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Monday, September 24, 2018

पितृ पक्ष का आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक महत्व

पितृ पक्ष का आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक महत्व
    आश्विन कृष्णपक्ष प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तक ऊपर की रश्मि तथा रश्मि के साथ पितृप्राण पृथ्वी पर व्याप्त रहता है। श्राद्ध की मूलभूत परिभाषा यह है कि प्रेत और पितर के निमित्त, उनकी आत्मा की तृप्ति के लिए श्रद्धापूर्वक जो अर्पित किया जाय वही श्राद्ध है। मृत्यु के बाद दशगात्र और षोडशी-सपिण्डन तक मृत व्यक्ति की प्रेत संज्ञा रहती है। सपिण्डन के बाद वह पितरों में सम्मिलित हो जाता है।
    पितृपक्ष में पुत्र या उसके नाम से उसका परिवार जो यव (जौ) तथा चावल का पिण्ड देता है, उसमें से रेतस् का अंश लेकर वह चन्द्रलोक में अम्भप्राण का ऋण चुका देता है। ठीक आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से वह चक्र ऊपर की ओर होने लगता है। 15 दिन अपना-अपना भाग लेकर शुक्ल प्रतिपदा से उसी रश्मि के साथ रवाना हो जाता है। इसीलिये इसको पितृपक्ष कहते हैं। अन्य दिनों में जो श्राद्ध तथा तर्पण किया जाता है, उसका सम्बन्ध सूर्य की उस सुषुम्ना नाड़ी से रहता है, जिसके द्वारा श्रद्धारश्मि मध्यान्हकाल में पृथ्वी पर आती रहती है और यहाँ से तत्तत् पितर का भाग ले जाती है, परन्तु पितृपक्ष में जितने पितृप्राण चन्द्रमा के ऊर्ध्व देश में रहते है, वे स्वतः चन्द्रपिंड की परिवर्तित स्थिति के कारण पृथ्वी पर व्याप्त रहते हैं। इसी कारण पितृपक्ष में तर्पण और श्राद्ध का इतना अधिक माहात्म्य है।
    प्रत्येक शरीर में आत्मा तीन रूप में व्याप्त है-1. विज्ञानात्मा, 2. महानात्मा, 3. भूतात्मा। विज्ञानात्मा (उसे कहते हैं जो) गर्भाधान से पहले स्त्री पुरूष में सम्भोग की इच्छा प्रकट करता है। वह रोदसी मण्डल से आता है। रोदसी मण्डल पृथ्वी से 27 हजार मील की दूरी पर स्थित है। महानात्मा चन्द्रलोक से पुरूष के शरीर में 28 अंशात्मक रेतस् बनकर आता है, उसी 28 अंश रेतस् से पुरूष पुत्र पैदा करता है। भूतात्मा माता द्वारा खाये गये अन्न के रस से बने वायु द्वारा गर्भ पिण्ड में प्रवेश करता है। उसे वायु में अहंकार का ज्ञान होता है। उसी को प्रज्ञानात्मा तथा भूतात्मा कहते हैं। यह भूतात्मा पृथ्वी के सिवा अन्य किसी लोक में नहीं जा सकता। मृत प्राणी का महानात्मा स्वजातीय चन्द्रलोक में चला जाता है। चन्द्रलोक में उस महानात्मा से 28 अंश रेतस् माँगा जाता है, क्योंकि चंद्रलोक से 28 अंश लेकर ही वह उत्पन्न हुआ था। इसी 28 अंश रेतस् को पितृऋण कहते हैं। 28 अंश रेतस् के रूप में श्रद्धा नामक मार्ग से भेजे जाने वाले पिण्ड तथा जल आदि के दान को ही श्राद्ध कहते है। इस श्राद्ध नामक मार्ग का सम्बन्ध मध्यान्हकाल में पृथ्वी से होता है। इसीलिए मध्यान्हकाल में श्राद्ध करने का विधान है। पृथ्वी पर कोई भी वस्तु सूर्यमण्डल तथा चन्द्रमण्डल के सम्पर्क से ही बनती है। संसार में सोम सम्बन्धी वस्तु विशेषतः चावल और यव हैं। यव में मेधा की अधिकता है। धान और यव में रेतस् (सोम) का अंश विशेष रूप में रहता है। आश्विन कृृष्णपक्ष (पितृ पक्ष) में यदि चावल तथा यव का पिण्डदान किया जाय तो चन्द्रमंडल को 28 अंश रेतस् पहुँच जाता है। पितर इसी चन्द्रमा के ऊर्ध्व देश में रहते हैं, विदूर्ध्वलोके पितरो वसन्तः स्वाधः सुधादीधित मामनन्ति। (गोलाध्याय)।
    धर्मशास्त्र का निर्देश है कि माता-पिता आदि के निमित्त उनके नाम और गोत्र का उच्चारण कर मंत्रों द्वारा जो अन्न आदि अर्पित किया जाता है, वह उनको प्राप्त हो जाता है। उन्हें गन्धर्वलोक प्राप्त होने पर भोग्यरूप में, पशुयोनि में तृणरूप में, सर्पयोनि में वायु रूप में, यक्षयोनि में पेयरूप में, दानवयोनि में मांसरूप में, प्रेतयोनि में रूधिररूप में, और मनुष्यरूप में अन्न आदि के रूप में उपलब्ध होता है।
    जब पितर यह सुनते हैं कि श्राद्धकाल उपस्थित हो गया है तो वह एक दूसरे का स्मरण करते हुए मनोमय रूप से श्राद्धस्थल पर उपस्थित हो जाते हैं और ब्राह्मणों के साथ वायु रूप में भोजन करते हैं। यह भी कहा गया है कि जब सूर्य कन्या राशि में आते हैं तो पितर अपने पुत्रों पौत्रों के यहाँ आते हैं। विशेषतः आश्विन अमावस्या के दिन वह दरवाजे पर आकर बैठ जाते हैं। यदि उस दिन उनका श्राद्ध नहीं किया जाता तो वह शाप देकर लौट जाते हैं। अतः उस दिन पत्र-पुष्प, फल और जल तर्पण से यथाशक्ति उनको तृप्त करना चाहिए। श्राद्ध से विमुख नहीं होना चाहिए। कन्या गते सवितरि पितरो यान्ति वै सुतान्। अमावस्या दिने प्राप्ते गृहद्वारं समाश्रिताः। श्राद्धाभावे स्वभवनं शापं दत्वा व्रजन्ति ते।।
    मुख्यतः श्राद्ध दो प्रकार के है। पहला एकोद्दिष्ट और दूसरा पार्वण, लेकिन बाद में चार श्राद्धों को मुख्यता दी गई। इनमें पार्वण, एकोद्दिष्ट, वृद्धि और सपिण्डीकरण आते हैं। आजकल यही चार श्राद्ध समाज में प्रचलित हैं। वृद्धि श्राद्ध का मतलब नान्दीमुख श्राद्ध है। श्राद्धों की पूरी संख्या बारह है- नित्यं नैमित्तिकं काम्य वृद्धिश्राद्ध सपिंडनम्। पार्वण चेति विज्ञेयं गोष्ठ्यां शुद्धयर्थष्टमम्।। कर्मागं नवमं प्रोक्तं दैविकं दशमं स्मृतमृ। यात्रा स्वेकादर्श प्रोक्तं पुष्टयर्थ द्वादशं स्मृतम्।।
    इनमें नित्यश्राद्ध, तर्पण और पंचमहायज्ञ आदि के रूप में, प्रतिदिन किया जाता है। नैमित्तिक श्राद्ध का ही नाम एकोद्दिष्ट है। यह किसी एक व्यक्ति के लिए किया जाता है। मृत्यु के बाद यही श्राद्ध होता है। प्रतिवर्ष मृत्युतिथि पर भी एकोद्दिष्ट ही किया जाता है। काम्य श्राद्ध, अभिप्रेतार्थ सिद्धर्य्थ अर्थात् किसी कामना की पूर्ति की इच्छा के लिए किया जाता है। वृद्धि श्राद्ध पुत्र जन्म आदि के अवसर पर किया जाता है। इसी का नाम नान्दी श्राद्ध है। सपिण्डनश्राद्ध मृत्यु के बाद दशगात्र और षोडषी के बाद किया जाता है। इसके बाद मृत व्यक्ति को पितरों के साथ मिलाया जाता है।
    प्रेतश्राद्ध में जो पिण्डदान किया जाता है, उस पिण्ड को पितरों को दिये पिण्ड में मिला दिया जाता है। पार्वण श्राद्ध प्रतिवर्ष आश्विन कृष्णपक्ष में मृत्यु तिथि और अमावस्या के दिन किया जाता है। इसके अतिरिक्त अन्य सभी पर्वों पर भी यह श्राद्ध किया जाता था। गोष्ठी श्राद्ध विद्वानों को सुखी समृद्ध बनाने के उद्देश्य से किया जाता था। इससे पितरों की तृप्ति होना स्वाभाविक है। शुद्धि श्राद्ध शारीरिक मानसिक और अशौचादि अशुद्धि के निवारण के लिए किया जाता है। कर्मांग श्राद्ध सोमयाग, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन आदि के अवसर पर किया जाता है। दैविक श्राद्ध देवताओं की प्रसन्नता के लिए किया जाता है। यात्राश्राद्ध यात्रा काल में किया जाता है। पुष्टिश्राद्ध धन-धान्य समृद्धि की इच्छा से किया जाता है।
    धर्मशास्त्रों में श्राद्ध के सम्बन्ध में इतने विस्तार से विचार किया गया है कि इसके सामने अन्य समस्त धार्मिक कृत्य गौण से लगने लगते हैं। शास्त्रकारों ने अपने पांडित्य और मनोविज्ञान का यत्परोनास्ति रूप प्रदर्शित किया है। जब घर में कोई नयी समृद्धि या मांगलिक उत्सव हो तो उस समय अपने स्वर्गीय जनों की याद आना नितांत स्वाभाविक है। जो कभी हमारे सुख, दुःख में सम्मिलत होते थे, उनकी स्मृति मिटाए नहीं मिटती। अतः यह इच्छा स्वाभाविक है कि वह अज्ञात लोक के वासी भी हमारे आनन्दोत्सव में सम्मिलित हों, शरीर से न सही, आत्मा से हमारे साथ रहें, अतः उनके प्रति श्रद्धावनत होना स्वाभाविक है। उनका शास्त्रीय मंत्रों द्वारा मानसिक आवाहन, पूजन ही श्राद्ध है।
    इस सत्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि मन की भावना बड़ी प्रबल होती है। श्रद्धाभिभूत मन के सामने स्वर्गीय आत्मा सजीव और साकार हो उठती है। श्राद्ध में माता-पिता आदि के रूप का ध्यान करना आवश्यक कर्तव्य निर्धारित किया गया है। लोगों का यह अनुभव है कि श्राद्ध के समय माता-पिता, पिता या किसी अन्य स्नेही की झलक दिखाई दी। आज का मनोविज्ञान भी श्राद्ध के इस सत्य के निकट पहुँचता जा रहा है।
    श्राद्ध के लिए जिन वस्तुओं की आवश्यकता होती है। उनपर भी शास्त्रों में बहुत विचार किया गया है। कौन वस्तु कैसी हो, कहाँ से ली जाय, कब ली जाय। भोजन सामग्री कैसी हो, किन पात्रों में बनायी जाय, कैसे बनायी जाय। फल, साग, तरकारी आदि में भी कुछ अश्राद्धीय ठहरा दी गयी है। प्रत्येक वस्तु की शुद्धता और स्तर निर्धारित कर दिया है। पुष्प और चन्दन जो निर्धारित है, उन्हीं का उपयोग हो सकता है।
    इसके अलावा श्राद्ध में कैसे ब्राह्मणों को आमन्त्रित किया जाय, किस प्रकार किया जाय, कब किया जाय और निमन्त्रित ब्राह्मण निमन्त्रण के बाद किस तरह का आचरण करें, भोजन किस प्रकार करें, आदि सभी बातें विस्तार पूर्वक बतलायी गयी हैं। ब्राह्मणों को, उत्तम, मध्यम और अधम तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया है। निषिद्ध ब्राह्मणों की सूची बड़ी लम्बी है। शास्त्र का कठोर आदेश है कि अन्य किसी धार्मिक कार्य में ब्राह्मणों की परीक्षा न की जाय, पर श्राद्ध में जिन ब्राह्मणों को आमन्त्रित करना हो, उनकी परीक्षा अवश्य की जाय और परीक्षा आमन्त्रित करने के पूर्व की जाय, बाद में नहीं- न ब्राह्मणं परीक्षेत देवै कर्मणि धर्मवित्। पित्रये कर्मणि तु प्राप्ते परीक्षेत प्रयत्नतः।
    उशनाः - भोजनं तु निःशेषं कुर्यात् प्राज्ञः कथन्चन।
        अन्यत्र दध्नः क्षीराद्वा क्षौद्रात्सक्तुभ्य एव च।।
    उशना ने कहा है - बुद्धिमान व्यक्ति कभी निःशेष भोजन न करे। अर्थात्-थाली में कुछ अवश्य छोड़ दे। लेकिन दधि, दूध सहत और सत्तु को नहीं छोड़ना चाहिए।
    ब्राह्मे - न चाश्रु पातयेज्जातु    न शुष्कां गिरमीयेत्।
        न चोद्विक्षेत् भुन्जानान न च कुर्वीत मत्सरम्।।
    ब्रह्मपुराण में कहा है - आँसू को न गिरावे। न रूखी वाणी कहे। भोजन करते हुए ब्राह्मणों को न देखें और न मत्सर ( डाह, ईर्ष्या ) करे।
    यमः -- स्वाध्यायं श्रावयेत्सम्यक् धर्मशास्त्राणि चैव हि।
    यम ने कहा है -- वेद और धर्मशास्त्रों को अच्छी प्रकार से सुनावे।
    गोत्रस्य त्वपरिज्ञाने    कश्यपं गोत्रमुच्यते।
    तस्मादाह श्रुतिः सर्वाः प्रज्ञाः कश्यपसंभवाः।।
    वहीं पर चन्द्रिका में स्मृत्यन्तर का वचन है कि - गोत्र के अपरिज्ञान में कश्यप गोत्र कहा है। इसीलिए श्रुति ( वेद ) ने कहा है कि - जितनी प्रजा हैं वे सब कश्यप से पैदा हुई है। यह व्यवस्था उनके लिए है जिन्हें अपना गोत्र नहीं मालूम है।
    श्राद्ध किसी दूसरे के घर में, दूसरे की भूमि पर कभी न किया जाय। जिस भूमि पर किसी का स्वामित्व न हो, सार्वजनिक हो, ऐसी भूमि पर श्राद्ध किया जा सकता है। शास्त्रीय निर्देश है कि दूसरे के घर में जो श्राद्ध किया जाता है, उसमें श्राद्ध करने वाले पितरों को कुछ नहीं मिलता। गृह-स्वामी के पितर बलात् सब छीन लेते हैं - परकीय गृहे यस्तु स्वात्पितृस्तर्पयेद्यदि। तद्भूमि स्वामिनस्तस्य हरन्ति पितरोबलात्।।
    यह भी कहा गया है कि दूसरे के प्रदेश में यदि श्राद्ध किया जाय तो उस प्रदेश के स्वामी के पितर श्राद्धकर्म का विनाश कर देते हैं- परकीय प्रदेशेषु पितृणां निवषयेत्तुयः। तद्भूमि स्वामि पितृभिः श्राद्धकर्म विहन्यते।।
    इसीलिए तीर्थ में किये गये श्राद्ध से भी आठगुना पुण्यप्रद श्राद्ध अपने घर में करने से होता है-तीर्थादष्टगृणं पुण्यं स्वगृहे ददतः शुभे। यदि किसी विवशता के कारण दूसरे के गृह अथवा भूमि पर श्राद्ध करना ही पड़े तो भूमि का मूल्य अथवा किराया पहले उसके स्वामी को दे दिया जाय।
    मृतक की अन्त्येष्टि और श्राद्ध की जो व्यवस्था इस समय प्रचलित है, वह हमारे वेदों में वर्णित है। गृह्यसूत्रों में पितृयज्ञ अथवा पितृश्राद्ध का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। आश्वलायन गृह्मसूत्र की सातवीं और आठवीं कण्डिका में विस्तार पूर्वक श्राद्ध विधि वर्णित की गयी है, मूलतः वेदों में भी श्राद्ध और पिण्डदान का उल्लेख किया गया है। श्राद्ध में जो मंत्र पढ़े जाते हैं, उनमें से कुछ ये हैं अत्र पितरो मादमध्वं यथाभागमा वृषायध्वम। इस पितृयज्ञ में पितृगण हृष्ट हो और अंशानुसार अपना-अपना भाग ग्रहण करें। नम वः पितरो रसाय। नमो वः पितरो शोषाय। पितरों को नमस्कार ! बसन्त ऋतु का उदय होने पर समस्त पदार्थ रसवान हों। तुम्हारी कृपा से देश में सुन्दर बसन्त ऋतु प्राप्त हो। पितरों को नमस्कार ! ग्रीष्म ऋतु आने पर सर्व पदार्थ शुष्क हों। देश में ग्रीष्म ऋतु भलीभाँति व्याप्त हो।
    इसी प्रकार छहों ऋतुओं के पूर्णतः सुन्दर, सुखद होने की कामना और प्रार्थना की गयी है। यह भी कहा गया है कि पितरों, तुम लोगों ने हमको गृहस्थ (विवाहित) बना दिया है, अतः हम तुम्हारे लिए दातव्य वस्तु अर्पित कर रहे हैं।
    वेदों के बाद हमारे स्मृतिकारों और धर्माचार्यों ने श्राद्धीय विषयों को बहुत व्यापक बनाया और जीवन के प्रत्येक अंग के साथ सम्बद्ध कर दिया। मनुस्मृति से लेकर आधुनिक निर्णय सिन्धु, धर्मसिन्धु तक की परम्परा यह सिद्ध करती है कि इस विधि में समय समय पर युगानुरूप संशोधन, परिवर्धन व परिवर्तन होता रहा है। नयी मान्यता, नयी परिभाषा, नयी विवेचना और तदनुरूप नई व्यवस्था बराबर होती रहती है। दुर्भाग्य की बात यह है कि विदेशी आधिपत्य के बाद जब हिन्दु समाज पंगु हो गया, समाज का नियन्त्रण विदेशी पद्धति और विधि-विधान से होने लगा तो युग की आवश्यकता के अनुरूप नयी परिभाषा, व्यवस्था का क्रम भी अवरूद्ध हो गया, फलस्वरूप उपयोगितावादी मानव मन की तुष्टि अपने पुरातन संस्कारों से नहीं हो पा रहीं है और वह संस्कार विहीन होता जा रहा है। जीवित माता पिता, बंधु-बाधव भी आज मात्र उपयोगितावादी की कसौटी पर कसे जा रहे हैं, तब माता-पिता के प्रति आस्था, श्रद्धा और भक्ति की तो बात ही क्या ! इतना ही नहीं, हमारी आस्था स्वयं अपने घर से डिगती जा रही है। देश में व्याप्त समस्त अशान्ति, विक्षोभ, असंतोष, अनैतिकता आदि का मूल कारण यही है।  जब हम स्वयं अघोर नहीं है तो अघोराः पितरः सन्तु की कामना कैसे कर सकते है।
संकलन- ऋद्धि विजय त्रिपाठी  

