमारे धर्मगुरु अनंत श्री विभूषित स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती के लिए जो व्यवहार हो रहा है वह भविष्य में किस बात का सूचक है . उनके पुतले जलाए जा रहे हैं , उनके लिए अपमानजनक शब्दों का खुलेआम प्रयोग किया जा रहा है . सनातन धर्मियों का एक बड़ा समूह ही अपने पुरोधा के खिलाफ उठकर खड़ा हो गया है . इसका क्या कारण हो सकता है ? इस पर विचार करना अति आवश्यक है .
..... वास्तव में देखा जाय तो पिछले काफी समय से सनातन धर्मियों को नेतृत्व ही नहीं मिला , कोई सनातन धर्मियों को यह बताने वाला ही नहीं है कि वास्तव में चार धामों का महत्व हमारे जीवन के लिए कितना महत्वपूर्ण है , कोई आम सनातनी को यह बताने वाला नहीं है कि आखिर यह शंकराचार्य कौन है , इनका हमारे धर्म में क्या स्थान है ? 
.....अगर सनातन धर्मियों को यह बताया जाता कि ' आदि गुरु शंकराचार्य जी ने सनातन धर्म का पुनरोद्धार किया था , उन्होंने मात्र ८ वर्ष की अवस्था में गृह त्याग कर संन्यास की ओर प्रस्थान किया था . उन्होंने शंकर दिग्विजय की थी . काशी में मूर्धन्य विद्वान् मंडन मिश्र , जिनके यहाँ के तोता मैना भी वेदपाठ करते थे उन्हें परास्त किया था , यहाँ तक कि मंडन मिश्र की पत्नी द्वारा शास्त्रार्थ किये जाने पर कामशास्त्र के प्रश्न आने पर दुविधा में पड़ते हुए परकाया प्रवेश भी किया था,  और वह भी तब के समय में जब न तो यातायात साधन इतने सहज थे , न संचार व्यवस्था थी ...तो  आज यह स्थिति न होती.  हमारा कोई भी धर्म गुरु ऐसा नहीं है जो आम हिन्दू मानस के सामने आकर उसको एकता का पाठ पढाता हो , सोने चांदी के सिंहासन  पर आरूढ़ हमारे धर्म गुरु स्वयं राजनीतिज्ञों के दामन में पनाह पाते है , अपने ए .सी. मठों से बाहर निकलते हैं तो केवल पूंजीपति सेठों के यहाँ जाकर विश्राम करते हैं , जबकि आज साधन कहीं अधिक हैं , तब यह हाल है ...और आपको ज्ञात होना चाहिए जिस धर्म के गुरुजन ही आम जनता के बीच नहीं आयेंगे वह जनता अपने स्वाभिमान की जंग कैसे लड़ पायेगी , वह तो भटक कर किसी साईं , औलिया , पीर , फ़कीर , संत , कथा वाचक , दरगाह और मजारों में  जायेगी ही . बावजूद इसके हिन्दू अपने को मजबूत बनाए है तो सिर्फ अपने बूते .....