Tuesday, July 31, 2018

सन् 2018 में शेयर बाजार को प्रभावित करने वाले विशिष्ट ग्रह योग
जनवरी
    मासारम्भ में शुक्र व बुध के प्रभावी होने से बाजार का रूख कुछ गरम रहेगा। मारूती, रिलायंस जीयो, अम्बूजा सीमेन्ट, बजाज फाइनेन्सरी, महिन्द्रा एण्ड महिन्द्रा, हुण्डई आदि के शेयर्स तेज होगें। परन्तु निवेशक शीघ्र फायदा उठायें यह अल्प कालिक योग है। माह के दूसरे सप्ताह प्रथम चार दिनों शुक्र का प्रभाव बना रहेगा अतः  टेक्सटाइल, नोकिया, सैमसंग, रिलायंस ग्रुप, बैक आफ बड़ौदा, एस.बी. आई, महिन्द्रा कोटक बैंक, व टाटाग्रुप आदि के शेयरों में मजबूती देखने को मिलेगी। इस सप्ताह के अंत में सूर्यदेव की मकर संक्रान्ति 30 मुहूर्ती साम्यर्घ पड़ेगी जो शेयर मार्केट में स्थिरता ले आयेगी यह समय खरीदारी का उपयुक्त समय है, बैकिंग, दवा आदि बनाने वाली कम्पनीयों के शेयर, रिलांयस जीयो, इलेक्ट्रानिक, ऐजुकेशन, कन्सट्रॅक्शन से जुड़ी कम्पनीयों, आई.टी., माइक्रोसाफ्ट, विप्रो, सोनी, टाटा ग्रुप मे निवेश करे लाभ होगा। तीसरे सप्ताह मे अमावस्या की वृद्धि होगी अतः बाजार में सभी शेयर्स मसलन रिलायंस, आई.सी.आई.सी.आई, विप्रो, पेंन्ट बनाने वाली कम्पनीयों आदि इण्डस्ट्री के शेयर्स, कोल्डडिं्रक कम्पनियां, निफ्टी, डाउजोन्स, नेरोलैक, काफी, सीमेन्ट बनाने वाली कम्पनियों के शेयर्स मशीनरी व कम्प्यूटर्स आदि बनाने वाली कम्पनियों के शेयर्स, इलेक्ट्रॉनिक कम्पनियों के शेयर्स,आदि के शेयर्स में काफी अच्छी मंदी होके तेजी देखने को मिलेगी निवेशक इस स्थिति का फायदा अवश्य उठायें यह एक लाभकारी निवेश होगा। मासान्त मे गुरू व शनि के प्रभाव से मार्केट मे मंदी आना प्रारम्भ हो जायेगी यदि आप चाहे तो इस समय से पूर्व ही अपने शेयर्स निकाल सकते है। स्मालकैप, मिडकैप, निफ्टी, न.एस.सी., के लगभग सेसेंक्स को प्रभावित करने वाले शेयर्स के भावों मे मंदी आपको देखने को मिलेगी।
    फरवरी
    मासारम्भ में सूर्य व मंगल के प्रभावित होने से पूरे सप्ताह खरीदारी का एक योग रहेगा रिलायंस ग्रुप के लगभग सभी शेयर्स, बैकिंग सेक्टर मे एस.बी.आई, एच.डी.एफ.सी., कोटक महिन्द्रा, ईन्डस्ईन्ड, आई.सी.आई., बैंक आफ बड़ौदा, आदि एवं बिरला सनलाइफ, टाटा, सीफी, आदि के भावों में तेजी आयेगी। विदेशी कम्पनीयों के शेयर्स मे भी वृद्धि होगी। दूसरे सप्ताह मे सूर्यदेव की कुम्भ संक्रान्ति सोमवारी पड़ रही है, अतः रिलांयस इण्डस्ट्रीज के सभी शेयर्स, सीमेन्ट कम्पनीयों के शेयर्स, सीप्ला, डाबर, टाटास्टील, वीडियोकॉन, आईडिया, भारती एयरटेल, हिण्डालको , टी कम्पनीयों के शेयर मंदे हो जायेगें। तीसरे सप्ताह मे राहु व केतु का दुष्प्रभाव मार्केट मे पड़ने से मंदी ही बनी रहेगी अतः मिडकैप व सेंसेक्स को प्रभावित करने वाली कम्पनीयों के शेयरों में भी बिकवाली की आशंका है। इसमें एक तरफा मुनाफा कमा लेना निवेशकों के लिये उचित रहेगा। अन्यथा ऊपर के भावों मे फंसे रहना पड़ सकता है। मासान्त मे शुक्र व बुध का अच्छा प्रभाव शेयर मार्केट पर पड़ेगा अतः मारूति, हाण्डा, डेल, कैडबरी, आटो मोबाइल, तेल से सम्बन्धित कम्पनियों के शेयर्स अमेरिकी और एशियाई शेयर बाजार संवेदी सूचकांक आधारित कम्पनियां सत्यम विप्रो सैमसंग वीडियोकान आदि के शेयर्स तेज होगे, वही बैंकिग मे पी.एन.बी., विजया, एच.डी.एफ.सी, एस.बी.आई., युनियन बैंक आदि मे भी तेजी आयेगी। अन्नादि पदार्थों में तेजी आयेगी। एच.सी.एल, ओरियन्टल, हिन्डाल्को, हिन्दुजा, जीयो, नेस्डैक, नेस्लें, कैडबरी, आदि कम्पनियों के शेयर्स में अच्छा सुधार होगा। आप इस सप्ताह निवेश कर सकते है।
मार्च
    मासारम्भ के प्रथम सप्ताह में शुक्र व मंगल के प्रभाव से शेयर बाजार में तेजी का असर होने से म्यूच्युअल फंड, बजाज आटो एवं फाईनेन्स, पार्लें, फूड इण्डस्ट्रीज, भवन निर्माण सामग्री बनाने वाली कम्पनीयों के शेयर्स आदि में अच्छी तेजी आयेगी। एल.जी, सैमसंग, हुंडई आदि के शेयरों में भी तेजी का अच्छा योग बनेगा। दुसरे सप्ताह मे गुरू के वक्री होने से कुछ शेयर्स मे तो अच्छी तेजी आयेगी परन्तु कुछ के भाव गिर जायेगें। तेजी बिड़ला ग्रुप के शेयर्स, टेली मार्केटींग, एन.डी.टी.वी., हिण्डाल्को, जीयो आदि मे रहेगी।ं टेक्सटाइल, वीडियोकान, सैमसंग, एल.जी, एल.आई.सी., हॉण्डा, बजाज आटो, आदि शेयर्स मंदे रहेंगे। इसके उपरान्त सूर्यदेव की मीन संक्रान्ति 14 को पड़ेगी अतः नेस्लें, टिस्को, एस.बी.आई, सत्यम आदि के भाव सम रहेंगे। बैंकिंग के शेयरों में हल्की मंदी आकर बाद में तेजी आयेगी। ता.14 से 23 को मार्केट मे खरीदारी का अवसर है, निवेश करें। मशीनरी, वाहन आदि से जुड़े शेयर्स काफी तेज होंगे। सूचना प्रौद्योगिकी, वी.एस.एन.एल., एम.टी.एन.एल, लाल व सफेद रंग के पदार्थों में अच्छी तेजी देखने को मिलेगी। मासान्त मे बुध के वक्री हो जाने से विदेशी मुद्रा में बढ़त, ब्याज दरें मंदी हागी, बैंकिंग सेक्टर मे भी मंदी का असर देखने को मिलेगा, बैंकें एफ डी आदि पर ब्याज दरें घटा देगी। होम लोन, कार लोन, व्यापारी लोन सस्ते होगें। आई.टी, इलेक्ट्रॉनिक पार्ट बनाने वाली सभी कम्पनीयों के शेयर्स में तेजी का योग बनेगा। अर्थ व्यवस्था चरमारने का पूरे अंदेशा बनेगा परन्तु कुछ अच्छे सुझावों से कार्य बनेगा। कुछ वस्तुओं पर टैक्स छुटने परन्तु कुछ पर अधिक टैक्स लगाये जाने की स्थितिया बनेगी। व्यापार जगत मे कुछ नई कम्पनीया जगह बना ले जायेगी।
अप्रैल
     मासारम्भ मे बुध वक्रावस्था मे उत्तरा भाद्रपद नक्षत्र के चतुर्थ चरण मे प्रवेश करेगा अतः अतः इस सप्ताह शेयरों में मन्दी का दौर चलेगा। सत्यम कम्प्यूटर, सोनी, हुण्डई, नोकिया, डेल, प्रकाश इण्डस्ट्रीज, टाटा ग्रुप के सभी शेयर्स व केमिकल्स नेरोलैक आई.सी.आई., रिलांयन्स ग्रुप, बजाज, टेल्को आदि कम्पनियों के शेयर्स गिर जायेगें। दुसरे सप्ताह मे सूर्य देव की मेष संक्रान्ति पड़ रही है अतः तेजी का योग बनेगा एल.जी.,डेल, भारती ऐयरटेल, सीप्ला, कैडबरी, गोडरेज, वोलटॉस, माइक्रोसाफ्ट, विप्रो, हीटाची, एशियाई कम्पनियां, प्लास्टिक की वस्तुएं बनाने वाली कम्पनियों के शेयर्स टेलीकाम एवं सौन्दर्य सामग्री उद्योग, लोहे एवं स्टील के उपकरण बनाने वाली कम्पनियों के शेयर्स मे किया हुआ निवेश लाभकारी रहेगा। ता. 15 को बुध माग्री होगा अतः कोल्डड्रिंक, सिगरेट चाय काफी नेरोलक आदि कम्पनियों के शेयर्स में सुद्दार होगा। वाहन केमिकल्स वित्तीय संस्थाओं के शेयर्स सामान्य रहेंगे पी.एन.बी, टाटा, जे.के.,ए.बी.एन.लॉयड, अविन्द मिल्स, बैंको मे सभी शेयर्स दवाई बनाने वाली कम्पनीयों के शेयर्स आदि के शेयर गिर जायेगें। मासान्त में मामूली गिरावट दर्ज की जाएगी। फूड इण्डस्ट्रीज, रेडीमेड गारमेन्ट्स कंपनियों के शेयर्स एवं सीमेन्ट तथा भौतिक वादी वस्तुओं को बनाने वाली कंपनियों के शेयर्स, वित्तीय शेयर्स, बैंक शेयर्स, जी-टीवी, टाटा-टी, रिलायंस के शेयर्स के भाव बढ़ेगें।
             मई
    मासारम्भ मे मकर के मंगल के प्रभावह होने के कारण शेयर बाजार हल्की मंदी का रूख तो दिखायेगा, परन्तु कुछ ही समय के उपरान्त बाजार में तेजी आयेगी परन्तु शेयर बाजार में अकस्मात् स्थिरता भी दिखाई दे सकती है। 8 से 13 तारीख मे बुध के प्रभावी होने के कारण रिलायंस इण्डस्ट्रीज, बिरला ग्रुप, विप्रो, डाबर, बैजनाथ, कोलगेट, आर.एस.पी.एल., फिल्म जगत से जुड़ी कम्पनीयों के शेयर्स, लारसेन, कोल इण्डिया, ब्रिटानिया,  डी.एल.एफ., हैवेल्स, हिंदुस्तान जिंक एवं मुख्यता सारी विदेशी कम्पनीयों के शेयर्स आदि में तेजी आयेगी। ता.14 को सूर्य देव की वृष संक्रान्ति पड़ेगी जिसके फलस्वरूप माह के तीसरे सप्ताह मे डाबर, रैनबैक्सी, मैरिको, एन.एच.पी.सी., ऑयल इण्डिया, सिप्ला, हिन्दुस्तान लीवर, पीडलाईट, पावरग्रिड, टेक महिन्द्रा आदि शेयरों में तेजी दिखाई देगी। ए.सी.सी, अम्बुजा सीमेंट, आई.पी.सी.एल, आई.बी.पी., इनफोसिस में कुछ उतार-चढ़ाव के मध्य बाजार में तेजी ही रहेगी। आटो मोबाइल, साफ्टवेयर से सम्बन्धित कम्पनियों में भी तगड़ी मंदी इस सप्ताह मे देखने को मिलेगी। मासान्त में बुद्द व सूर्य के मिले-जुले प्रभाव से दूर संचार, मीडिया, सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र से सम्बन्द्दित कम्पनियां, पुरानी अर्थव्यवस्था स जुड़े शेयरों में निवेश करना उचित है। स्टील, नेमलीन लाइट, व्यूजुअल, रिलायंस, एल.आई.सी.,आइ.सी.आई.सी.आई, यू.टी.आई, एच.डी.एफ.सी आदि के शेयर अच्छे उतार चढ़ाव के बाद तेजी ही लायेंगे। बैकिंग व रियल स्टेट से जुड़े शेयर्स गिरने की आशंका है।
जून
    मासारम्भ में शनिदेव अपनी वक्रावस्था मे प्रभावी रहेगें  अतः बाजार में तेजी का वातावरण दिखेगा, एच.सी.एल.टेक, कपड़े बनाने वाली कम्पनीयों के शेयर्स, बिरला सन लाईफ, रिलांयस जीयो, टिस्को, रिलायन्स, कम्प्यूटर, फूड इण्डस्ट्री शुगर इण्डस्ट्री औद्योगिक कम्पनियों के शेयर्स वित्तीय संस्थाओं के शेयर्स में तेजी आएगी। पेट्रोल, डीजल आदि के दाम भी बढ़ने की आशंका है। दुसरे सप्ताह मे चतुर्दशी का क्षय ऐप्पल, इन्टेल, माइक्रोसाफ्ट, विप्रो आदि में खासा तेजी देखने को मिलेगी, केमिकल्स गृहस्थ वस्तुओं को बनाने वाली कम्पनियों के शेयर्स, हिन्डाल्को हिन्दुजा एच.सी.एल. ओरिएन्टल, हिन्दुस्तान टेस्को, इण्डेन आदि कम्पनियों के शेयर्स में तेजी आयेगी। तीसरे सप्ताह मे नेप्च्यून के वक्री होने तथा सूर्यदेव की मिथुन संक्रान्ति पड़ने से मंदी आएगी,यह मंदी एन.एस.सी के मुख्य शेयर्स, आई.टी.सी. टेलीकॉम इण्डस्ट्री के शेयर्स में आयेगी। बिचौलिए बाजार में हावी रहेगें। बाजार में जबरदस्त उतार-चढ़ाव का माहौल रहेगा, कभी तेजड़िये तो कभी मंदड़िये हावी होंगे। मासान्त में मंगल के वक्री होने से साफ्टवेयर बनाने वाली, सीमेन्ट बनाने वाली, हेल्थ इक्युपमेन्ट बनाने वाली, कम्युटर गेम्स बनाने वाली, आटो मोबाइल सेक्टर, गोल्ट ज्वैलरी बनाने वाली   कम्पनियों के शेयर्स इस सप्ताह तेज होंगे। परन्तु इस सप्ताह कुछ कम्पनीयों के शेयर गिर भी जायेगें जिनमे बैंकिग सेक्टर, भवन निर्माण सामग्री, फनीर्चर, दवा, मशीनरी बनाने वाली कम्पनीया शामिल है।
जुलाई
    माह के पहले सप्ताह मे शुक्र के सिंह राशि मे प्रवेश होने से अधिकांश शेयरों में मंदी आने के उपरान्त तेजी आएगी। परन्तु बाजार के मूड को देखते हुए संस्थागत बिकवाली से अनिश्चितता का माहौल रहेगा। ए.सी.सी, अम्बुजा सीमेंट, श्री सीमेन्ट इन तीनो के शेयर आई.पी.सी.एल,कैडबरी, कोलगेट, कोल इण्डिया, टाटा पावर, अरविन्द मिल्स, नेस्लें, एस.बी.आई., एच.डी.एफ.सी. इनफोसिसनेट, ओरिएन्टल, हिन्डालको, हिन्दुजा, टिस्को, हिन्दुस्तान पेंटाफोर, इण्डेन आदि कम्पनियों के शेयर्स घट-बढ़ कर चलेंग अंत तेजी मे होगें। दूसरे सप्ताह मे गुरू के माग्री होने से अडानी पावर, अपोलो, अशोका लीलैण्ड, बाटा, बर्जर पेन्ट, भारत फोर्ज, भारत हैवी इलेक्ट्रीकल्स, कैस्ट्राल, बॉस, बायकॉन आदि के शेयर बढ़ेगें। तीसरे सप्ताह मे सूर्यदेव की कर्क संक्रान्ति बुद्दवासरीय पड़ेगी अतः सी.इ.एस.सी., आई.सी.आई बैंक, डालमिया भारत लिमिटेड, डीश टीवी, एक्साईड, जी.एम.आर., गोडरेज, ग्लेनमार्क, फार्मा, ईमामी लिमिटेड, आईसर मोटर्स, हेक्सावेयर, गुजरात स्टेट पेट्रोनेट, ईण्डियन बैंक, जे.एस.डब्लयू एनर्जी, जिन्दल स्टील आदि शेयर्स धीरे-धीरे बढ़ेगें। मासान्त मे बुध के वक्री होने से एल.एण्ड टी. जुबील्यन्ट फूड, जुबील्यन्ट लाईफ, एल.आई.हाउसिंग फाईनेन्स, मन्नापुरम फाईनेन्स, एम.आर.एफ., नैटको फार्मा, एन.एम.डी.सी., आयल एण्ड नेचुरल गैस, ओबेराय रियेलटी, एन.टी.पी.सी., आयुर्वेदिक दवायें बनाने वाली कम्पनी, सौन्दर्य प्रसाधन से जुड़ी कम्पनी, ईस्पात ईण्डस्ट्री, कन्ट्रक्शन ईण्डस्ट्री, कोल ईण्डस्ट्री, हेल्थ ईण्डस्ट्री आदि से जुड़ी कम्पनीयों के शेयर्स मे इस अंतिम सप्ताह मे तेजी देखने को मिलेगी। 
            अगस्त
    मासारम्भ में शुक्र के कन्या राशि मे प्रवेश करने से शेयर बाजार में उतार चढ़ाव के बाद अन्त में मंदी लायेगा सूचकांक(सेंसेंक्स) को प्रभावित करने वाले सारे शेयर्स के भाव गिरने लगेंगें। दूसरे सप्ताह मे हर्शल के वक्री हो जाने के कारण शेयर मार्केट मे आप इन शेयर्स मे निवेश करे मारूति, महिन्द्रा, जीयो, टाटा पावर, कैसट्राल, अपोलो    नेस्लें, आई.टी.सी., हिन्दुस्तान लिवर लिमिटेड, नोकिया, सिफी, भारती एयरटेल, हिन्डाल्को, इन्टेल, बैंकिग मे बैंक आफ इण्डिया, ईण्सईन्ड, देना, बी.ओ.बी., आई.सी.आई., कर्नाटका, युनियन, आदि।   तीसरे सप्ताह मे बुध के माग्री होने से मंदी पलटना शुरू होगी अधिकांश शेयर्स के भावों मे गिरावट देखने को मिलेगी। इसका खास असर सीमेन्ट कम्पनीयों, ऐजुकेशन सेक्टर से जुड़ी कम्पनीयों, आटोमोबाईल, आन लाईन ट्रेडिग करने वाली कम्पनीयों, मशीनरी से जुड़ी कम्पनीयों आदि मे देखने को मिलेगा। मासान्त में मंगल के माग्री होने से रिलांयस ग्रुप से जुड़े लगभग शेयर्स मंदे हो जायेगें, टाटा ग्रुप से जुड़े शेयर्स स्थिर हो जायेगें यह समय काफी समझदारी से निर्णय लेने वाला है। पिछले सप्ताह से चली आ रही मंदी मेडिकल, हार्डवेयर, बच्चों की वस्तुयें बनाने वाली कम्पनी, होम अपलायंस, कृषि के उपकरण बनाने वाली कम्पनीयों के शेयर्स, ट्रैवलिग सेक्टर से जुड़ी कम्पनीयों, लेदर ईण्डस्ट्रीज,  फाईनेन्स सेक्टर, बीमा करने वाली कम्पनीयों के शेयर्स, एच.पी., एच.सी.एल., वीप्रो, हुण्डई, नेस्लें, ब्रीटानीया काफी धीरे-धीरें पर तेज होगें। 
    सितम्बर
    मासारम्भ मे शुक्र का तुला राशि मे प्रवेश करेगा अतः बाजार धीमा रहेगा। ता.01 से लेकर 7 तक विदेशी कम्पनीयों, लेदर निर्यात से जुड़ी कम्पनीयों, खनन करने वाली कम्पनीयों एवं कम्यूटर के पार्ट बनाने वाली कम्पनीयों के शेयर्स मे गिरावट दर्ज की जायेगी,आई.टी, मेडिकल व ऐजुकेशन से जुड़ी कम्पनीयों के शेयर तेज होंगे इनमे निवेश करें। दुसरे सप्ताह शनि के माग्री होने का प्रभाव पड़ेगा मार्केट में अच्छा उतार-चढ़ाव देखने को मिलेगा परन्तु अंततः तेजी ही आयेगी कैडबरी, पार्ले, नेस्ले, कोल इण्डिया, टेफ्को, टाटा पावर, निफ्टी के मूख्य शेयर्स आदि के शेयरों में खासा उछाल देखने को मिलेगा, परन्तु इस सप्ताह बैकिंग सेक्टर, फाइनेन्स सेक्टर, बीमा करने वाली कम्पनीयों के शेयर्स गिर जायेगें। ता.17 को सूर्य देव की कन्या संक्रान्ति पड़ेगी, जिससे तेजी-मंदी का मिला जुला असर रहेगा। तेजी के रहते मंदी का एक झटका भी लगेगा इस बीच जो भी निवेश पड़े है उन्हे पड़ा रहने दें बाद मे बिकवाली करके लाभ अर्जित करें, इलेक्ट्रानिक उपकरण को बनाने वाली कम्पनीयों, वित्तीय कम्पनीयों, सप्लायर्स, एच.सी.एल. टेक, खाने पीने की वस्तुओं को बनाने वाली कम्पनीयों के शेयर्स में तेजी  आयेगी,मशीनरी, टेक्सटाइल, स्टेशनरी काफी, चाय आदि में भी तेजी ले आयेगा। मासान्त में निवेशक बैकिंग (एस.बी.आई., इण्डसईण्ड, कोटक बैंक, डी.बी.एस., आई.सी.आई.), टेलीकॉम (भारती एयरटेल, रिलायंस जीयो) एवं छोटे भाव के सभी शेयर्स मे निवेश करे ये सप्ताह लाभप्रद रहेगा। टेक्सटाइल, वीडियोकान, सैमसंग, माइक्रोसाफ्ट, रिलायंस ग्रुप से जुड़े सभी मुख्य शेयर्स, एल.आई.सी. लिमिटेड, टी.सी.एल, महिन्द्रा कोटक,टाटाग्रुप, टाटा टी, गोडरेज, ब्रिटानीया आदि शेयरों में मजबूती देखने को मिलेगी।
अक्टूबर
    मासारम्भ मे प्लूटो के माग्री होन से इंजीनियरिंग सेक्टर, आयॅल सेक्टर, टेक्सटाइल उद्योग, संचार मीडिया क्षेत्र से जुड़ी कम्पनियों, फैशन की वस्तुओं को बनाने वाली कम्पनीयों, हार्डवेयर, मशीनरी के पार्ट बनाने वाली कम्पनीयों के शेयर्स, मिडकैप, महिन्द्र एण्ड महिन्द्रा तथा लगभग सभी मोटर्स कम्पनियों के शेयरों मे वृद्धि होगी। बैंकिंग कम्पनियों के शेयरों में बिकवाली दबाव आने की आशंका है ये शेयर गिरेगें। दुसरे सप्ताह मे गुरू का वृश्चिक राशि मे प्रवेश होने से उपरोक्त सेक्टरों में एक बारगी बाजार नीचे भी आ सकता है, परन्तु बास, टी.एन.टी, पामोलिव, जुबिलीयन्ट, आटो स्टील पॉवर, मिड कैप, मेडिसिन से जुड़ी कम्पनियों, कन्ट्रक्शन सेक्टर, एयरलाईन्स, विदेशी कम्पनीयों के शेयर्स, वीप्रो, सीप्ला आदि तेज होगे पर कुछ समय के लिये। तीसरे सप्ताह मे सूर्यदेव की तुला संक्रान्ति पड़ने के कारण बाजार में हल्की गिरावट की आशंका प्रतीत होगी, शेयरों में स्पष्ट रूप से इस सप्ताह शेयर ब्रोकर बिकवाली का दबाव बनायेंगे परन्तु आपको हल्के धैर्य से निर्णय लेना है। पहले से पड़े हुए शेयर्स को रखकर चलना है। मासान्त मे शुक्र के प्रभावी हो जाने के कारण रिलायंस, बीमा कम्पनियां, इण्टरनेट से जुड़ी कम्पनियां, डाबर, ए.बी.एन. लायड,  डी.एस.ग्रुप, पामोलिव लिमिटेड, एल.आई.सी. लिमिटे, इनफोसिस, सिफी, नेस्ले, डेल, भेल आदि में अच्छी तेजी देखने को मिलेगी।
नवम्बर
    मासारम्भ मे मंगल के प्रभाव से बाजार में एक हल्का सा मंदी का लहरा आयेगा परन्तु वह स्थाई नहीं होगा मार्केट में तेजी कुछ समय बाद आने लगेगी, रिलायंस पावर, रिलायंस जीयो, रिलायंस इन्फ्रा, ए.बी.बी. लिमिटेड, ए.सी.सी. लिमिटेड, अजंता फार्मा, एशीयन पेन्ट, ईमामी, एक्साईड ईण्डसट्रीज, गेल, टिस्को, एस.बी.आई, सत्यम विदेशी बड़ी कम्पनियां, चाइनीज कम्पनियां, एच.सी.एल, हिन्डाल्को, रैनबैक्सी,इनफोसिस आदि कम्पनियों के शेयर्स में अच्छा सुधार होगा निवेशक खासा फायदा इन शेयर्स में उठा सकते हैं। दुसरे सप्ताह मे सूर्य के प्रभाव से सेंसेंक्स का प्रभावित करने वाले सभी शेयर्स के भाव एकाएक गिरते चले जायेंगे। अतः जो पहले तेजी के सौदे करके आये हैं उन्हें 16 तारीख के पूर्व बेचकर मन्दी में आ जायें तभी बेहतर रहेगा। इस सप्ताह में बाजार की गति ऊँचे और नीचे दोनों भावों में अच्छी देखने को मिलेगी। तारीख 16 को सूर्यदेव की वृश्चिक संक्रान्ति पड़ेगी, अद्दिकांश शेयरों में घटा-बढ़ी पूरे माह चलती रहेगी। औद्योगिक कम्पनियों के शेयर्स में विशेष उछाल आएगा,इस समय आप तेजी का लाभ उठा सकते है। वहीं मुख्य शेयरो के बढ़ने के कारण सेंसेक्स मे भी बढ़त दिखेगी। मासान्त में नेप्च्यून के माग्री होने से ए.सी.सी., अम्बूजा सीमेन्ट, बिलि्ंडग मैटिरियल बनाने वाली कम्पनीयों के बैंकों के शेयर्स आदि में अच्छी मजबूती देखने को मिलेगी। आप इस माह मे रिलांयस ग्रुप, टाटा ग्रुप, कैडबरी, नेस्लें हिण्डाल्कों, रैनबैक्सी मिडिया संचार कम्पनीयों के बैंकों के शेयर्स खरीद सकते है,लाभ होगा।
दिसम्बर
    मासारम्भ के प्रथम सप्ताह मे बुध के माग्री होन से बाजार का रूख कुछ गरम रहेगा, विशेषकर बैकिंग शेयर्स,स्टील,चाय,काफी तम्बाकू बैंक टेक्सटाइल मिल्स व आई.टी. शेयर्स में तेजी आएगी। अधिकांश शेयर्स में तेजी बनी रहेगी, हीरो टोयोटा, रिलायंस ग्रुप, हाण्डा, बजाज, सुजुकी, महिन्द्रा एण्ड महिन्द्रा, हुण्डई, मारूति, टाटा ग्रुप से जुड़े शेयर्स आदि तगड़ी तेजी का रूख दिखायेंगे। दुसरे सप्ताह मे गुरू के प्रभाव से मंदी का हल्का असर दिखा के तेजी आयेगी कुछ मध्यम गति से चलने वाले इन शेयर्स जैसे रैनबैक्सी, सैमसंग, विप्रो, आदित्य बिड़ला ग्रुप के शेयर्स, डी.एल.एफ., एच.सी.एल., हिंडाल्को, डा.रेडीस, कोल्डडिं्रक, डा.लैब्स अच्छे तेज हांगे। तीसरे सप्ताह मे सूर्य देव की धनु संक्रान्ति पड़ेगी अतः युनियन बैंक, विजया, व आई.सी.आई.,पी.एन.बी., आई.डी.बी.आई, एच.डी.एफ.सी, वीडीयोकॉन, न.टी.पी.सी.हिन्दुस्तान लीवर लिमिटेड, माइक्रोसाफ्ट, विप्रो, नोकिया, आईडीया, फेसबूक, एस.सी.एल., नेरोलैक, काफी, चाय बनाने वाली कम्पनियों के शेयर्स मशीनरी कम्प्यूटर्स आदि बनाने वाली कम्पनियों के शेयर्स, इलेक्ट्रानिक कम्पनियें के  शेयर्स, नोकिया, एल.जी., आदि के शेयर्स में काफी अच्छी तेजी देखने को मिलेगी निवेशक इस स्थिति का फायदा अवश्य उठायें यह एक लाभकारी निवेश है। मासान्त मे रिलायन्स आल ग्रुप, केमिकल्स, टाटाग्रुप, बैकिंग, हिदुस्तान जिंक, कोल ईण्डिया, पार्ले, गेल तेज होगें।
   नोटः- यद्यपि इस जन्त्री  में प्रत्येक लेख लिखते समय ज्योतिषशास्त्र को आधार मानकर लिखा गया है। फिर भी निवेशकों को एवं व्यापारियों को चाहिये वे बुद्धि से कार्य करें। किसी भी हानि के लिये सम्पादक-लेखक प्रकाशक कतई जिम्मेदार न होंगे। किसी भी विवाद का निपटारा कानपुर न्यायालय के अन्तर्गत मान्य होगा।
लेखक- पं. विजय त्रिपाठी ‘विजय’

Saturday, January 28, 2017

सन् 2017 में शेयर बाजार को प्रभावित करने वाले विशिष्ट ग्रह योग

जनवरी
    मासारम्भ में ता.03 को बुध अपनी वक्रावस्था मे मूल नक्षत्र के द्वितीय चरण मे प्रवेश करेगा,अतः यह स्थिति बिकवाली का एक अच्छा योग है, जिसके चलते सभी क्षेत्रों की कम्पनियों के शेयर पहले गिरेगें और कुछ समय मे बढ़ना शुरू होगें जेट एयर-लाईन्स, एस्सेल ग्रुप के शेयर्स, वीडियोकॉन, वोल्टास, टिस्को, एपटेक,रिलायंस, बिरला सनलाइफ, टाटा, सत्यम कम्प्यूटर, सिफी आदि के भावों में तेजी आयेगी। बैकिंग से जुड़े शेयर्स भी तेज होगें।   माह का पहला सप्ताह इसी प्रकार रहेगा। दूसरे सप्ताह मे बुध मार्गी होने के कारण शेयर मार्केट मे ठहराव आ जायेगा,अतः मिडकैप क्षेत्र के शेयरों में भी बिकवाली की आशंका है। इसमें एक बारगी मुनाफा कमा लेना निवेशकों के लिये उचित रहेगा, शेयर के भाव मिल जाने पर उन्हे निकाल देना उचित रहेगा। तीसरे सप्ताह मे संक्रान्ति का असर मार्केट मे रहेगा, सूर्यदेव की मकर संक्रान्ति ता.14 को 15 मुहुर्ती महर्घ पड़ रही है अतः आटो मोबाइल, मेटल मार्केट के शेयर्स अमेरिकी और एशियाई शेयर बाजार संवेदी सूचकांक आधारित कम्पनियां सत्यम विप्रो सैमसंग वीडियोकॉन आदि के शेयर्स तेज हो सकते हैं, वही बैंकिग मे आई.सी.सी.आई, एच.डी.एफ.सी., एस.बी.आई., विजया बैंक आदि तेज होगे। स्वदेशी कम्पनियां भी मार्केट मे अपने प्रभाव से शेयर्स को बढ़ाने मे कामयाब रहेगी। मासान्त में धनु के शनि के प्रभाव के चलते निवेशकां को चाहिए कि इन शेयर्स मे विषेश रूचि लें आई.पी.सी.एल, अरविन्द मिल्स, रिलांयस ग्रुप, कैडबरी, नेस्लें, एस.बी.आई., आई.बी.पी., इनफोसिसनेट, एसी.सी.सी., माइक्रोसाफ्ट ,स्मालकैप, मिडकैप, निफ्टी, सैमसंग, एल.जी टिस्को, कोल्ड डिं्रक्स, और मादक पदार्थ बनाने वाली कम्पनीयों से जुडे़ शेयर्स में अच्छी वृद्धि देखने को मिलेगी। 
फरवरी
    माह की 2 ता. में मंगल का उत्तराभाद्रपद नक्षत्र के तृतीय चरण मे प्रवेश हो जाने के कारण बाजार हल्की मंदी मे रूख मे रहेगा,परन्तु जल्द ही शेयर मार्केट में तेजी लौटने लगेगी, अतः माह के प्रथम सप्ताह मे बाहरी कम्पनियां भारतीय मार्केट में प्रवेश करेंगी जिसके फल स्वरूप क्रूड ऑयल के घटने से, पेट्रोल, डीजल आदि के दाम भी घट सकते हैं। विदेशी कम्पनीयों के शेयर्स इन्फोसीस इन्टेल, माइक्रोसाफ्ट, एवं तकनीकी उपकरण बनाने वाली कम्पनीयों के शेयर्स मे अच्छा उछाल देखने को मिलेगा। ता.12 को सूर्य देव की कुम्भ संक्रान्ति रविवासरीय 30 मुहुर्ती साम्यर्घ पड़ेगी अतः टेली मार्केट से जुड़ी कम्पनीयां, रिलायंस ग्रुप, रैनबैक्सी, रेडीज, टाटा ग्रुप, विप्रो, डाबर, बैजनाथ, बजाज, बिरला सनलाइफ, सत्यम कम्प्यूटर, (सिफी) आदि के भावों में मंदी दिखाकर तेजी आयेगी। माह के तीसरे सप्ताह मे बुध एवं मंगल का मिलाजुला प्रभाव पड़ेगा अतः बाजार को उठते-उठते अकस्मात् गिरायेगा। डाबर, रैनबैक्सी,, सिप्ला, हिन्दुस्तान लीवर, मैक्लीयाड्स कोर आदि शेयरों में मंदी दिखाई देगी। ए.सी.सी, अम्बुजा सीमेंट, आई.पी.सी.एल, आई.बी.पी., इनफोसिस में कुछ उतार-चढ़ाव के मध्य बाजार में तेजी रहेगी। आटो मोबाइल, साफ्टवेयर बनाने वाली कम्पनीयों से सम्बन्धित शेयर्स में अच्छी तेजी देखने को मिलेगी। मासान्त में बुध का कुम्भ मे प्रवेश सौन्दर्य प्रसाधन, खाद्य सामग्री बनाने वाली कम्पनीयां, फनीर्चर, घरेलु उपकरण बनाने वाली कम्पनीयां से जुड़े शेयरों में निवेश करना उपयुक्त। टेलीकॉम मार्केट, स्टील मार्केट, सीमेन्ट मार्केट, रिलायंस ग्रुप के शेयर्स, बिरला सनलाइफ, टाटा, सत्यम कम्प्यूटर, सिफी आदि के शेयर अच्छे उतार चढ़ाव के बाद तेजी ही आयेगी, धैर्य से निवेश करें।
                   मार्च
    मासारम्भ मे ही शुक्र के वक्री हो जाने के कारण शेयर मार्केट  उतार-चढ़ाव लेता हुआ चलेगा यह समय किसी एक निर्णनायक स्थिति का नही है, अतः आपने जो भी निवेश इस बीच किया है उसकी बिकवाली हेतु आपको इन्तजार करना पड़ेगा। बैंकिग से जुड़े हुये शेयर्स खासकर एस.बी.आई., ईलाहाबाद बैंक, देना बैंक, बैंक आफ इण्डीया एक्सीस बैंक, एच.डी.एफ.सी, आई.सी.आई. के शेयर्स में तेजी देखने को मिल सकती है। माह के दूसरे सप्ताह में सूर्य देव की मीन संक्रान्ति 30 मुहुर्ती साम्यर्घ पड़ेगी जिस कारण शेयर बाजार एकदम से बैठकर धीरे-धीरे उपर उठने की चाल बनेगी मार्केट मे मंदी का एक अच्छा दबाव दिखाकर धीरे-धीरे मार्केट बढ़ना शुरू होगा, सोनी, चायनीज मार्केट बजाज आटो, टाटा टी, गोडरेज, वोलटॉस, सैमसंग, नेस्ले, मैकडावल बी.एस.एन.एल.आईडिआ, भारती, सैमसंग, एल जी, जी न्यूज, स्टार ग्रुप, आई टी से जुड़े शेयर्स में एक अच्छी मंदी आकर मार्केट मे धीरे से बढ़त बनना शुरू होगी इस बीच यदि आप चाहे तो निवेश कर सकते है, परन्तु ध्यान रहे कि शेयर्स मे निवेश मंदी का इंतजार करके सही मौके में करना उचित निर्णय रहेगा, नीचे के भाव में शेयर्स लें। माह के तीसरे सप्ताह मे शुक्र के प्रभावी होने से भौतिक वादी वस्तुओं को बनाने वाली कम्पनीयॉ, सीमेन्ट बनाने वाली कम्पनीयॉ, कन्सटॅ्रक्शन का कार्य करने वाली कम्पनीयॉ, आयात एवं निर्यात करने वाली कम्पनीयॉ फैशन व सौन्दर्य प्रसाधन के प्रोडक्ट बनाने वाली कम्पनीयॉ अपने शेयर्स के भाव का उपर ले जाने मे कामयाब रहेगी। मासान्त मे बिरला ए.बी.एन. लायड, रिलायंस ग्रुप, रैनबैक्सी,टाटाग्रुप, सीमेन्ट,स्टील सेक्टर, फाइनेन्स कम्पनियों के शेयर्स, पेट्रोलियम, आयरन, संचार माध्यम, कम्युनिकेशन आदि कम्पनियों से जुड़े शेयर्स में मंदी देखने को मिलेगी।
                अप्रैल
    माह के शुरूआती दौर मे शनि के वक्री हो जाने के कारण मार्केट में खींचातानी हो जायेगी शेयर मार्केट दुतर्फा चलेगा, मार्केट का रूख देखते हुए  खरीदारी करते वक्त एक बात का विशेष खयाल रखें कि मार्केट में भाव नीचे आने पर घबड़ाये नही क्योकि मार्केट अपने भाव को कवर कर लेगा। तारीख 10 को बुध भी इस माह को वक्री हो रहा है, स्थिति में अतः मार्केट में हीरो पेय पदार्थों को बनाने वाली कम्पनीयॉ वाहन बनाने वाली कम्पनीया (टाटा, मारूति, टोयोटा, हुण्डई, महिन्द्रा हॉण्डा,बजाज, सुजुकी, टी.वी.एस., हीरो) टाटा टी, गोडरेज, वोलटॉस, सैमसंग, नेस्ले, मैकडावल आदि शेयर्स में तेजी का रूख दिखेगा। माह के मध्य मे सूर्यदेव की मेष संक्रान्ति 45 मुहुर्ती समर्घ पड़ेगी अतः सेंसेंक्स के सुचकांक मे अकस्मात् मंदी का एक समय आयेगा मार्केट द्दीरे-द्दीरे ऊपर जायेगा। मासान्त मे आयुर्वेदिक दवाई बनाने वाली कम्पनियों, बैंकिग सेक्टर, फिल्म बनाने वाली कम्पनियों, मशीनरी,  इलेक्ट्रानिक सेक्टर से जुड़ी कम्पनियों के शेयर्स बढ़ेगें।                                               मई
    मासारम्भ मे बुध के माग्री होने से मंदी रहेगी परन्तु यह माह विभिन्न ग्रहयोगों से तेजी प्रधान ही रहेगा, अतः मेडिसन टेल्को टिस्को, रिलायन्स ग्रुप, हिन्दुजा, हिन्दुस्तान लीवर लिमिटेड, प्रापर्टी लाइन से जुड़ी कम्पनीयों के शेयर्स, केमिकल्स आदि कम्पनियों के शेयर्स में विशेष उछाल आएगा। माह के दूसरे सप्ताह में सूर्यदेव की वृष संक्रान्ति 30 मुहुर्ती साम्यर्घ पड़ रही है,अतः शेयर मार्केट   नीचे आता दिखाई देगा। परन्तु आप विचलित न हों क्योंकि यह मंदी कुछ ही समय की है, इस बीच आप माइक्रोसाफ्ट, विप्रो, सैमसंग, एल. जी., ईरास, डॉ. रेडीज, जानसन एण्ड जानसन, अमेरिकी एवं एशियाई वित्तीय कम्पनियां, एस्सेल आदि शेयर्स मे  निवेश करें। माह के उत्तरार्ध मे बैंक सेक्टर, फाईनेन्स सेक्टर, व बीमा करने वाली कम्पनीयों के शेयर्स एल आई सी टेल्को हिन्दुस्तान लीवर केमिकल्स टाटा चाय व काफी, सीमेन्ट व इलेक्ट्रानिक्स कम्पनियों के शेयर्स में तेजी आयेगी। तेजड़ियों के लिये यह समय विशेष शुभ है। पुराने शेयर्स की बिकवाली कर सकते हैं।
जून
    मासारम्भ में ही शेयर-बाजार में अच्छी घटा-बढ़ी देखने को मिलेगी, विभिन्न ग्रह योगों के कारण झुकाव मन्दी की ओर ही रहेगा। ता.5 को मंगल, आर्द्रा नक्षत्र के प्रथम चरण में प्रवेश करेगा, अतः जेट एयर-लाईन्स, ईण्डीगों, टाटा ग्रुप से जुड़े शेयर्स  एस्सेल ग्रुप के शेयर्स, वीडियोकॉन, वोल्टास, टिस्को, एपटेक, ए.बी.एन., सिप्ला आदि के शेयर्स मे बाजार में अच्छी मंदी देखने को मिल सकती है। मेडिकल कम्पनियों के शेयरों में मन्दी का बोल-बाला रहेगा। इस समय तेजी के शेयर्स यदि आप लेना चाहते हैं, तो आई.टी से जुड़े शेयर्स व बैकिंग शेयर्स तथा मेडिकल, कम्पनियों के शेयर्स में तेजी का सौदा आप कर सकते है। तारीख 10 को गुरू के माग्री होने से मंदी का रूख दुसरे सप्ताह भी बना रहेगा। तीसरे सप्ताह मे सूर्य देव की मिथुन संक्रान्ति पड़ रही है, अतः बैंक, स्टील, मोटर्स, टेली उद्योग, मशीनरी, काफी, सीमेन्ट, केमिकल्स, कम्प्यूटर आदि कम्पनियों के शेयरों में उछाल आएगा। मंदड़िए कमजोर पड़ जाएंगे, तेजड़िये अच्छा लाभ कमा सकते हैं। औद्यौगिक कम्पनियों के शेयरों की खरीद से आगे अच्छा लाभ मिलेगा। अतः तेजी का सौदा करना लाभप्रद रहेगा। नेट, एच सी एल, ओरियन्टल, हिन्डालको, हिन्दुजा, हिन्दुस्तान, टेस्को, पेन्टाकोर, इन्डेज आदि कम्पनियों के शेयर्स में सुधार संभव है।                                 जुलाई
    मासारम्भ मे मंगल एवं शुक्र के शुभ प्रभाव से यह माह सामान्य लाभकारी है। शेयर बाजार में घटा-बढ़ी का पूर्ण योग है। पेट्रालियम, केमिकल्स, खाद्यान्न सामग्री बनाने वाली कम्पनियों के शेयर्स, आयुर्वेदिक दवाईयां को बनाने वाली कम्पनियों के शेयर्स के भाव बढ़ेंगे। सिगरेट, व अन्य मादक पदार्थ बनाने वाली कम्पनीयों  चाय काफी केमिकल्स धारा, नेरोलक आदि कम्पनियों के शेयर्स गिरेगें। ता.11 को मंगल पुनर्वसु नक्षत्र के चतुर्थ चरण मे कर्क राशि मे प्रवेश करेगा अतः बैंक, एल आई सी, टिल्को, रिलायन्स, विप्रो आई सी आई सी आई वित्तीस संस्थाओं की बिकवाली अधिकांश शेयरों के सूचकांक ऊपर की ओर बढ़ेंगे। खाद्य पदार्थ, कोल्डड्रिंक स्टील सीमेन्ट टेक्सटाइल केमिकल आदि कम्पनियों के शेयर्स में उछाल आयेगा। सूर्यदेव कि कर्क संक्रान्ति ता.16 का पड़ेगी अतः पिछले सप्ताह आयी तेजी का रूख कमजोर पड़ जायेगा। अचानक बाजार में स्थिरता का माहौल बन जाएगा। दूर संचार, स्टेशनरी, मेडिसन, चाय, टाटा गु्रप ,हिन्दुस्तान लीवर, वित्तीय कम्पनियों के शेयर्स में गिरावट दर्ज की जाएगी। जो कि मासान्त तक रहेगी।
                अगस्त
मासारम्भ में ग्रहों के अशुभ प्रभाव से अधिकांश शेयरों में गिरावट आयेगी। इस समय आपको धैर्य से काम लेना होगा।  रिलायन्स, टिस्को केमिकल्स, टाटाग्रुप, बैकिंग, एच.एम.टी., विजया बैंक, के.शेयरों, ए.बी.एन. लायड, गोदरेज, सैमसंग, एन.टी.पी.सी., एम.टी.एन.एल, एस्सेल ग्रुप, जी टी.वी. आदि शेयर्स मे अच्छी मंदी देखने को मिलेगी। खाद्यान्य, रसायन, बैंक, बीमा कम्पनियों के शेयर्स में घटा-बढ़ी का चांस मिलेगा। इसका लाभ तेजड़िये उठा सकते हैं। माह के दूसरे व तीसरे सप्ताह मे बुध के वक्री होने से सेंसेक्स में ज्यादा चाल देखने को तो नहीं मिलेगी पर विशेष कर मशीनरी, काफी, सीमेन्ट, केमिकल्स, बैंक, बीमा पालिसी, स्टील, सुगन्ध, खाद्य पदार्थ मद्रास सीमेन्ट, एम.टी.एन.एल., एन.आई.,आई.टी, रेमण्ड आदि  शेयर्स मे विशेष तेजी का रूख रहेगा। तीसरे सप्ताह मे सूर्यदेव कि सिंह संक्रान्ति पड़ेगी जो मार्केट को ठहरा देगी मार्केट सुस्त पड़ जायेगा अतः ये समय बहुत सोच समझकर निवेश करने वाला है, वाहन बनाने वाली कम्पनीयों के शेयर्स से गिरावट दर्ज की जोयेगी, मशीनरी, टेक्सटाइल, चाय, टेल्को, एल.एम.एल.स्टेशनरी, मेडिसिन, आदि कम्पनियों के शेयर्स में हल्का उछाल आएगा। तेजड़िए कुछ समय बाद ही मार्केट मे हावी होंगे, लेकिन एक बात का विशेष ख्याल रखें, सटोरियों को बहुत सतर्कता से व्यापार करना चाहिए। बाजार की चाल दुतर्फा होगी। चौथे अंतिम सप्ताह में शनि के माग्री होने से अद्दिकांश शेयरों का सूचकांक तेजी को द्दीरे-द्दीरे खत्म करते नजर आयेगें, इसके अतिरिक्त तकनीकी उपकरण बनाने वाली कम्पनीयों कम्प्यूटर, खाद्य पदार्थ बनाने वाली कम्पनीयों व गृहपयोगी वस्तुओं को बनाने वाली कम्पनियों के शेयर्स में गिरावट आयेगी।
                सितम्बर
    मासारम्भ में बुध के माग्री होने से मंदी का रूख बना रहेगा  हिंडाल्को, निफ्टी, मेटल से जुड़े शेयर, रिलायंस इण्डस्ट्रीज आदि बैंकिग में विजया, यू.टी.आई, एच.डी.एफ.सी, पी.एन.बी., डॉ. रेडीज, डाबर, बैजनाथ, आयुर्वेदिक दवाई बनाने वाली कम्पनियों के शेयर्स में अच्छा गिरावट देखने को मिलेगी। तारीख 12 को गुरू तुला राशि मे प्रवेश करेगा अतः मार्केट को सुधारने का कार्य करेगा जिसके फलस्वरूप  आयरन सेक्टर के शेयर्स, प्लास्टिक सेक्टर, मशीनरी, मेटल सेक्टर, रेडीमेड गारमेन्ट्स सेक्टर, टेलीकॉम सेक्टर आदि शेयर्स में तेजी देखने को मिलेगी। तीसरे सप्ताह मे सूर्यदेव की कन्या संक्रान्ति पड़ेगी अतः हिंडाल्को, निफ्टी, मेटल से जुड़े शेयर, रिलायंस इण्डस्ट्रीज आदि बैंकिग में विजया, यू.टी.आई, एच.डी.एफ.सी, पी.एन.बी आदि पर डॉ. रेडीज, डाबर, बैजनाथ, आयुर्वेदिक दवाई बनाने वाली कम्पनियों के शेयर्स में अच्छा उछाल देखने को मिलेगा। एल.एन.टी., डाबर, विप्रो, एल.जी, वीडियोकान, सैमसंग, एल.जी, बी.पी.एल.,भारती आदि कम्पनियों के शेयर्स के भाव कुछ हद तक बढ़ जायेंगे। मासान्त तक तेजी पर उम्मीद से कम शेयर मार्केट मे बनी रहेगी।   
अक्टूबर
    मासारम्भ में ही बाजार का रूख गरम रहेगा। वाहन, उद्योग, मशीनरी, चाय, टेल्को, रिलायन्स एल एम एल, मेडिसिन आदि कम्पनियों के शेयर्स में उछाल आयेगा। ता.3 को  योग तेजी कारक हैं बाजार में मंदड़िए विचलित न हों क्योंकि 5 से 8 तक मंदी का योग भी है। दुसरे सप्ताह मे डाबर, डा. रेबीज, जानसन एण्ड जानसन, आदि कम्पनियों के शेयर्स में उछाल आएगा।  केमिकल्स, औद्योगिक बैंक, स्टील, सुगन्ध, टेली उद्योग मशीनरी काफी सीमेन्ट आदि कम्पनियों के शेयर्स में गिरावट आएगी, अतः पुराने शेयर्स की बिकवाली के लिये यह सप्ताह शुभ नहीं है। ता.17 को सूर्यदेव की तुला संक्रान्ति पड़ रही है अतः शेयर खरीदने का माकूल समय है, आप खरीदारी कर सकते हैं, सूचना प्रौद्योगिकी, बी.एस.एन.एल., एम.टी.एन.एल, विदेशी मुद्रा में गिरावट, व्याज दरें तेज, बैंकिंग, आई.टी, इलेक्ट्रानिक वस्तुवों को बनाने वाली सभी कम्पनीयों के शेयर्स में तेजी का योग बनता है। माह के अंतिम सप्ताह में शेयर्स के भाव धीरे-धीरे कवर करना शुरू कर देंगे, मार्केट में तेजी का प्रभाव दिखने लगेगा, इस बीच विशेष रूप से  टेल्को, टिस्को, रिलायंस, कॉटन, गारमेन्ट्स बनाने वाली कम्पनियों के शेयर्स, रासायनिक पदार्थों में एवं गृहोपयोगी वस्तुओं को बनाने वाली में कम्पनियों के शेयर्स में खास तेजी देखने को मिलेगी।
नवम्बर
    मासारम्भ में औद्योगिक कम्पनियों कें शेयर्स में विशेष गिरावट आयेगी। ता 3 को मंगल हस्त नक्षत्र के द्वितीय चरण में प्रवेश करेगा, टाटा विप्रो, सत्यम, एल आई सी हिन्दुस्तान लीवर टेल्को आदि कम्पनियों के शेयर्स में मन्दी रहेगी। मँदड़िए अच्छा लाभ उठा सकते हैं। ता.4,5,6,8,9 ये तारीखें भी मँदी-कारक हैं। ता.10 से 15 तक शुक्र एवं गुरू का प्रभाव मार्केट मे रहेगा अतः टाटा ग्रुप, संगीत के उपकरण बनाने वाली, कृषि से जुड़े उपकरण बनाने वाली, बड़े वाहनो के टायर  बनाने वाली, मकान बनाने मे इस्तेमाल होने वाली वस्तुओं को बनाने वाली, कागज, स्टेशनरी, विप्रो, सत्यम्, एल आई सी हिन्दुस्तान लीवर टेल्का आदि के शेयर्स में जबरदस्त तेजी का योग है, ता.16 को सूर्यदेव की वृश्चिक संक्रान्ति पड़ेगी अतः मेडिकल कम्पनियों के शेयर्स, सिप्ला, रैनबैक्सी, कोर, मंदड़िए अगर सम्भलकर न चले तो 15 दिन की कसर दो-चार दिन में पूरी हो जायेगी। यह तेजी का रूख मास के तीसरे सप्ताह तक कायम रहेगा, मास के मध्य में चढ़ी हुई तेजी अच्छा रूख लेकर चलेगी और माह के अन्त में एकदम स्थिर स्थिति में आ जायेगी, अतः पुराने स्टाक को माह के चौथे सप्ताह में निकाल सकते हैं। तेजड़िए अच्छा लाभ उठा सकते हैं। 
दिसम्बर
    मासारम्भ में तारीख 3 को बुध वक्री होने से बाजार में काफी, चाय, बनाने वाली कम्पनी जैसे टाटा टी, नेस्ले, लिप्टन, आदि के शेयर्स बढ़ेगें। दूसरे सप्ताह मे गुरू के प्रभावी होने से भौतिक वादी वस्तुओं को बनाने वाली कम्पनियों, सफाई करने के उपकरण बनाने वाली कम्पनियों  कोल्डड्रिंक सीमेन्ट, स्टील, टेक्सटाइल, कपास, औद्योगिक कम्पनियों में तेजी का रुख रहेगा। मार्केट मे तेजड़िये प्रबल पड़ जाएंगे। माह के तीसरे सप्ताह में मार्केट में 15 को सूर्य देव की धनु की संक्रान्ति पड़ेगी ज्यादा खास तेजी तो नही ला पायेगी पर शेयर बाजार में तेजी का असर पैदा कर देने में कामयाब रहेगी। निवेश करते समय एक बात का ख्याल रखे की किसी भी एक सेक्टर के शेयर्स न खरीदें, अलग-अलग सेक्टर के शेयर्स मे निवेश करें। वर्षान्त मे बजाज, रिलायन्स ग्रुप, विदेशी कम्पनियों के शेयर्स, लेदर का कार्य करने वाली कम्पनियों के शेयर्स टेस्को, एल आई सी आदि में तेजी, मेडिकल्स, कम्पनियों के शेयर्स में मंदी का रूख रहेगा। बिकवाली के दबाव के कारण अनिश्चितता का माहौल बन सकता है। जिससे बाद मे बाजार टूटना प्रारम्भ हो जायेगा। सटोरियों को बेचान और संस्थागत समर्थन न रहने से अनेक शेयरों के भाव काफी धराशायी होंगे। आप वर्ष के अंत मे निवेश इन शेयर्स मे कर सकते है-सीप्ला, रैनबैक्सी, अरविन्द मिल्स, कैडबरी, फेसबुक आई पी ओं, एयरटेल, टाटा टेस्को, सैमसंग, रिलांयस इन्फ्रा, रिलांयस पावर व बैंकिंग सेक्टर मे, एस.बी.आई., एच.डी.एफ.सी., ऐक्सिस।
   नोटः- यद्यपि इस Blog  में प्रत्येक लेख लिखते समय ज्योतिषशास्त्र को आधार मानकर लिखा गया है। फिर भी निवेशकों को एवं व्यापारियों को चाहिये वे बुद्धि से कार्य करें। किसी भी हानि के लिये सम्पादक-लेखक प्रकाशक कतई जिम्मेदार न होंगे। किसी भी विवाद का निपटारा कानपुर न्यायालय के अन्तर्गत मान्य होगा।     डॉ. विजय त्रिपाठी ‘विजय’