.....धर्म का सही स्वरुप तक आम जनमानस को बताने वाला कोई नहीं है , धर्म के नाम पर कथाये , चुटकुले , सुनाये जाते हैं , सनातन धर्मी कैसे आर्थिक और आध्यात्मिक रूप से मजबूत हो इसकी बात कौन कर रहा है आज, कोई पानी के बताशे खिला कर जनता के कष्ट हर रहा है , कोई होली खेल रहा है .....
.....आम हिन्दू ( सनातन धर्मी) बहुत धर्म भीरु होता है , वह अपने संतों के विषय में श्रद्धा भाव रखना चाहता है , रखता है , किन्तु वह हमारे धर्मगुरु बदले में आम हिन्दू को क्या दे रहे है .
.....एक बात स्पष्ट कर दूं कि मैं कोई धर्म गुरु नहीं हूँ , मैं भी एक आम इंसान हूँ , लेखक हूँ ,सिर्फ इन समस्यायों का  निदान जो है उसकी तरफ ध्यान केन्द्रित करने की बात है , अगर एक सम्प्रदाय के धर्म गुरु अपने अनुयायियों के बीच आते है तो दूसरे धर्म गुरुओं का क्या फर्ज बनता है , क्या उन्हें अपने अनुयाइयों के बीच नहीं आना चाहिए ... मूल प्रश्न यह है .... 
.......... धर्म और राष्ट्र के प्रति सजग न रहना , मूर्खता , कायरता और स्वार्थलोलुपता की अभिव्यक्ति है. ..... आज टी. वी. पर कुछ धर्माधीशों की बात मैं ध्यान से सुन रहा था , उनमें से अधिकतर अपनी निजी खुन्नस निकालते नजर आये . एक सामान्य बात जो सबने कही वह यह कि सभी धर्म एकेश्वरवाद की बात कहते है , और सनातन धर्म कहता है कि सभी की भावनाओं का आदर करो , सभी का सम्मान करो , जिसकी जो इच्छा हो वह उसकी पूजा करे , कोई किसी भी भगवान को मान सकता है आदि आदि , आश्चर्य इस बात का है कि ऐसा बयान कुछ प्रतिष्ठा प्राप्त , दंडी सन्यासियों ने भी दिया , जिन्हें ' नारायण स्वरुप ' माना जाता है
.....अब इस पर मेरा मानना है कि सर्वप्रथम यह धर्माधीश यह जान ले कि धरती पर धर्म केवल एक है , वह है ' सनातन '...बाकी सब पंथ है . इसलिए सनातन धर्म की तुलना किसी पंथ से नहीं की जा सकती .

..... धर्म की सरल व्याख्या ( 'पंथ, 'मत' , 'मजहब' एवं ' रिलीजन ' में भेद) ..... ' धर्म ' शब्द की व्याख्या करना अत्यधिक कठिन कार्य है . हमारे सद्-ग्रंथों, धर्म-शास्त्रों तथा गुरुजनों ने अनेक प्रकार से 'धर्म' की परिभाषा लिखने का प्रयास किया है . भारतीय संस्कृति में ' धर्म ' शब्द की व्याख्या करना उतना ही कठिन है जैसे कि ' ब्रह्म ' शब्द की व्याख्या करना . ' छान्दोग्योपनिषदः ' में ' धर्म ' की तीन शाखाएँ मानी गयी हैं :-
..... १- यज्ञ , अध्ययन एवं दान अर्थात ( गृहस्थ धर्म).
..... २- तपस्या अर्थात तापस धर्म .
..... ३- ब्रह्मचारित्व अर्थात आचार्य के घर में रहकर उच्चतम ज्ञान-प्राप्ति एवं उच्च चरित्र निर्माण .
..... 'धर्म' शब्द का अर्थ विधि की भांति समय समय पर परिवर्तित होता रहा है , किन्तु शनैः -शनैः यह मानव के विशेषाधिकारों , कर्तव्यों एवं तत्संबंधी बंधनों का द्योतक , भारतीय समाज के सदस्यों की आचार्य-विधि का परिचायक एवं वर्णाश्रम का द्योतक हो गया .
..... स्मृतिकारों ने 'धर्म' के पाँच स्वरुप माने हैं :-
..... १- वर्ण-धर्म .
..... २- आश्रम धर्म .
..... ३- वर्णाश्रम धर्म.
..... ४- नैमित्तिक धर्म.
.... ५- गुण-धर्म .
..... जैमिनी ऋषि के अनुसार वेदों में प्रयुक्त अनुशासनों के अनुसार ही 'धर्म' है. 'धर्म' का सम्बन्ध उन क्रिया-संस्कारों से है , जिनसे आनंद मिलता है और जो वेदों द्वारा प्रेरित , प्रमाणित और प्रशंसित हैं.
..... अनेक परिभाषाओं को देखते हुए निष्कर्ष निकलता है कि " धर्म वही है जिसका आचरण करने से आनंद , बहुजन सुखाय -बहुजन हिताय एवं नि:श्रेयस की सिद्धि, सनातन संस्कृति का पोषण एवं स्वानुभूति सुख की उपलब्धि होती है .
..... मेरा उक्त विचार और अनुभव ग्रंथों के स्वाध्याय एवं स्वयं के अनुभव पर आधारित हैं .
..... 'धर्म' अनेक ऋषि-मुनियों , अवतारों, और वेदों द्वारा प्रतिपादित हुआ है . 'धर्म' किसी व्यक्ति विशेष द्वारा नहीं चलाया गया है .
..... जबकि दूसरी ओर 'पंथ' किसी व्यक्ति विशेष अथवा किसी 'धर्म - ग्रन्थ के द्वारा प्रवर्तित हुए हैं. ' पंथ ' का प्रादुर्भाव किसी धर्म विशेष के आयाम में ही होता है .
..... 'मत' , 'मजहब' एवं ' रिलीजन ' निश्चित रूप से किसी व्यक्ति -विशेष के द्वारा ही प्रवर्तित होते हैं .