Friday, January 27, 2017

पितृ पक्ष का वैज्ञानिक महत्व

 प्रत्येक शरीर में आत्मा तीन रूप में व्याप्त है-1. विज्ञानात्मा, 2. महानात्मा, 3. भूतात्मा। विज्ञानात्मा (उसे कहते हैं जो) गर्भाधान से पहले स्त्री पुरूष में सम्भोग की इच्छा प्रकट करता है। वह रोदसी मण्डल से आता है। रोदसी मण्डल पृथ्वी से 27 हजार मील की दूरी पर स्थित है। महानात्मा चन्द्रलोक से पुरूष के शरीर में 28 अंशात्मक रेतस् बनकर आता है, उसी 28 अंश रेतस् से पुरूष पुत्र पैदा करता है। भूतात्मा माता द्वारा खाये गये अन्न के रस से बने वायु द्वारा गर्भ पिण्ड में प्रवेश करता है। उसे वायु में अहंकार का ज्ञान होता है। उसी को प्रज्ञानात्मा तथा भूतात्मा कहते हैं। यह भूतात्मा पृथ्वी के सिवा अन्य किसी लोक में नहीं जा सकता। मृत प्राणी का महानात्मा स्वजातीय चन्द्रलोक में चला जाता है। चन्द्रलोक में उस महानात्मा से 28 अंश रेतस् माँगा जाता है; क्योंकि चंद्रलोक से 28 अंश लेकर ही वह उत्पन्न हुआ था। इसी 28 अंश रेतस् को पितृऋण कहते हैं। 28 अंश रेतस् के रूप में श्रद्धा नामक मार्ग से भेजे जाने पिण्ड तथा जल आदि के दान को ही श्राद्ध कहते है। इस श्राद्ध नामक मार्ग का सम्बन्ध मध्यान्हकाल में पृथ्वी से होता है। इसीलिए मध्यान्हकाल में श्राद्ध करने का विधान है। पृथ्वी पर कोई भी वस्तु सूर्यमण्डल तथा चन्द्रमण्डल के सम्पर्क से ही बनती है। संसार में सोम सम्बन्धी वस्तु विशेषतः चावल और यव हैं। यव में मेधा की अधिकता है। धान और यव में रेतस् (सोम) का अंश विशेष रूप में रहता है। आश्विन कृृष्णपक्ष (पितृ पक्ष) में यदि चावल तथा यव का पिण्डदान किया जाय तो चन्द्रमंडल को 28 अंश रेतस् पहुँच जाता है। पितर इसी चन्द्रमा के ऊर्ध्व देश में रहते हैं; विदूर्ध्वलोके पितरो वसन्तः स्वाधः सुधादीधित मामनन्ति। (गोलाध्याय)।

        आश्विन कृष्णपक्ष प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तक ऊपर की रश्मि तथा रश्मि के साथ पितृप्राण पृथ्वी पर व्याप्त रहता है। श्राद्ध की मूलभूत परिभाषा यह है कि प्रेत और पितर के निमित्त, उनकी आत्मा की तृप्ति के लिए श्रद्धापूर्वक जो अर्पित किया जाय वही श्राद्ध है। मृत्यु के बाद दशगात्र और षोडशी-सपिण्डन तक मृत व्यक्ति की प्रेत संज्ञा रहती है। सपिण्डन के बाद वह पितरों में सम्मिलित हो जाता है।

        पितृपक्ष भर में जो तर्पण किया जाता है उससे वह पितृप्राण स्वयं आप्यायित होता है। पुत्र या उसके नाम से उसका परिवार जो यव तथा चावल का पिण्ड देता है, उसमें से रेतस् का अंश लेकर वह चन्द्रलोक में अम्भप्राण का ऋण चुका देता है। ठीक आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से वह चक्र ऊपर की ओर होने लगता है।  15 दिन अपना-अपना भाग लेकर शुक्ल प्रतिपदा से उसी रश्मि के साथ रवाना हो जाता है। इसीलिये इसको पितृपक्ष कहते हैं। अन्य दिनों में जो श्राद्ध तथा तर्पण किया जाता है, उसका सम्बन्ध सूर्य की उस सुषुम्ना नाड़ी से रहता है, जिसके द्वारा श्रद्धारश्मि मध्यान्हकाल में पृथ्वी पर आती रहती है और यहाँ से तत्तत् पितर का भाग ले जाती है; परन्तु पितृपक्ष में जितने पितृप्राण चन्द्रमा के ऊर्ध्व देश में रहते है, वे स्वतः चन्द्रपिंड की परिवर्तित स्थिति के कारण पृथ्वी पर व्याप्त रहते हैं। इसी कारण पितृपक्ष में तर्पण और श्राद्ध का इतना अधिक माहात्म्य है।

        धर्मशास्त्र का निर्देश है कि माता-पिता आदि के निमित्त उनके नाम और गोत्र का उच्चारण कर मंत्रों द्वारा जो अन्न आदि अर्पित किया जाता है, वह उनको प्राप्त हो जाता है। उन्हें गन्धर्वलोक प्राप्त होने पर भोग्यरूप में, पशुयोनि में तृणरूप में, सर्पयोनि में वायु रूप में, यक्षयोनि में पेयरूप में, दानवयोनि में मांसरूप में, प्रेतयोनि में रूधिररूप में, और मनुष्यरूप में अन्न आदि के रूप में उपलब्ध होता है।

        जब पितर यह सुनते हैं कि श्राद्धकाल उपस्थित हो गया है तो वह एक दूसरे का स्मरण करते हुए मनोमय रूप से श्राद्धस्थल पर उपस्थित हो जाते हैं और ब्राह्मणों के साथ वायु रूप में भोजन करते हैं। यह भी कहा गया है कि जब सूर्य कन्या राशि में आते हैं तो पितर अपने पुत्रों पौत्रों के यहाँ आते हैं। विशेषतः आश्विन अमावस्या के दिन वह दरवाजे पर आकर बैठ जाते हैं। यदि उस दिन उनका श्राद्ध नहीं किया जाता तो वह शाप देकर लौट जाते हैं। अतः उस दिन पत्र-पुष्प, फल और जल तर्पण से यथाशक्ति उनको तृप्त करना चाहिए। श्राद्ध नहीं होना चाहिए। कन्या गते सवितरि पितरो यान्ति वै सुतान्। अमावस्या दिने प्राप्ते गृहद्वारं समाश्रिताः। श्राद्धाभावे स्वभवनं शापं दत्वा व्रजन्ति ते।।

        मुख्यतः श्राद्ध दो प्रकार के है। पहला एकोद्दिष्ट और दूसरा पार्वण; लेकिन बाद में चार श्राद्धों को मुख्यता दी गई। इनमें पार्वण, एकोद्दिष्ट, वृद्धि और सपिण्डीकरण आते हैं। आजकल यही चार श्राद्ध समाज में प्रचलित हैं। वृद्धिश्राद्धका मतलब नान्दीमुख श्राद्ध है। श्राद्धों की पूरी संख्या बारह है- नित्यं नैमित्तिकं काम्य वृद्धिश्राद्ध सपिंडनम्। पार्वण चेति विज्ञेयं गोष्ठ्यां शुद्धयर्थष्टमम्।। कर्मागं नवमं प्रोक्तं दैविकं दशमं स्मृतमृ। यात्रा स्वेकादर्श प्रोक्तं पुष्टयर्थ द्वादशं स्मृतम्।।

        इनमें नित्यश्राद्ध, तर्पण और पञ्चमहायज्ञ आदि के रूप में, प्रतिदिन किया जाता है। नैमित्तिक श्राद्ध का ही नाम एकोद्दिष्ट है। यह किसी एक व्यक्ति के लिए किया जाता है। मृत्यु के बाद यही श्राद्ध होता है। प्रतिवर्ष मृत्युतिथि पर भी एकोद्दिष्ट ही किया जाता है। काम्य श्राद्ध अभिप्रेतार्थ सिद्धर्य्थ अर्थात् किसी कामना की पूर्ति की इच्छा के लिए किया जाता है। वृद्धिश्राद्ध पुत्र जन्म आदि के अवसर पर किया जाता है। इसी का नाम नान्दी श्राद्ध है। सपिण्डनश्राद्ध मृत्यु के बाद दशगात्र और षोडषी के बाद किया जाता है। इसके बाद मृत व्यक्ति को पितरों के साथ मिलाया जाता है।

        प्रेतश्राद्ध में जो पिण्डदान किया जाता है, उस पिण्ड को पितरों को दिये पिण्ड में मिला दिया जाता है। पार्वण श्राद्ध प्रतिवर्ष आश्विन कृष्णपक्ष में मृत्यु तिथि और अमावस्या के दिन किया जाता है। इसके अतिरिक्त अन्य सभी पर्वों पर भी यह श्राद्ध किया जाता था। गोष्ठी श्राद्ध विद्वानों को सुखी समृद्ध बनाने के उद्देश्य से किया जाता था। इससे पितरों की तृप्ति होना स्वाभाविक है। शुद्धि श्राद्ध शारीरिक मानसिक और अशौचादि अशुद्धि के निवारण के लिए किया जाता है। कर्मा¯ श्राद्ध सोमयाग, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन आदि के अवसर पर किया जाता था। दैविक श्राद्ध देवताओं की प्रसन्नता के लिए किया जाता था। यात्राश्राद्ध यात्रा काल में किया जाता था। पुष्टिश्राद्ध धन-धान्य समृद्धि की इच्छा से किया जाता था।

        हमारे धर्मशास्त्रों में श्राद्ध के सम्बन्ध में इतने विस्तार से विचार किया गया है कि इसके सामने अन्य समस्त धार्मिक कृत्य गौण से लगने लगते हैं। श्राद्ध के छोटे से छोटे कृत्य के संबंध में इतनी सूक्ष्म मीमांसा और समीक्षा की है कि विचारशील व्यक्ति चमत्कृत हो उठते हैं। मनोविज्ञान के अध्येताओं के लिए श्राद्धीय कर्मकाण्ड विवेचन एवं अध्ययन की सामग्री है। शास्त्रकारों ने अपने पांडित्य और मनोविज्ञान का यत्परोनास्ति रूप प्रदर्शित किया है। नया मकान बनवाने पर, नया कूप तैयार करने पर, समृद्धि प्राप्त होने पर, देश में कोई नयी असाधारण घटना होने पर, शत्रुओं पर विजय प्राप्त होने पर, पुत्र जन्म, यज्ञोपवीत, विवाह, कन्या-दान आदि के अवसरों पर, जब परिवार के सब लोग उत्सव मना रहे हों, सबका मन उल्लासित हो, उस समय अपने स्वर्गीय बन्धुओं की स्मृति आना नितांत स्वाभाविक है। यह इच्छा भी उस समय अवश्य जागृत होती है कि यदि इस अवसर पर माता रहतीं, पिता रहते, बड़े भाई रहते, दूसरे आत्मीय रहते तो उनको कितना आनन्द प्राप्त होता। जो हमारे सुख में अपनी अन्तरात्मा से सुखी होते थे, दुःख में दुखी होते थे, उनकी स्मृति मिटाये मिट नहीं सकती। अतः यह इच्छा स्वाभाविक है कि वह अज्ञात लोक के वासी भी हमारे उल्लास में, आनन्दोत्सव में सम्मिलित हों; शरीर से न सही, आत्मा से हमारे साथ रहें; अतः उनके प्रति श्रद्धानत होना और श्रद्धानिवेदित करना स्वाभाविक हो जाता है। उनका शास्त्रीय मंत्रों द्वारा मानसिक आवाहन पूजन ही श्राद्ध है।

        इस मनोवैज्ञानिक सत्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि मन की भावना बड़ी प्रबल होती है। श्रद्धाभिभूत मन के सामने स्वर्गीय आत्मा सजीव और साकार हो उठती है। श्राद्ध में माता-पिता आदि के रूप का ध्यान करना आवश्यक कर्तव्य निर्धारित किया गया है। अनेक श्रद्धालु लोगों का यह अनुभव है कि श्राद्ध के समय माता-पिता, पिता या किसी अन्य स्नेही की झलक दिखाई दी। भगवान् राम ने जब अपने पिता का श्राद्ध किया तो पिण्ड दान के बाद भगवती सीता को दशरथ आदि पितरों का दर्शन कराया था। यह निरी कपोल कल्पना नहीं है। आज का मनोविज्ञान भी श्राद्ध के इस सत्य के निकट पहुँचता जा रहा है।

        श्राद्ध के लिए जिन वस्तुओं की आवश्यकता होती है। उनपर भी शास्त्रों में बहुत विचार किया गया है। कौन वस्तु कैसी हो, कहाँ से ली जाय, कब ली जाय। भोजन सामग्री कैसी हो, किन पात्रों में बनायी जाय, कैसे बनायी जाय। फल, साग, तरकारी आदि में भी कुछ अश्राद्धीय ठहरा दी गयी है। प्रत्येक वस्तु की शुद्धता और स्तर निर्धारित कर दिया है। पुष्प और चन्दन जो निर्धारित है, उन्हीं का उपयोग हो सकता है।

        इसके अलावा श्राद्ध में कैसे ब्राह्मणों को आमन्त्रित किया जाय, किस प्रकार किया जाय, कब किया जाय और निमन्त्रित ब्राह्मण निमन्त्रण के बाद किस तरह का आचरण करें, भोजन किस प्रकार करें, आदि सभी बातें विस्तार पूर्वक बतलायी गयी हैं। ब्राह्मणों को, उत्तम, मध्यम और अधम तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया है। निषिद्ध ब्राह्मणों की सूची बड़ी लम्बी है। शास्त्र का कठोर आदेश है कि अन्य किसी धार्मिक कार्य में ब्राह्मणों की परीक्षा न की जाय, पर श्राद्ध में जिन ब्राह्मणों को आमन्त्रित करना हो, उनकी परीक्षा यत्नपूर्वक की जाय और परीक्षा आमन्त्रित करने के पूर्व कर ली जाय, बाद में नहीं - न ब्राह्मणं परीक्षेत देवै कर्मणि धर्मवित्। पित्र्ये कर्मणि तु प्राप्ते परीक्षेत प्रयत्नतः।

        श्राद्ध किसी दूसरे के घर में, दूसरे की भूमि पर कभी न किया जाय। जिस भूमि पर किसी का स्वामित्व न हो, सार्वजनिक हो, ऐसी भूमि पर श्राद्ध किया जा सकता है। शास्त्रीय निर्देश है कि दूसरे के घर में जो श्राद्ध किया जाता है, उसमें श्राद्ध करने वाले पितरों को कुछ नहीं मिलता। गृह-स्वामी के पितर बलात् सब छीन लेते हैं - परकीय गृहे यस्तु स्वात्पितृस्तर्पयेद्यदि। तद्भूमि स्वामिनस्तस्य हरन्ति पितरोबलात्।।

        यह भी कहा गया है कि दूसरे के प्रदेश में यदि श्राद्ध किया जाय तो उस प्रदेश के स्वामी के पितर श्राद्धकर्म का विनाश कर देते हैं- परकीय प्रदेशेषु पितृणां निवषयेत्तुयः। तद्भूमि स्वामि पितृभिः श्राद्धकर्म विहन्यते।।

        इसीलिए तीर्थ में किये गये श्राद्ध से भी आठगुना पुण्यप्रद श्राद्ध अपने घर में करने से होता है-तीर्थादष्टगृणं पुण्यं स्वगृहे ददतः शुभे। यदि किसी विवशता के कारण दूसरे के गृह अथवा भूमि पर श्राद्ध करना ही पड़े तो भूमि का मूल्य अथवा किराया पहले उसके स्वामी को दे दिया जाय।