.....रह गयी बात साईं के चमत्कारों की तो ऐसे चमत्कारी संत हमारे यहाँ बहुत हुए हैं , आज एक सज्जन टी वी पर कह रहे थे कि साईं का शरीर शांत होने के बाद उनका शव तीन दिन इसलिए रखा रहा कि हिन्दू उसका दाह संस्कार करना चाहते थे , और मुसलमान उनको दफनाना चाहते थे , तब साईं के एक शिष्य को स्वप्न आया जिसमें साईं ने कहा मेरी समाधि बना दो ..अब यहाँ दो बाते हैं कि साईं के तत्कालीन भक्तों में भी आपस में सामंजस्य और सद्भाव की कमी थी ...और साईं के उपदेशों का उन पर कोई प्रभाव नहीं हुआ था , साईं उनमें आत्मतत्व नहीं जगा पाए थे , और वह उनके अनंत विलीन होने के बाद भी आपस में झगड़ रहे थे ..और दूसरी बात यदि स्वप्न को चमत्कार माने तो कबीर दास जी की तो मृतदेह ही गायब हो गयी थी , केवल फूल बचे थे , अब बताइये भला कबीर के मंदिर क्यों नहीं बने . मीरा की देह गायब हो गयी थी , रैदास के चमत्कार 'मन चंगा तो कठौती में गंगा ' आज भी मुहावरे के रूप में प्रयोग होते हैं . कालजयी कृति रामायण के रचयिता बाल्मीकी , और रामचरित मानस के रचयिता तुलसी जी के मंदिर नहीं बने  .....
..... हकीकतन आम हिन्दू स्वभाव से धर्मभीरु होता हैं जिधर भीड़ चलती है उधर ही चल देता है . अभी अधिक समय नहीं बीता है , लगभग ४० वर्ष पूर्व , एक शक्ति संतोषी माता की बहुत भक्ति होने लगी थी , अब धीरे धीरे शांत हो गयी ... काफी दिन वैभव लक्ष्मी जी का भी बोलबाला रहा , यहाँ तक कि लगभग ४० वर्ष पूर्व ' स्टोव देवता ' का लोग आवाहन करते थे , उस पर तुर्रा यह कि स्टोव देवता वहीं आयेंगे जहां प्रभात कंपनी का स्टोव होगा ...क्या कहेंगे इसे ...कानपुर में देखते देखते कई शनि मंदिर बन गए और सब अतिक्रमण करके बने , जहां पीपल का पेड़ दिखा वहाँ रातोंरात शनि मंदिर बन गए , और जनाब ! शनिवार के दिन वहाँ कई लीटर तेल के दीपक जल जाते है , जाने कितने लोहे के छल्ले बिक जाते हैं , और उन मंदिरों के बनाने वालों का यदि इतिहास खंगाला जाय तो क्या कहूं ...
..... जब अंग्रेजों ने भारत में सडकों के किनारे पीले रंग के मील पत्थर लगवाए तो कुछ समय बाद उन्हें हनुमान जी की प्रतिष्ठा प्राप्त हुई लोग उन मील पत्थरों की पूजा करने लगे , उनमें सिन्दूर पॉट कर लाल कपडे से ढका जाने लगा ...
....कभी कभी देखने को मिलता है , बन्दर की मौत पर लोग सड़क किनारे एक बोरा बिछा कर बन्दर की देह लिटा देते हैं, और उसे माला आदि पहना देते हैं ,  और चंद घंटों बाद वहाँ हजार दो हजार  रूपये एकत्र हो जाते हैं और उस बन्दर को लेजाकर कहीं दफना दिया जाता है ...तो यह है हमारा शाइनिंग इण्डिया ..... 
..... अब समय आ गया है कि हमारे धर्म गुरु अपने कवच से बाहर निकालें और जनता को सनातन धर्म की विभूतियों , उसके सार्वभौमिक गुणों से अवगत कराये , पूंजीपतियों और ए. सी. मठों के मोह से परे रहकर , आदि गुरु शंकराचार्य की तरह सम्पूर्ण विश्व में सनातन धर्म की पताका फहराएं . 
 ' यतो धर्मस्य ततो जय: ' अर्थात जहां धर्म है वहीं जय होती है ...
.....अत: मेरे विचार से सनातनियों को धैर्य से विचार करना चाहिए कि वास्तव में सत्यता क्या है , कहीं हम भ्रम में तो नहीं है.....