        मृतक की अन्त्येष्टि और श्राद्ध की जो व्यवस्था इस समय प्रचलित है, वह हमारे वेदों में वर्णित है। गृह्यसूत्रों में पितृयज्ञ अथवा पितृश्राद्ध का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। आश्वलायन गृह्यसूत्र की सप्तमी और अष्टमी कण्डिका में विस्तार पूर्वक श्राद्ध विधि वर्णित की गयी है; वह पठनीय और मननीय है। अन्त्येष्टि विधि का वर्णन भी इसमें उपलब्ध है। चिता प्रज्ज्वलित होने पर ऋग्वेद का यह मन्त्र पढ़ा जाता था - प्रेहि प्रेहि पथिभिः पूर्वेभिः अर्थात् जिस मार्ग से पूर्वज गये हैं, उसी मार्ग से तुम भी जाओ। मूलतः वेदों में भी श्राद्ध और पिण्डदान का उल्लेख किया गया है। श्राद्ध में जो मंत्र पढ़े जाते हैं, उनमें से कुछ ये हैं अत्र पितरो मादमध्वं यथाभागमा वृषायध्वम। इस पितृयज्ञ में पितृगण हृष्ट हो और अंशानुसार अपना-अपना भाग ग्रहण करें। नम वः पितरो रसाय। नमो वः पितरो शोषाय। पितरों को नमस्कार ! बसन्त ऋतु का उदय होने पर समस्त पदार्थ रसवान हों। तुम्हारी कृपा से देश में सुन्दर बसन्त ऋतु प्राप्त हो। पितरों को नमस्कार ! ग्रीष्म ऋतु आने पर सर्व पदार्थ शुष्क हों। देश में ग्रीष्म ऋतु भलीभाँति व्याप्त हो।

        इसी प्रकार छहों ऋतुओं के पूर्णतः सुन्दर, सुखद होने की कामना और प्रार्थना की गयी है। यह भी कहा गया है कि पितरों, तुम लोगों ने हमको गृहस्थ(विवाहित) बना दिया है, अतः हम तुम्हारे लिए दातव्य वस्तु अर्पित कर रहे हैं।

        वेदों के बाद हमारे स्मृतिकारों और धर्माचार्यों ने श्राद्धीय विषयों को बहुत व्यापक बनाया और जीवन के प्रत्येक अंग के साथ सम्बद्ध कर दिया। मनुस्मृति से लेकर आधुनिक निर्णय सिन्धु, धर्मसिन्धु तक की परम्परा यह सिद्ध करती है कि इस विधि में समय समय पर युगानुरूप संशोधन, परिवर्धन होता रहा है। नयी मान्यता, नयी परिभाषा, नयी विवेचना और तदनुरूप नई व्यवस्था बराबर होती रहती है। दुर्भाग्य की बात यह है कि विदेशी आधिपत्य के बाद जब हिन्दु समाज पंगु हो गया, समाज का नियन्त्रण विदेशी पद्धति और विधि-विधान से होने लगा तो युग की आवश्यकता के अनुरूप नयी परिभाषा, व्यवस्था का क्रम भी अवरूद्ध हो गया, फलस्वरूप उपयोगितावादी मानव मन की तुष्टि अपने पुरातन संस्कारों से नहीं हो पा रहीं है और वह संस्कार विहीन होता जा रहा है। जीवित माता पिता, बंधु-बाधव भी आज मात्र उपयोगितावादी की कसौटी पर कसे जा रहे हैं; तब माता-पिता के प्रति आस्था, श्रद्धा और भक्ति की तो बात ही क्या ! इतना ही नहीं, हमारी आस्था स्वयं अपने घर से डिगती जा रही है। देश में व्याप्त समस्त अशान्ति, विक्षोभ, असंतोष, अनैतिकता आदि का मूल कारण यही है। जब हम स्वयं अधोर (शिव) नहीं है तो अधोराः पितरः सन्तु की कामना कैसे कर सकते है।  

Monday, January 23, 2017

(आगमशास्त्र (तंत्र) साधना विषयक कुछ आवश्यक तथ्य)



भारतीय दर्शन एवं आगमशास्त्र की साधना पद्धतियों में तन्त्र शब्द का व्यापक प्रयोग हुआ है। आगमशास्त्र वस्तुतः अत्यन्त गम्भीर चिन्तन व वैज्ञानिक प्रक्रिया के अन्तर्गत है, परन्तु जिस शास्त्र का विशेष साधना एवं साधना पद्धति के रूप में प्रयोग हुआ है वह साधना के एक व्यापक आयाम में प्रयुक्त हुआ है और वर्तमान में उसके जो भेद दिखाई पड़ते है वे बाद के हैं। आगमशास्त्र एक वैज्ञानिक पद्धति है जो विभिन्न देवताओं का अवलम्बन करके परम तत्व तक पहुँचने का द्वार खोलती है। आगमशस्त्र में जो विविध रूपात्मकता दिखाई पड़ती है इसका मुख्य कारण है कि चूँकि मनुष्य रूपवान है इसलिए प्रथमतः रूप का माध्यम ग्रहण करना साधना में विकास के लिए सुविधाजनक और सरल है। वस्तुतः आगमशस्त्र अरूप की यात्रा का लक्ष्य प्रदर्शित करता है और निराकार तक पहुँचने के लिए यात्रा पथ के रूप में कार्य करता है, अतः आगमशास्त्र रूप के माध्यम से अरूप तक पहुँचने की एक विशिष्ट साधना पद्धति है जो सनातन साधना पद्धतियों में सर्वत्र व्याप्त है।
            तन्त्र का शब्दिक अर्थ- तन्त्र का उच्चारण करने से रूढ़-रूप में एक विशेष पद्धति का बोध होता है और वह पद्धति साधना की है। इस पद्धति की विवेचना से पूर्व तन्त्र की व्युत्पत्ति का ज्ञान अति आवश्यक है। तन्त्र शब्द की व्युत्पत्ति (तनु) धातु से हुई है। तनु का अर्थ है विस्तार करना। (तनोति विस्तारयति ज्ञानं येन यस्मात् वा तत् तन्त्रम्, अथवा तन्यते विस्तारयते ज्ञानं अनेन इति तन्त्रम्)।
            व्याकरण के दृष्टिकोण से तनु धातु के साथ त्रयीधातु का भी योग है जिससे एक अर्थ इसमें जुड़ जाता है- रक्षा करने का अर्थात् तन्त्र ज्ञान का विस्तार तो करता ही है साथ ही रक्षा भी करता है। इससे स्पष्ट है कि तन्त्र साधक को आधिभौतिक, आधिदैविक तथा आध्यात्मिक तीनों प्रकार के तापों से छुटकारा दिलाता है तथा भय-मुक्त भी करता है। तनोति विपुलानर्थान् तन्त्रमन्त्राणि समन्वितान्। त्राणं च कुरूते यस्मात्तन्त्रमित्यभिधीयते।। तन्त्रम्-इति-अभिधीयते।
            तन्त्र की व्यापकता व विशिष्टता के कारण प्राचीन काल में शास्त्र और विज्ञान को भी तन्त्र कहा जाता था। न्याय, सांख्य और योगशास्त्र को भी अनेक स्थानों पर तन्त्र शब्द से प्रदर्शित किया गया है। आयुर्वेद शास्त्र के अनेक उपखंडों के नाम में तन्त्र शब्द का जुड़ाव देखने को मिलता हहै जैसे शल्य तन्त्र, शालाक्य तन्त्र।
            परन्तु यहाँ पर जिस तन्त्र से तात्पर्य है वह एक विशेष पद्धति तथा विशेष दर्शन है। तन्त्र का ही शास्त्रीय नाम आगम है और आगम को वेद की भाँति ही मान्यता प्राप्त है। आगम इसलिए भी तन्त्र को कहा जाता है क्योंकि तन्त्र ग्रन्थों में प्रायः वक्ता देवाधिदेव शिव हैं और श्रोता जगत्जननी भगवती पार्वती, कहीं-कहीं इसके विपरीत भी है जहां वक्ता मां पार्वती और श्रोता महादेव शिव है। आगमशास्त्र में सृष्टि, प्रलय, देवतार्चन, मन्त्रों की साधना, पुरश्चरण, षट्कर्म, ध्यान-योग आदि समस्त विषयों पर अत्यन्त गंभीरतापूर्वक विचार किया गया है।
            आगम शास्त्र में इस बात का भी उल्लेख आया है कि कलियुग में आगम साधना ही प्रभावकारी तथा सिद्धिदात्री हो सकती है। प्रपंचसार तन्त्र का मत है कि सत-युग में श्रुतियों के अनुसार त्रेता-युग में स्मृतियों के अनुसार, द्वापर-युग में पुराणों के अनुसार एवं कलियुग में आगमशास्त्र के अनुसार ही धर्म की सार्थकता होती है।
            महानिर्वाण तन्त्र इस बात की घोषणा करता है कि कलियुग में आगम-मार्ग के अतिरिक्त मुक्ति पाने का दूसरा मार्ग नहीं है। शिव के मुख से बताया गया है कि- कलि-युग में जो व्यक्ति आगमशास्त्र का मार्ग त्याग कर अन्य साधना करता है, उसकी गति कदापि संभव नहीं है, यह सर्वथा सत्य है और इसमें तनिक सन्देह नहीं है।
            आगम साहित्य- आगमशास्त्र में शिव के पाँच मुख हैं जो तन्त्र में प्रतीक रूप में गृहण किए गए हैं। यही प्रकारान्तर से आम्नाय का रूप धारण करते हैं। निष्कल शिव सर्वप्रथम नाद के रूप में उद्भासित होते हैं और बिन्दु के स्वरूप को उद्भासित करते हुए आगे के विकास क्रम को प्रदर्शित करते हैं। कामिकागम के अनुसार सदाशिव के प्रत्येक मुख से पाँच श्रोतों का निर्गमन हुआ है वे श्रोत हैं- लौकिक, आध्यात्मिक, वैदिक, अतिमार्ग और मन्त्रात्मक। इस प्रकार शिव के पाँच मुख होने से श्रोतों की संख्या 25 हो जाती है। विभिन्न तन्त्र ग्रन्थों में इसका वर्णन प्राप्त है। मन्त्रात्मक तन्त्र भी पांच प्रकार के हैं। शिव के मुख पाँच होने से इनकी संख्या भी पाँच होती है और तन्त्र ग्रन्थों में आम्नाय शब्द से इन्हें बताया गया है। आम्नायों के नाम हैं- ऊर्ध्वाम्नाय, पूर्वाम्नाय, पश्चिमाम्नाय, दक्षिणाम्नाय और उत्तराम्नाय। ऊर्ध्व-मुख से उत्पन्न (मुक्ति देने वाला), पूर्व मुख से उत्पन्न (सर्वविषों को हरने वाला), उत्तर मुख से उत्पन्न (वशीकरण करने वाला), पश्चिम मुख से उत्पन्न (भूत-पिशाच ग्रह निवारण करने वाला), तथा दक्षिण मुख से उत्पन्न (शत्रुओं पर विजय दिलाने वाला) है। इसका विस्तृत विवरण कामिकागम में दिया गया है।
            आगमशास्त्र के विषय में उल्लेखनीय है कि कोई भी मंत्र प्रयोग बिना योग्य गुरू के निर्देशन के नहीं करना चाहिए, पुस्तकों, समाचारपत्रों में पढ़ कर या टेलीविजन पर देख कर भी इनके प्रयोग कदापि नहीं करने चाहिए। इसका कारण यह है कि समाचारपत्रों में या टेलीविजन में जो लोग आगमशास्त्रीय मंत्रों को करने की सलाह देते नजर आते हैं वे भी तंत्र के मर्म को नहीं जानते हैं और पुस्तकों में उनकी फलश्रुति पढ़ कर बताने लगते हैं जिनके करने से लाभ तो दूर, हानि की सम्भावनाएं प्रबल हो जाती हैं, क्योंकि आगमशास्त्र में काफी जटिलताएं हैं। आगमशास्त्र के अनुसार एक मंत्र किसी के लिए लाभदायक हो सकता है वहीं दूसरी ओर वही मंत्र दूसरे व्यक्ति के लिए अनिष्टकारक हो सकता है। प्रत्येक व्यक्ति का अपना (कुल) होता है, कुल के विपरीत मंत्र का प्रयोग सदैव कष्टदायी होगा, इसमें रंचमात्र सन्देह नहीं है। अतः आगमशास्त्र के मंत्रों के प्रयोग से पूर्व (अ क ड म), (अष्ट दल महा पद्म चक्र), (पद्म महा चक्र), (कुलाकुल चक्र), (तारा चक्र), (गण विचार), (राशि चक्र), (कूर्म चक्र), (शिव चक्र), (विष्णु चक्र), के द्वारा मंत्र का शोधन या तो स्वयं कर लेना चाहिए अथवा कि आगमशास्त्र के जानकार से करवा लेना चाहिए। आगमशास्त्र की विधियों का पूर्णरूपेण पालन करते हुए जब मंत्र सिद्धि की जाती है तब निःसन्देह साधक की मनोकामना की पूर्ति होती है।     
            तन्त्र ग्रन्थों में तन्त्र की संख्या का उल्लेख मिलता है, पर उनमें भिन्नता पायी जाती है, श्री कण्ठ संहिता, वामकेश्वर तन्त्र आदि तन्त्र ग्रन्थों में चौंसठ तन्त्रों की संख्या मिलती है, और रथकान्ता, विष्णुकान्ता, और अश्वकान्ता, में भी चौंसठ तन्त्रों का विवरण मिलता है, परन्तु चौसठ तन्त्रों के नामों में कुछ भेद भी मिलता है। वामकेश्वर तन्त्र के अनुसार चौंसठ-तन्त्रों के नाम निम्नलिखित हैं-
            (1) गणेशयामल (2) रूद्रयामल (3) महाकालीमत (4) लक्ष्मीयामल (5) उमायामल (6) स्कन्दयामल  (7) जयद्रथयामल  (8) महालक्ष्मीमत (9) कौमारी (10) वैष्णवी (11) वाराही (12) माहेन्द्री (13) चामुण्डा (14) शिवदूती (15) ब्रह्मयामल 16) विष्णुयामल (17) शम्बर (18) जालशम्बर (19) तत्वशम्बर (20) भैरवाष्टक (21) महामाया (22) ब्राह्मी      (23) चन्द्रज्ञान (24) वासुकी (25) महासंमोहन (26) महोच्छुष्म (27) वातुल (28) वातुलोत्तर (29) हृद्भेद (30) तन्त्रभेद (31) गुह्य तन्त्र (32) कामिक (33) कलावाद (34) कलासार (35) कुब्जिकामत (36) तन्त्रोत्तर (37) चीनाख्य (38) तोडल (39) तोडलोत्तर (40) पंचामृत (41) वीरावली (42) सर्वज्ञानोत्तर (43) कुलसार (44) कुलोड्डीश (45) कुल चूड़ामणि (46) भूतडामर (47) योगिनी (48) माहेश्वरी (49) विशुद्धेश्वर तन्त्र (50) कुरुपिकामत (51) रूपिकामत (52) सर्ववीरमत (53) विमलामत (54) पूर्वाम्नाय (55) पश्चिमाम्नाय (56) दक्षिणाम्नाय (57) उत्तराम्नाय (58) ऊर्ध्वाम्नाय (59) वैशेषिक मत (60) ज्ञानार्णव (61) रूप भेद (62) अरूणेश (63) मोहिनीश (64) सिद्धयोगेश्वरीमत।
            उल्लेखनीय है कि भिन्न-भिन्न आगम ग्रन्थों में चौंसठ तन्त्रों के नाम आते हैं उनमें संख्या तो 64 ही रहती है परन्तु नामों में अन्तर आ जाता है। मुख्यतः इसका विवरण श्री कण्ठ संहिता, वामकेश्वर तन्त्र, भास्करराय सम्मत सर्वोल्लास तन्त्र, तोडलोत्तर तन्त्र, महासिद्धिसार तन्त्र आदि में मिलता है।
            आदि गुरू शंकराचार्य ने सौन्दर्य लहरी में चौंसठ तंत्रों की संख्या का उल्लेख किया है। चौंसठ की संख्या शायद शिव द्वारा अभिमत चौंसठ वर्णों की निर्देशिका हो सकती है। यह अनुमान है कि विभिन्न मतों तथा विभिन्न कालों में भिन्न-भिन्न तंत्रों का निर्माण हुआ। वर्तमान में सभी तंत्र ग्रन्थ उपलब्ध नहीं होते हैं फिर भी जो प्राप्त हैं उनकी संख्या पर्याप्त है। इसके अतिरिक्त पीठ, भैरव तथा यामल के आधार पर तंत्रों के नाम उपलब्ध होते हैं। पीठ के अनुसार विद्यापीठ, मंत्रपीठ, मुद्रापीठ और मंडल पीठ हैं, जो वस्तुतः तंत्रों के ही भेद हैं। पीठ से सम्बन्धित तंत्रों के नाम इस प्रकार हैं - लाकिनी कल्प, योगिनी जाल, योगिनी हृदय इत्यादि। भैरवों के नामानुसार तंत्रों के जो नाम हैं वे हैं- स्वच्छन्द भैरव, क्रोध भैरव, उन्मत्त भैरव, उग्र भैरव, कपाल भैरव, झंकार भैरव, शेखर भैरव और विजय भैरव आदि। यामल के अनुसार यामलों के आठ नाम हैं- ब्रह्म यामल, विष्णु यामल, रूद्र यामल, कुबेर यामल, स्कन्द यामल, यम यामल, वायु यामल और इन्द्र यामल। इन यामलों के नामों में कहीं-कहीं नामान्तर भी मिलता है। संमोहन तंत्र में कहा गया है कि चीन में 100 मूल तंत्र और 37 उपतंत्र है। द्रविड़ में 20 मूल और 25 उपतंत्र हैं। केरल में 60 मूलतंत्र और 500 उपतंत्र हैं। काश्मीर में 100 मूलतंत्र और 10 उपतंत्र है तथा गौड़ में 27 मूलतंत्र और 16 उपतंत्र हैं। शैव, वैष्णव, गाणपत्य और सौर-भेद से इनकी संख्या में और भी अधिकता आ जाती है।
            शाक्त तंत्रों में उपास्य देवताओं के अनुसार भी तंत्र ग्रन्थों में विभाग है। इस दृष्टि से काली, तारा, श्री विद्या, भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्ता, धूमावती, बगला, मातंगी, कमला इन दश महाविद्याओं से सम्बद्ध अलग-अलग ग्रन्थ उपलब्ध हैं।
            महाविद्या काली से सम्बन्धित ग्रन्थों की संख्या काफी है। इनमें से कुछ मुख्य नाम इस प्रकार है - काली यामल, काली कल्प, कालीकुल क्रमार्चन, काली विलास तंत्र, काली कुल सर्वस्व, काली सपर्याक्रम, काली तंत्र, काली परा, कालीकुल, कालिकार्णव, भद्रकाली चिंतामणि, व्योमकेश संहिता, कल्पवल्ली, श्यामा रहस्य, विश्वसार तंत्र, कामेश्वरी तंत्र, कुल चूड़ामणि, कौलावलि, कुलमूलावतार, श्यामासपर्या, शक्ति संगम तंत्र, आदि महत्वपूर्ण हैं। अनेक ग्रन्थ ऐसे भी हैं जो विभिन्न देवताओं की उपासना से सम्बन्धित सामग्री से परिपूर्ण है। यह एक प्रकार से संकलन ग्रंथ हैं फिर भी महत्वपूर्ण हैं, जैसे मंत्र महार्णव, मंत्र-महोदधि, शाक्त प्रमोद, तंत्रसार, शारदा तिलक आदि।
            महाविद्या तारा से सम्बन्धित जो ग्रन्थ हैं उनमें मुख्य हैं- तारोपनिषद, तारार्णव, तारा तंत्र, तारा रहस्य, तारा कल्प, तारा सूक्त, तोडल तंत्र,  नील यंत्र, महानील तंत्र, नील सरस्वती तंत्र, चीनाचार, तन्त्र रत्न, तारा शाबर तंत्र,  एक-जटी तंत्र, एक जटा-कल्प, महाचीनाचार क्रम, एक-वीर तंत्र, तारिणी तंत्र आदि। तारा से सम्बद्ध संकलन ग्रन्थ भी हैं, उनमें मुख्य तारा भक्ति सुधार्णव है।
            महाविद्या श्री विद्या से सम्बन्धित जो ग्रन्थ उपलब्द्द होते हैं उनमें मुख्य हैं- त्रिपुरा रहस्य (माहात्म्य खण्ड एवं ज्ञान खण्ड), श्री विद्यार्णव तंत्र, श्री विद्या रत्नाकर एवं श्री विद्या वरिवस्या ( दोनों ग्रन्थ ब्रह्मलीन धर्म-सम्राट् यतिचक्र चूड़ामणि पूज्य चरण-रज स्वामी करपात्रि जी महाराज द्वारा रचित) स्वच्छन्द तंत्र, कालोत्तर वासना, श्री पराक्रम, ललितार्चन, चन्द्रिका, सौभाग्य तन्त्रोत्तर, सौभाग्य सुभगोदय, शक्ति संगम तंत्र का सुन्दरी खण्ड, श्री क्रमोतंग, सुभगपारिजात,  सुभगार्चारत्न, चन्द्र ज्ञान, सुन्दरी हृदय, नित्याषोडशिकार्णव, मातृका हृदय, संमोहन, वामकेश्वर, बहुरूपाष्टक, प्रस्तावचिन्तामणि और मेरू प्रस्तर। इसके अतिरिक्त संकलन ग्रन्थ, श्री योगिनी हृदय, परशुराम कल्प सूत्र वृत्ति, परमानन्द तंत्र, सौभाग्य कल्पलतिका, ज्ञानार्णव, श्री क्रम संहिता, दक्षिणामूर्ति संहिता, आज्ञावतार, संकेत पादुका, चन्द्रपीठ ललितोपाख्यान, लक्ष्मी तंत्र, कामकला विलास, सौभाग्य चन्द्रोदय, श्री विद्यारत्न सूत्र आदि अनेक ग्रन्थ हैं।