Thursday, May 1, 2014

..... भगवान परशुराम जयन्ती पर एक रहस्यमय प्रसंग ...

..... भगवान परशुराम जयन्ती पर एक रहस्यमय प्रसंग ...
..... अक्सर लोग प्रश्न उठाते हैं कि ब्राह्मण होकर भी भगवान् परशुराम में क्षत्रियोचित गुण का आधिक्य क्यों था ?
..... एक क्षत्रिय राजा थे , उनके केवल एक पुत्री संतान थी . उनके राज्य में एक ' ऋचीक ' नाम के ऋषि रहते थे . राजा ने ऋषि से निवेदन करके अपनी पुत्री का विवाह उनसे कर दिया . विवाह के पश्चात राजा की पत्नी ने अपनी पुत्री ( ऋषि पत्नी ) से कहा कि हे ! पुत्री जब आपके पति अपने लिए पुत्र की कामना से यज्ञ करें तो इनसे निवेदन करके मेरे लिए भी एक पुत्र का वरदान मांग लेना , पुत्री ने कहा ठीक है .
.....कालान्तर में जब ऋषि ने पुत्र की कामना से यज्ञ किया तो इनकी पत्नी ने अपनी माता का सन्देश उन्हें दिया .
..... ऋषि ने कहा एवमस्तु . तत्पश्चात ऋषि ने दो हांडी में खीर पकाई , और एक हांडी अपनी पत्नी को दी और कहा कि यह खीर तुम बरगद के वृक्ष के नीचे जाकर खा लेना , और यह दूसरी हांडी की खीर अपनी माता को दे देना और कहना कि वे पीपल के वृक्ष के नीचे बैठ कर यह खीर खा लें .
..... ऋषि पत्नी ने विचार किया कि , माता के घर चलकर दोनों लोग खीर खायेंगे .
..... जब वह माता के घर पहुँची तो माता ने कहा कि पुत्री तुम्हारे तो और भी पुत्र हो जायेंगे , मेरे केवल यही एक होगा , और तुम्हारे पति ने अपने लिए श्रेष्ठ पुत्र की कामना से खीर बनायी होगी , अत: हम लोग खीर आपस में बदल लेते हैं .
..... ऋषि पत्नी ने यह बात मान ली , और खीर की हांडी बदल कर ऋषि पत्नी ने माता वाली खीर पीपल के नीचे , और माता ने ऋषि पत्नी वाली खीर बरगद के नीचे खाली .
.....कालान्तर में दोनों गर्भवती हुई , ऋषि ने जब अपनी पत्नी का मुख और शरीर देखा तो कहा कि कुछ बदलाव है और उन्होंने खीर वाली बात पूछी , तब ऋषि पत्नी ने सब सही बता दिया . तब ऋषि बोले यह तो बड़ा अनर्थ हो गया , क्योंकि मैंने आपकी माता के लिए क्षत्रिय गुण-धर्म से विभूषित खीर बनायी थी और आपके लिए ब्राह्मण गुण-धर्म से विभूषित , ऐसा सुन कर ऋषि पत्नी दुखी हो गयी , और बोली इस बात से मुक्ति कैसे मिले .
.....तब ऋषि ने कहा कि अब मैं कुछ नहीं कर सकता , तब ऋषि पत्नी ने विलाप शुरू कर दिया .
.....अंत में ऋषि ने कहा कि , जो मैंने अपने तपोबल से खीर बनायी थी उसका असर तो समाप्त नहीं होगा , लेकिन मैं ऐसा कर सकता हूँ , इस पीढी में तो हमारे यहाँ ब्राह्मण गुण-धर्म से विभूषित पुत्र होगा , और आपकी माता के यहाँ क्षत्रिय गुण-धर्म से विभूषित पुत्र होगा , किन्तु अगली पीढी में वह गुण-धर्म बदल जाएगा और अपने यहाँ जो हमारा पौत्र होगा वह क्षत्रिय गुण -धर्म वाला , और आपकी माता के यहाँ उनका पौत्र ब्राह्मण गुण-धर्म वाला होगा ...ऋषि पत्नी ने कहा ठीक है ऐसा मुझे स्वीकार है .
..... इसी के फलस्वरूप राजा के यहाँ ' गाधि ' नामक पुत्र हुए , और ऋषि के यहाँ ' जमदग्नि ' हुए और अगली पीढी में गाधि के पुत्र 'विश्वामित्र ' हुए जो ब्रह्म बल की प्राप्ति के लिए सदैव प्रयत्नशील रहे , और ब्राह्मणोंचित गुण धर्म वाले थे ...और ऋषि पुत्र जमदग्नि के यहाँ परशुराम जी का जन्म हुआ जो क्षत्रिय गुण-धर्म वाले थे....
...... यह एक पौराणिक कथानक है , याद आ गया, सो आज श्री परशुराम जयन्ती के शुभ अवसर पर लिख दिया....
..... जय परशुराम...

Monday, September 9, 2013

" श्री श्वेतार्क गणपति '


........... श्री मन्महा गणाधिपतये नम: ...........
..... हे गणपति ! आपका हम स्वकार्य सिद्धि हेतु आव्हान करते हैं. आप सबकी प्रार्थना सुनने वाले हैं. जितने संसार के गण हैं आप सबके स्वामी हैं . विद्वानों के भी आप विद्वान् हैं. आप सब ब्रह्मवेत्ताओं में ज्येष्ठ हैं. आप हमारे ह्रदय रूपी आसन में आकर विराजमान हो....
----------------------------------------------------------------------
.....भगवान् गजानन की मान्यता भारतवर्ष में प्राचीन समय से चली आ रही है , स्मार्त (गृहस्थ ) उपासना में भी श्री गणेश जी की गणना की जाती है . यजुर्वेद में भी ' गणानान्त्वा गणपति हवामहे ...' इत्यादि मन्त्र में गणपति का अर्थ ग्रहण किया गया है , यद्यपि वेद भाष्यकार ' उव्वट महीधर ' ने इस मन्त्र का अर्थ प्रकरणानुसार अश्व किया है , तथापि ' यास्क मुनि ' के कथनानुसार तप से वेद मन्त्रों के अनेकार्थ हो जाते हैं . ऐसा सिद्धांत होने से गणपतिपरक अर्थ की संभावना में कोई संदेह नहीं किया जा सकता .
..... अवैदिक जैन पंथ और बौद्ध पंथ में भी गणेश की मान्यता को स्वीकार किया गया है .
..... बहुत से लोगो का मानना है कि गणेश पूजा अनार्यों से आर्यों में आयी , यह कथन सर्वथा अप्रामाणिक है .
..... नेपाल, तिब्बत , कम्बोडिया , जापान , चीन , मंगोल आदि देशों में भी गणेश प्रतिमाएं मिली है , जिससे गणेश उपासना की व्यापकता सिद्ध होती है , और गणेश का वैज्ञानिक रूप व उपासना क्रम भारतवर्ष से ही इन देशों में गया है , क्योंकि ' मनु जी ' ने कहा है कि ...
..... एतद्देश प्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मन:| स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरंपृथिव्याम सर्व मानवा:||
..... इस देश में पैदा हुए अग्रजन्मा के द्वारा ही संसार के सभी देशों के लोगों ने ज्ञान प्राप्त किया है. इसलिए इस गणेश विज्ञान को अनार्यों से सीखने का कोई प्रमाण नहीं है ...
----------------------------------------------------------------------
----- महाकवि कालीदास ने ' चिदगगन चन्द्रिका ' में श्री गणेश जी के आविर्भाव के सम्बन्ध में लिखा है ......
..... सर्वप्रथम चिद्शक्ति से स्फुरित होता हुआ क्षीर समुद्र पौर्णमासी चन्द्र के समान जो निस्तरंग स्फुरित हो रहा है , जहां कि इस चिद्व्योम में नादतत्व का फैलाव हो रहा है , जो तेजोमयी बिन्दुमाला धारण किये हुए हैं , आदि शिवशक्ति का स्पंद जिनका स्वरुप है , ॐ कार रूपी शुण्ड से जिनकी क्रियाशक्ति प्रकट हो रही है , दन्त जिनके मुख से निकला हुआ है , शक्ति से उत्पन्न होने वाले जो गणेश है वे हमारे क्लेशों को दूर करें...
----------------------------------------------------------------------
..... आप सभी मित्रों के लिए यहाँ पर " श्री श्वेतार्क गणपति ' की दो दुर्लभ प्रतिमाएं दर्शनार्थ प्रस्तुत कर रहा हूँ , इसमें से एक प्रतिमा में अभिमंत्रित होते समय ही एक ' नागदेव' आकर लिपट गए थे ...मानो आदिदेव महादेव ने स्वयं अपने गण को आशीर्वाद देने भेज दिया हो....दर्शन लाभ करें ...श्री महागणपति आपकी मनोकामनाएं पूर्ण करें...
..... आपका ' विजय '

Saturday, September 7, 2013

यह कितनी विडम्बना है ...