            महाविद्या भुवनेश्वरी से सम्बन्धित भुवनेश्वरी रहस्य, भुवनेश्वरी तंत्र, भुवनेश्वरी पारिजात आदि मुख्य ग्रन्थ हैं।
            महाविद्या भैरवी से सम्बन्धित भैरवी सपर्याविधि, भैरवी रहस्य, भैरवी तंत्र, मुण्डमाला तंत्रादि ग्रन्थ हैं।
            महाविद्या छिन्नमस्ता से सम्बन्धित शक्ति संगम के समावेश तंत्र का छिन्ना खण्ड है, किन्तु छिन्न मस्ता का पर्याप्त उल्लेख प्रकरण ग्रन्थों में मिलता है।
            महाविद्या द्दूमावती के लिये प्राणःतोषिणी तंत्र विशेष रूप से उल्लेख है इसके अतिरिक्त मंत्र महोदधि, मंत्र महार्णव आदि प्रकरण ग्रन्थों में इनका स्वरूप और साधना का विवेचन है।
            महाविद्या बगला से सम्बन्धित मुख्य ग्रन्थ है- सांख्यायन तंत्र। इसके अतिरिक्त बगला क्रम कल्पवल्ली नाम का एक और महत्वपूर्ण ग्रन्थ मिलता है। प्रकरण ग्रन्थों में बगलामुखी रहस्यम् की चर्चा है।
            महाविद्या मातंगी से सम्बद्ध ग्रन्थों में मातंगी क्रम, मातंगी पद्धति आदि ग्रन्थों का उल्लेख है। इसके अतिरिक्त प्रकरण ग्रन्थ इस विद्या का मुख्य आधार है।
            महाविद्या कमला से सम्बन्धित ग्रन्थों में तंत्रसार, शारदा तिलक, शाक्त प्रमोद आदि ग्रन्थ आते हैं।
            तंत्र साहित्य अपने आपमें बहुत विशाल है तथा उसके अन्तर्गत विभिन्न सम्प्रदायों की साधना पद्धतियाँ आ जाती है।
            आगम शास्त्र के विकास का क्रमः- आगमतंत्र की प्राचीनता असंदिग्ध है, वेदों के समानान्तर प्राचीनता की दृष्टि से इसे माना जाता है। कुछ विद्धानों के मत से तो वेद से भी प्राचीन आगमतंत्र है। एक धारणा यह है कि तन्त्र वेद के समानान्तर विकसित हुआ और तांत्रिक पद्धतियों का अवतार रूप से प्रभाव वेदों में आया है। जनमानस में एक धारणा है कि भारत में सबसे प्राचीन वेद हैं तथा जितने भी धर्म एवं साधना पद्धतियां हैं वे सब वेद के बाद के हैं और वेद से प्रभावित हैं, किन्तु तंत्र का व्यापक क्षेत्र देखते हुए यह अनुमान है कि तंत्र किसी न किसी रूप में वेदों के पूर्व समाज में था तथा वेदों के समानान्तर भी था। तांत्रिक ग्रन्थ जो वर्तमान में उपलब्ध हैं, वेदों के बहुत बाद के है पर ग्रन्थों के निर्माण के साथ इसके उद्भव को जोड़ना किसी भी तरह सही नहीं होगा, कुछ ऐसी विचारधाराएँ और साधनात्मक क्रियाएँ होती हैं जो लिखित में तो बाद में आती हैं किन्तु व्यवहार में कई वर्ष पूर्व से चलती रहती हैं। वेद के लिये जो शब्द प्रचलित था और उसी अर्थ में जाना गया वह शब्द है  निगम , और तंत्र के लिये जो शब्द प्रचलन में था वह शब्द है  आगम । प्रायः निगम आगम शब्द एक साथ प्रयुक्त होते हैं। अतः दोनों को समानान्तर मानने में आपत्ति नहीं होनी चाहिए।
            तंत्र वस्तुतः एक साधना पद्धति है, आगम ग्रन्थों में जिन साधकों अथवा विभिन्न महाविद्याओं के उपासकों का नाम आता है वे प्रायः वैदिक ऋषि हैं। इसके साथ ही यह भी ध्यान देने योग्य है कि तंत्र का जो उद्देश्य और मूल स्रोत है वे दोनों वेदों में भी मिलते हैं। शक्ति तत्व उन्हीं में एक है इसीलिये तंत्र की शाक्त परम्परा अथवा अन्य परम्पराएँ किसी न किसी रूप में वेदों में हैं। यह स्वरूप, वैदिक संहिताओं के सबसे प्राचीन रूप ऋग्वेद, में भी उपलब्ध है और अथर्ववेद में यह स्वरूप स्पष्ट रूप से मिलता है। इसलिये तंत्र की प्राचीनता के सम्बन्ध में जो प्रश्न हैं, उनका समाधान वैदिक काल में अथवा प्राग्वैदिक काल में ही मिलता है। वेदों को आधार मान कर भारत में जिन दर्शनों का विकास हुआ, तांत्रिक दर्शन उसका मूल तत्व है। इसके अतिरिक्त उसकी अपनी स्वतन्त्र पहचान भी है। मंत्र साक्षात्कार के सम्बन्ध में यह कहा जाता है कि- ऋषयः मंत्र द्रष्टारः।
            वैदिक ऋचाओं और तांत्रिक मंत्रों के साक्षात्कार करने वाले अनेक ऋषि हैं। वशिष्ठ मुनि तारा के उपासक थे। लोपामुद्रा, अगस्त्य, दुर्वासा आदि श्री विद्या के साधक थे। इसी प्रकार देवताओं का भी तांत्रिक मंत्रों के साक्षात्कार और उससे जुड़ाव का संदर्भ तंत्र ग्रन्थों में मिलता है। श्री विद्यार्णव तंत्र के अनुसार श्री विद्या के साधकों के नाम इस प्रकार हैं- मनुश्चन्दः कुबेरश्च लोपामुद्रा च कामराट्ख्या, अगस्त्यनन्दि सूर्याश्च विष्णु स्कन्द शिवास्तथा।। दुर्वासाश्च महादेव्याः द्वादशोपासकाः स्मृता, शक्रश्चचोन्मना चैव तथा च वरूणस्ततः।। धर्मराजोऽनलो नागराजो वायुर्वुधस्तथा, ईशानश्च रतिश्चैव तथा नारायणोऽपि च।। ब्रह्मा जीवो महादेव्यास्त्रयोदश उपासकाः, पंचविशति संख्योपासकानां महेश्वरि।।
            ऐतिहासिक काल में श्री गौड़पाद, गोविन्दपाद, और आदि गुरू शंकराचार्य का नाम विशेष उल्लेखनीय हैं। यह सभी आचार्य भारतीय दर्शन के क्षेत्र में और वैदिक व्याख्यान तथा तत्वज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण हैं। यह तीनों आचार्य श्री विद्या के उपासक थे। गौड़पादाचार्य की पुस्तक श्री विद्यारत्न सूत्र उपलब्ध है। शंकराचार्य की सौन्दर्य लहरी सुप्रसिद्ध है। शंकराचार्य की जो गुरू परम्परा का है उससे पता लगता है कि प्राचीन काल से यह विद्या उत्तरोत्तर क्रम से शिष्य परम्परा से उपस्थित है। अतः निष्कर्ष निकलता है कि तांत्रिक साधना और शक्ति उपासना निर्विरोध रूप से वैदिक परम्परा के मान्य आचार्यों में भी समान रूप से प्रचलित थी।
            आगमशास्त्र की धार्मिक और साधनात्मक पृष्ठभूमि- तंत्र की अवधारणा है कि तांत्रिक साधना का उपदेश देवाधिदेव शिव के द्वारा हुआ है। शिव के सम्बन्ध में एक विशेष बात है कि जितना वह देवताओं के लिये मान्य थे उतना ही वे दैत्यों के भी मान्य हैं। शिव आर्यों और अनार्यों दोनों के लिये समान रूप से मान्य हैं। धर्म वास्तव में मानवतावादी होता है, कभी भी सम्प्रदायवादी नहीं होता है। धर्म मनुष्य मात्र के लिये कल्याण की कामना रखता है। जब धर्म में संकीर्णता आने लगती है और यह किसी विशेष वर्ग में बंधने लगता है तब वह सम्प्रदायवाद का रूप लेता है। तंत्र की इस दृष्टि से यह विशेषता सर्वोपरि है कि इसने सभी के तापों को दूर करने का विचार किया। अतः तंत्र की व्यापक दृष्टि सर्वापरि है इसी कारण यह अन्य सभी धर्मो से विशिष्ट भी है। यह वर्ग, जाति, स्थान, लिंग, आदि का भेद नहीं करता।
            उत्तर वैदिक काल में आर्यों का समाज चार वर्णों में विभक्त हो चुका था और स्मृतिकाल आते-आते स्त्रियों एवं शूद्रों को वेद पढ़ने तथा साद्दना से वंचित कर दिया गया। सामाजिक स्तर पर ऊँच-नीच तथा छुआछूत का भेदभाव बहुत बढ़ गया था। आर्य एवं अनार्य भेद हो चुका था। अतः मनुष्य जाति के लिये श्रेय के साधन और अवसर भी विषम हो गये थे। ऐसी परिस्थिति में आगम ही एक ऐसा साधन मार्ग था जो सभी को समान अवसर और समान प्रतिष्ठा देने वाला था।
            वैदिक काल में स्त्रियाँ भी मन्त्रों का साक्षात्कार करने वाली हुआ करती थीं और उच्चकोटि की साधिका होती थीं, पर बाद में उन्हें वेदाध्ययन और मंत्र साधना से वंचित कर दिया गया। शाक्त संप्रदाय ने स्त्रियों की पुनः प्रतिष्ठा की यहां तक कि उन्हें गुरूपद प्रदान किया। जिस नारी सम्प्रदाय को साधना विरोधी तत्वों द्वारा, नारी नरकस्यं द्वारं की स्थिति  तक पहुँचा दिया था, उन्हें साधना/उपास्य के सर्वोच्च पद पर स्थापित किया गया, उन्हें पूज्य माना गया और कहा गया कि  पुष्पेणाऽपि न ताडयेत् , अर्थात् स्त्री को पुष्प से भी ताड़न नहीं करना चाहिए। इसका अनुमान कुलार्णव तंत्र के वक्तव्य से लगाया जा सकता है कि जिसमें शिव के मुंह से यह वाक्य निसृत होता है कि चक्र में स्त्री हो अथवा पुरूष, क्लीव हो अथवा चाण्डाल, यहाँ तक कि उसमें द्विजोत्तम ही क्यों न हो फिर भी उन सभी में कोई भेद नहीं होता। यह भी कहा है कि चक्र में जाति भेद कहीं नहीं होता सभी शिव सदृश होते हैं जैसे वेद में स्थित सभी ब्रह्म कहलाते हैं उसी तरह चक्र में सभी पुरूष शिव के समान हैं और सभी स्त्रियाँ पार्वती के समान हैं।
            तंत्र ने धार्मिक दृष्टि से किसी का विरोध नहीं किया अपितु जो भी उपयोगी था उसे ग्रहण किया। जैसे वैदिक मंत्रों का भी उसमें समावेश पाया जाता है। तंत्र ने षट्चक्र, कुण्डलिनी योग, मंत्रयोग, अन्तर्योग आदि साधनाओं का उपयोग किया है।
            मनुष्य की प्रवृत्तियाँ भिन्न-भिन्न होती है तथा साधना क्रम में साधना की और साधक की अवस्थाओं में भिन्नता होती है। इस दृष्टि से दिव्य भाव की स्थिति में पहुँचने के पूर्व एक ही विधान से काम नहीं चल सकता, वैसा करने पर या तो सभी की प्रवृत्ति साधना में नहीं हो सकती, अथवा सम्यक् विकास में बाधा हो सकती है। इसीलिये तंत्र ने विभिन्न आचारों की व्यवस्था की है जबकि आचार प्रकृति तथा अवस्था के अनुसार एक व्यवस्था मात्र है। आचार बंधन नहीं है अपितु बंधन से मुक्ति का मार्ग है। आचार को तात्कालिक नियम भी कहा जा सकता है। तंत्र ने सात आचारों को स्वीकार किया है- वेदाचार, वैष्णवाचार, शैवाचार, दक्षिणाचार, वामाचार, सिद्धान्ताचार और कौलाचार। इन आचारों को उत्तरोत्तर क्रम से श्रेष्ठ माना गया है- सर्वेभ्यश्चोत्तभा वेदा वैष्णवं परम्। वैष्णवादुत्तमं शैवं शैवाद् दक्षिणामुत्तमम्।। दक्षिणादुत्तमं वामं वामात् सिद्धान्तमुत्तमम्। सिद्धान्तादुत्तमं कौलं कौलात्परतरंनहि।।
            इसी प्रकार साधनाक्रम में तंत्र तीन प्रकार के भावों पर विचार करता है, वे भाव है - पशु भाव, वीर भाव, दिव्य भाव,। ये भाव साधना की अवस्था के परिचायक हैं, और इनमें उत्तरोत्तर क्रम विकास भी होता है। यह आवश्यक नहीं है कि एक ही भाव में जीवन भर रहा जाए, अपितु लक्ष्य तो यह है कि सभी साधक दिव्य भाव में पहुँचे। कोई पशु भाव से आरम्भ करके दिव्य भाव में पहुँच सकता है।
            तंत्र का दृष्टिकोण अपने मूल लक्ष्य की प्राप्ति में सदा सतर्क है और उसकी प्राप्ति के लिये जितने भी कोषों से सहायता की अपेक्षा है, तंत्र उन सभी बिन्दुओं पर गंभीरता से ध्यान रखता है। तंत्र का मूल लक्ष्य है- ज्ञानोपलब्द्दि, आत्मसाक्षात्कार और त्रय-तापों से मुक्ति। जीवन मुक्त होना भी उसका लक्ष्य है। आगम जगत् से पलायन नहीं अपितु जगत् को स्वीकार करता है। इसीलिये तंत्र भोग और मोक्ष में विरोध अनुभव नहीं करता। कहा गया है कि जहाँ भोग है वहाँ मोक्ष नहीं हो सकता और जहाँ मोक्ष है वहाँ भोग नहीं हो सकता, किन्तु शक्ति उपासकों के लिये भोग और मोक्ष दोनों विरोधरहित होकर करस्थ रहते हैं। तंत्र का यह प्रसिद्ध श्लोक प्रायः उधृत है- यत्रास्ति भोगो न च मोक्षो यत्रास्ति मोक्षो न च तत्र भोगः। श्री सुन्दरी सेवन तत्पराणां भोगश्च मोक्षश्च करस्थ एव।।
            तंत्र वस्तुतः आत्म साक्षात्कार की साधना है इसीलिये तंत्र में अन्तर्यजन, कुण्डलिनी साधना और षट्चक्र पर पर्याप्त जोर डाला गया है। अन्तर्यजन के माध्यम से अन्तःकरण का परिष्कार होता है तथा साधक की तुरीयावस्था में पहुँचने की स्थिति बनती है। षट्चक्रों की साधना के माध्यम से मन का, विशेषतः अचेतन मन का विभिन्न स्थितियों मे अधिरोहण होता है। कुण्डलिनी का जागरण मूलतः आत्मा का अभ्युत्थान या आत्म साक्षात्कार  की दिशा में विकास की गति से जुड़ाव है। मंत्र को इस साक्षात्कार के क्रम में सबसे समर्थ साधन के रूप में स्वीकार किया गया है। मंत्र वर्णों या अक्षरों के योग से बनता है। भिन्न-भिन्न मंत्रों की संघटना भी भिन्न-भिन्न होती है। अक्षर कभी नहीं होता और वह सूक्ष्मता की स्थिति में निरन्तर व्यापक होकर तरंगित होता रहता है। इसी दृष्टि से शब्द को ब्रह्म माना गया है। शब्द की चार अवस्थाएँ होती हैं- वैखरी, मध्यमा, पश्यन्ति और परा। वैखरी प्रकट और स्थूल रूप है। मध्यमा से अन्तः प्रवेश होता है, तथा पश्यन्ती को पार कर परावस्था में पहुँचने पर साक्षात्कार, आत्मबोध या ब्रह्मबोध की स्थिति बनती है। इसी दृष्टि से मंत्र आगम साधना का सबसे समर्थ साधन है।