..... मेरे आत्मीय मित्रों ! जय महाशक्ति ...
..... आज आपसे एक बहुत गंभीर चर्चा करने जा रहा हूँ , पिछले कुछ वर्षों से धर्म और ज्योतिष के क्षेत्र में कुछ ऐसा बदलाव आया है जिसके कारण इन विषयों से आम जनमानस का विश्वास कम होने लगा है ...
..... अक्सर फेसबुक पर भी यन्त्र , मंत्र , तंत्र , ज्योतिष , पराविज्ञान , काला जादू , लालकिताब , रावण संहिता , भृगुसंहिता आदि अत्यंत गूढ़ विषयों पर भी आधी अधूरी जानकारी देखने को मिलती है....
..... भूत , प्रेत , पिशाच , जिन्न , चुड़ैल , बैताल , ब्रह्म राक्षस , योगिनी , डाकिनी , शाकिनी आदि के विषय में भी भ्रान्तिपरक बातें आम जन जीवन में सुनने देखने को मिलती है . इन्हीं बातो को हौव्वा बना कर आम जनमानस को डरा कर उसका शोषण करने का सर्वत्र प्रयास होता रहता है ....जबकि इसकी हकीकत कुछ और है ....
..... यद्यपि इस तरह का कार्य करने वाले इन विषयों के कदापि जानकार नहीं होते , किन्तु फिर भी अपने वाणी और क्रियाकलापों से ऐसे लोग आम जनमानस का शोषण करने में कामयाब हो ही जाते है ....
..... कुछ बड़े बाबा टाइप जीवधारी भी काला जादू , या तंत्र मन्त्र की आड़ में अपना वर्चस्व बनाने में कामयाब होते है ...
..... एक दिन ' श्री पुष्कर व्यास जी' ने एक प्रश्न फेसबुक पर किया था कि , ' बृहस्पति ' का एक नाम ' जीव' भी है , यह नाम कैसे और कब पडा , इस प्रश्न के उत्तर कई ज्योतिषी बंधुओं ने स्वविवेक से दिए , किन्तु उनमें से एक भी उत्तर सही नहीं था ....? यह कितनी विडम्बना है ...
..... अब ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि इस आभासीय और वास्तविक जगत में यह कैसे जाना जाय कि जो ज्योतिषीगण इसका व्यावसायिक उपयोग कर रहे हैं , उन्हें ज्योतिष जैसे गूढ़ विषय का वास्तविक ज्ञान है भी या नहीं ...
..... जिन मन्त्रों के विषय में लिख रहे है उन मन्त्रों का वैज्ञानिक रूप क्या है , और वह कौन सी विधियां है जिनसे मन्त्र प्रभावशाली हो कर अपना असर दिखाते हैं...क्या हर मन्त्र हर व्यक्ति को लाभ करेगा ? क्या इसका कोई रास्ता निकाला जा सकता है ...? क्या किसी पुस्तक से पढ़कर इन मन्त्रों का प्रयोग किया जाना उचित है ? बहुत से प्रश्न है ...यह एक महत्वपूर्ण विषय है ....
..... ..... सोशल मीडिया अब काफी ताकतवर हो चुका है , मैं सोच रहा हूँ कि इसी के जरिये मैं आम जनमानस और अपने मित्रों को इन विषयों की वास्तविकता बताऊँ , ताकि वे किसी के द्वारा गुमराह न किये जा सके , और अपने उत्थान के लिए स्वत: वे ऐसे आसान उपाय और उनकी विधियां जान सके , जिससे वास्तव में उनके जीवन में सही मार्गदर्शन हो सके ...और वह अपना आत्मिक , मानसिक , आर्थिक उत्थान स्वयं कर सकें ...
..... मेरे आत्मीय मित्रों क्या उचित रहेगा ? क्या मुझे ऐसा करना चाहिए...? आपकी क्या सलाह है ....?

Tuesday, September 3, 2013

......... महापुराण .........

..... मेरे आत्मीय बंधुओं ! यथोचित अभिवादन ...
..... फेस बुक पर बहुत समय से यह विवाद चला आ रहा है कि ' विष्णु ( श्री मद्भागवत ) भागवत महा पुराण है या देवी भागवत ...? वैष्णव श्री मद्भागवत को महापुराण और शाक्त देवी भागवत को महापुराण मानते है ... दोनों में एक के मत से एक महापुराण और दूसरा उप पुराण है ...वास्तव में पुराणों की गणना में कहीं भी इस तरह का उल्लेख नहीं है . गणना में केवल ' भागवत ' शब्द आया है ...
--------------------------------------------------------------------
......... महापुराण .........
अठारह पुराणों को बताने के लिए यह श्लोक है ...
.....मद्वयं भद्वयं चैव ब्रत्रयं व चतुष्टकम | अनापलिंगकूस्कानि पुराणानि पृथक पृथक ||
..... अर्थात -मद्वयं = मार्कंडेय , मत्स्य . भद्वयं = भागवत , भविष्य . चैव ब्रत्रयं = ब्रह्माण्ड , ब्रह्म , ब्रह्मवैवर्त . व चतुष्टकम = विष्णु , वामन, वाराह , वायु ( शिव ) | अनापलिंगकूस्कानि = अग्नि , नारद , पद्म , लिंग , गरुड़ , कूर्म , स्कन्द .पुराणानि पृथक पृथक || यह अठारह महापुराण है ...
--------------------------------------------------------------------
.....उप पुराण....
..... १- आदि पुराण , २- नरसिंह पुराण, ३- स्कन्द पुराण , ४- शिवधर्म पुराण , ५- दुर्वासा पुराण , ६- नारदोक्त पुराण , ७- कपिल पुराण , ८- वामन पुराण , ९- औशनस पुराण , १०- ब्रह्माण्ड पुराण , ११- वरुण पुराण , १२- कालिका पुराण , १३- माहेश्वर पुराण , १४ - साम्ब पुराण , १५- सौर पुराण , १६- पाराशर पुराण , १७ - मारीच पुराण , १८- भास्कर पुराण ...
--------------------------------------------------------------------
..... औप पुराण .....
..... १- सनत्कुमार पुराण , २- बृहन्नारदीय पुराण , ३- आदित्य पुराण , ४- मानव पुराण , ५- नंदिकेश्वर पुराण , ६- कौर्म पुराण , ७- भागवत पुराण , ८- वशिष्ठ पुराण , ९- भार्गव पुराण , १०- मुदगल पुराण , ११- कल्कि पुराण , १२-देवी पुराण , १३- महाभागवत पुराण , १४- बृहत्धर्म पुराण , १५- परानंद पुराण , १६- पशुपति पुराण , १७- वन्हि पुराण , १८- हरिवंश पुराण ...

Friday, July 12, 2013

' पूर्ण ब्रह्म ' की सोलह कलाएँ '

..... कहते हैं कि ' पूर्ण ब्रह्म ' की सोलह कलाएँ हैं | उन सोलह कलाओं के नाम इस प्रकार हैं....
..... १- भद्र - भजनीयता.
..... २- समाप्ति - समस्त गुणों की पराकाष्ठा .
..... ३- आभूति - जड़-चेतनात्मक जगत का प्रादुर्भाव .
..... ४- सम्भूति - संरक्षा .
..... ५- भूतं - संहार .
..... ६- सर्वं - परिपूर्णता.
..... ७- रूप- इन्द्रिय-जन्य अनुभूति का आधार .
..... ८- अपरिमित - मन-वाणी -बुद्धि से अगम्य .
..... ९- श्री - आश्रयणीय गुणों का एकमात्र केंद्र .
..... १०- यश- समस्त प्रशंसाओं का एकमात्र पात्र .
..... ११- नाम - समस्त नामों का एकमात्र आधार .
..... १२- उग्र- समस्त चेष्टाओं का एकमात्र केंद्र .
..... १३- सजाता - समस्त शक्तियों का एकमात्र सहज प्रस्थान .
..... १४- पय: - पञ्च महाभूतों के कलात्मक सम्मिश्रण का आवास .
..... १५- महीया - महत्तमा माया का एकमात्र आधार .
..... १६- रस- समाधि-लब्ध आनंदोद्रेक का एकमात्र आवास .
..... यह पूर्ण ब्रह्म की सोलह कलाएँ कही जाती हैं .......