            तंत्र मूलतः आत्म साधना है। इसलिये तंत्र में जो बाह्यार्चन का विधान है वहाँ पर अपनी आत्मा को ही भावरूप में इष्ट देवता मानकर यंत्र पर स्थापित किया जाता है और उसका अर्चन किया जाता है। दशमहाविद्याओं की अथवा अन्य देवताओं की रूप कल्पना करके जो ध्यान, साधना और उसका अर्चन विधान है वह आत्मा का ही रूपान्तरित रूप है। इस प्रकार की परिकल्पना से अर्थात् किसी देवता को ब्रह्मरूप एवं इष्ट मान लेने से मनुष्य के मन में अहंकार के उदय की संभावना कम होती है तथा जीव जो सीमा से बद्ध है असीम के साथ जुड़ने के प्रशस्त पथ पर बढ़ने में सुविधा का अनुभव करता है। बाहर से जो रूप साधना प्रतीत होती है वह वस्तुतः अल्प बोध के लिये मार्ग है। मनुष्य को बाह्य रूप से जो बंधन दिखाई पड़ते हैं वे इतने कठोर होते हैं कि जीव, जीवन-पर्यन्त अथवा जन्मान्तरों तक अपने स्वरूप के बोध में असमर्थ रहता है। यद्यपि ये बंधन संस्कारगत होते हैं, किन्तु ये इतने गहरे होते है कि इनसे छुटकारा पाना आसान नहीं होता। इन बंधनों को आगमशास्त्र में पाश कहा गया है और कहा गया है कि जब तक मनुष्य इन बंधनों से युक्त है तक तक वह जीव कहलाता है और जब इनसे मुक्त हो जाता है तो वह जीवन्मुक्त अर्थात् सदाशिव हो जाता है।
            वेदों में शक्ति तत्वः- शक्ति तत्व की उपासना अनादिकाल से ही संसार में होती आ रही है। इससे लौकिक एवं पारमार्थिक दोनों विषयों की सिद्धि होती है। बल, ऐश्वर्य, ज्ञान, सौन्दर्य, निःश्रेयस आदि शक्ति तत्व के ही रूपान्तर हैं। ब्रह्म भी शक्ति तत्व का अभिन्न रूपान्तर ही है। आचार्य भगवत्पाद ने सौन्दर्य लहरी में कहा हैं -
शिवः शक्तया युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं,
न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमति।।
            ब्रह्म शक्ति तत्व युक्त होकर ही कार्य करने में समर्थ है अन्यथा कुछ भी नहीं कर सकता है। प्रत्यक्ष रूप में भी देखा गया है कि शक्तिमान ही कार्य करता है। इतिहास से भी यह बात स्पष्ट है कि सदैव शक्तिशालियों का ही बोलबाला रहा है।
            वैदिक साहित्य में भी सबसे प्राचीन संहिता ग्रन्थों में अनेक मन्त्रों में शक्ति-तत्व का रहस्य कहा गया है। देवी सूक्त, रात्रि सूक्त, सरस्वती सूक्त आदि प्रसिद्ध हैं। अथर्ववेद के प्रथम काण्ड के तेरहवें सूक्त में चार मन्त्र हैं- सूक्त के भृगु अंगरिस ऋषि हैं। विद्युत देवता है। विद्युत्तत्व के द्रष्टा भृगु मुनि की शक्ति का उदाहरण पुराणों में जिस प्रकार दिया गया है वैसा अन्य किसी आर्य ग्रन्थ में नहीं मिलता है। भृगु मुनि इतने शक्तिशाली हैं कि उन्हांने ब्रह्मा, विष्णु और महेश की परीक्षा में विष्णु के लात मारी थी। यह महत्व शक्ति का ही है। भृगु अंगिरा मुनि ने ही इस अनादि शक्ति विज्ञान को जगत् के सामने प्रकट किया है। विद्युत इस सूक्त का प्रतिपाद्य देवता रूप शक्ति पदार्थ है। पाश्चात्य विज्ञान के मत से बिजली तत्व का जो प्रचार एवं उपयोग हो रहा है वह इसका स्थूल रूप ही है।
            विद्युत में गति है। जहाँ शब्द का होना नियम सिद्ध है। शब्द ही वज्र है अथवा उसकी अभिन्न शक्ति ही वज्र कहलाती है - वज्र एव वाक्। महर्षि पतंजलि महाभाष्य में कहते हैं - सवाग्वज्रो यजमानं हनस्ति वह वाणी वज्र होकर यजमान का विनाश कर देती है। अस्तु बिजली शक्ति के भौतिक दैविक एवं आध्यात्मिक रूप होते हैं। इसीलिए मंत्रों को बहुत सोच समझ कर प्रयोग करने की बात प्रत्येक तंत्र ग्रन्थ में कही गई है। 
            तांत्रिक ग्रन्थों में भगवान् शिव बताते हैं कि मूलाधार चक्र में सर्प की आकृति में साढ़े तीन फेरे में लिपटी इस जगत का अभिन्न निमित्तोपादन कारण शक्ति तत्व ही है। यह तत्व आन्तरिक साधन से जागृत होता है। त्रिपुरासार समुच्चय में कहा गया है -
            शक्तिः कुण्डलिनीति यानिगविता आईम संज्ञा जगन्निर्माणे सततोद्यता प्रचिलसत् सौदामिनी सिन्नभां शंखावर्तनिभां प्रसुप्त भुजगाकारं जगन्मोहिनीम् तन्मध्ये परिभावयेद् विसलतातन्तुपमेया कृत्तिम।। हूं कारेण गुरूपदिष्टविधिना प्रात्थाप्य सुप्तां समाहितमनास्तामुच्चरेत् कौशिकीं शक्ति ब्रह्ममहापथेन सहितामाधारतः स्वात्मना।।
            अर्थात् आईम संज्ञावली जगत् रचना में सततोद्यत, चमकती हुई बिजली के सदृश, शंख के मुख के समान आवर्त (चक्करदार) सदृश, सोये हुए सर्प के समान, सारे जगत् को मुग्ध करने वाली, विस तन्तु के समान कुण्डलिनी शक्ति मानी गई है। गुरू द्वारा बताई गई रीति से हूँ बीज के अभ्यास से सोई हुई कुण्डलिनी को उठाकर परम चित्कला से उसका योग करके आधार पद्म से लेकर सहस्रार पर्यन्त समस्त षट्चक्रों का समाहित मन द्वारा अनुभव करना चाहिए।।
            सर्व खल्विदं ब्रह्म के अनुसार शक्ति का स्थूल रूप इस पराशक्ति का रूपान्तर है। जो गुण की विचित्रता से नाना प्रकार प्रतीत हो रहा है। एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति का यही अभिप्राय है।
            द्वैत अवस्था में रहते हुए योग क्षेम की प्राप्ति करना भी अत्यंत आवश्यक है अतः सूक्त के दूसरे मन्त्र द्वारा ऋषि कहते हैं -नमस्ते प्रवतो न पाद्यस्तपः समुहसि।
            मृडया नस्तनूभ्यो मयस्तोकेभ्यस्कृधि।।
            हे देवि, प्रकृष्ट ज्ञानवालों को तू पतन की ओर नहीं ले जाती है इसलिये तुझे नमस्कार है क्योंकि तू तप, ज्ञान आदि श्रेष्ठ वस्तुओं का समूह  है। अपने कल्याणात्मक रूपों से हमारी रक्षा कर। हम तेरी सन्तान हैं। हमारे लिये कल्याण का दर्शन करो।
            भुक्ति-मुक्ति दोनों प्रकारों की प्राप्ति शक्ति साधना से होती है। इसी अभिप्राय से सप्तशती ग्रन्थ में सुरथ तथा समाधि इन दोनों अधिकारियों कों मेधा महर्षि ने उपदेश दिया है। भोगश्च मोक्षश्यच करस्थ एव - वाला सिद्धान्त इसी तत्व पर माना गया है।
            अन्धन्तमः प्रविशन्ति ये अविद्यामुपासते में भी उक्त तत्व को कहा गया है - अविद्या की उपासना करने वाले अंधकार में चले जाते हैं यही पतन है। विद्ययामृतमश्नुते विद्या से ही अमृत की प्राप्ति होती है। अस्तु तू विद्वानों को पतन की ओर नहीं ले जाती हैैै। अतः हमें भी वही मार्ग बता।
            अहं मम रूप अविद्या जन्म संसार में ही लगे रहने वाले जीव बार-बार जन्म मरण रूप संसार में आते रहते हैं क्योंकि उनके सुख का आद्दार क्षणिक, विनाशी, आपात् रमणीय यह संसार ही है। उन्हें शान्ति नहीं मिलती। अतः मुमुक्षु इससे विरक्त होकर विद्या का अनुसरण करता है। गीता में कहा है- यद् गत्वान निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम। इसी को कठोपनिषद् में- सोऽध्वनः पारमाप्नोति यस्माद् भूयो न जायते। इस प्रकार कहा गया है, अर्थात् ब्रह्म को प्राप्त होने पर फिर संसार में मुमुक्षु नहीं आता। इसी तत्व को प्रवतो न यात् इस पद से कहा गया है। यही शक्ति का परमधाम है। सप्तशती में कहा गया है -मोक्षार्थिभिर्मुनिभिरस्त समस्त दोषैविद्यासि सा भगवती परमाहि देवि। अर्थात् समस्त अविद्या दोषों से रहित होकर मोक्षार्थी मुनिगण विद्या रूप से तुम्हारा ही अभ्यास करते हैं। वह विद्या तुम हो। जब-जब भक्त समुदाय असुरों से पीड़ित होता है, तब-तब असुरों के विनाशार्थ श्री आदिशक्ति का आविर्भाव होता है जिसे किसी न किसी प्रकार से समस्त आस्तिक समुदाय मानता है।
            दुर्गा सप्तशती में श्री भगवती के अस्त्रों से रक्षा की प्रार्थना की गई है। खड्ग शूल गदादीनि यानि चास्त्राणि तेऽम्बिके। कर पल्लव संगीन तैरस्मान् रक्ष सर्वतः।। अर्थात् हे अम्बिके, खड्ग शूल गदा आदि जितने तुम्हारे अस्त्र शस्त्र हैं, उनसे आप सब ओर से हमारी रक्षा करें। हे देवि, समुद्र परमात्मा में अभेद सम्बन्ध सामरस्य भावापन्न होकर तू छिपी हुई है उसे हम उपनिषद द्वारा जानते हैं।
            मम योतिरप्सु अन्तः समुद्रे- इस मंत्र में भी समुद्र पद आधारार्थों में व्यवहृत हुआ है। सायणाचार्य ने इसका अर्थ परमात्मा ही किया है- समुद्रवन्त्यस्माद्भूतानि इति समुद्रः परमात्मा अर्थात् सब प्राणी समूह जिससे प्रकट होते हैं इसलिये परमात्मा को समुद्र कहते हैं। बहुत लोग इस मंत्रांश से ब्रह्म को कारण तथा शक्ति तत्व को कार्य समझते हैं परन्तु यह उनका भ्रम है। गीता में ब्रह्म का योनि कारण शक्ति को ही माना गया है। ममयोनिर्महद् ब्रह्म तस्मिनगर्भ दधाम्यहम्। वास्तव में निमित्त की अपेक्षा से ब्रह्म, शक्ति दोनों के परम कारणत्व का व्यवहार होता है।
            प्राणो वा अपानो व्यानेस्तस्रों देव्यः अर्थात् प्राण अपान और व्यान तीनों को देवी बताया गया है। वास्तव में प्राण ही शक्ति है। इसी को लोक में आत्मबल कहते हैं। इसी प्राण, अपान और व्यान को पौराणिक सिद्धान्त में महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती, कहते हैं। महाविद्याक्रम में यही काली तारा षोडशी कहलाती है।
            ता वा एता देव्यः दिशो ह्येता अर्थात् ये दशां दिशाएँ ही दश देवियाँ है। महा भागवत में ऐसी कथा आई है कि, जब सती अपने पिता दक्ष के घर जाने लगी तब उन्हें श्री शंकर ने रोका। तब अपने भयानक रूप को प्रकट किया श्री महादेव उसे न देख सकने के कारण भागे, तब भगवती ने अपने दश महाविद्या रूप दशों दिशाओं में धारण कर श्री शंकर को रोका था।
            दुर्गा सप्तशती मध्यम चरित्र की कथा को मार्कण्डेय पुराण में विस्तार से कहा गया है- सप्तशती के दूसरे अध्याय में यह कथा आई है कि महिषासुर दैत्य ने एक समय अपने आतंक से देवताओं को पीड़ित किया था। देवताओं ने ब्रह्मा, विष्णु और महेश के साथ मिलकर एक महान तेज प्रकट किया। वह तेज दिव्य स्त्री के रूप में प्रकट हुआ। अपने-अपने अस्त्र शस्त्र को उसे सब देवताओं ने प्रदान किया। सभी के अंग के रूप में वह महाशक्ति बनी थी, जिसे कहा गया है- निःशेष देवगण शक्ति समूह मूर्त्या अर्थात् समस्त देवताओं के शक्ति समूह से ही वह मूर्ति बनी थी। इसे ही सूक्त में यां तवां असृजन्त विदथे गुणानां इन रहस्यमय पदों से कहा गया हैं। उस महाशक्ति ने महिषासुर को युद्ध में मारा जिसे  ब्रह्मा, विष्णु आदि देवता भी नहीं मार सके थे।
            असुरों पर विजय प्राप्त करने पर देवताओं के अभिमान को निवृत्त करने के लिए साक्षात् कृपामयी हेमवती उमा का आविर्भाव केनोपनिषद ने बड़े ही सुन्दर रूप से लिखा है। ब्रह्मविद्या ही अभिमान अहंकार आदि रहित, शाश्वत शान्ति को देने वाली है, उसके बिना लौकिक विजय पुनः पतन का हेतु हो सकती है। अतः उपनिषद का उपसंहार- ज्येये स्वर्गे प्रतिष्ठित रूप में किया गया है। दुर्गा सप्तशती के चौथे अध्याय में उसी महत्वपूर्ण महती देवता की स्तुति भी देवताओं ने की है। संगच्छध्वं संवदध्वं संवोमनांसि जानताम् वाले वैदिक एकता के रहस्य को प्रकट करने के लिये मध्यम चरित्र की कथा लिखी गई है। सप्प्तशती शक्ति तत्व के समस्त रहस्यों को प्रकट करने वाला ग्रन्थ रत्न है। संघे शक्तिः वाली युक्ति शक्तिवाद की सर्वश्रेष्ठ उक्ति है। ऐसा कहा जाता है कि प्रथम उत्तर चरित्रों का पाठ अकेले करना मना है, किन्तु मध्यम चरित्र का पाठ अकेले भी कर सकते हैं। एकेन वा मध्यमेन नैकेनेतरयोरिह अर्थात् एक मध्यम चरित्र के पाठ से ही पूर्णता हो जाती है। एकता के विषय में वेद का कथन है- तंत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः अर्थात् एकता देखने वाले ज्ञानी समाज को शोक क्या? और मोह क्या? युद्ध या विप्लव के समय ही एकता का परम उपयोग होता है, क्यांकि युद्ध एक महान आपत्ति है। स्वार्थपरायणता के समय ही युद्ध होता है। व्यक्तिगत स्वार्थ से ही किसी देश, संस्कृति और जाति का पतन होता है। ऐसे समय में महालक्ष्मी सुमति प्रदान कर अपने राष्ट्र भक्तों की रक्षा करती है अतः उसकी स्तुति पूजा होती रहना चाहिए। महाभारत युद्ध में प्रवृत्त अर्जुन को श्री कृष्ण ने गीतोपदेश के प्रथम श्री दुर्गा भगवती की स्तुति करने को कहा था जिसे भीष्मपर्व में बड़े ही सुन्दर ढंग से बताया गया है। मन एवास्तु तुभ्यम् अर्थात् तुम एक ही को हमारा नमस्कार है। सूक्त में सात बार नमः शब्द का प्रयोग होने से संसार की संचालिका सप्त मातृका रूप को, तथा निवृत्ति की सप्तभूमिका को नमस्कार किया गया है, तस्यै ते नमोस्तु देवि, इस स्त्रीलिंग वाचक तस्मै देवि पदों से यह सूक्त शक्तिवाद का पोषक है, यह सिद्ध हो जाता है।
अन्य साधना-पद्धतियों पर आगमशास्त्र का प्रभाव-
            आगमशास्त्र अपनी वैज्ञानिकता/विशिष्टता के कारण भारत की अन्य साधना पद्धतियों को प्रभावित करता रहा है। यह प्रभाव बहुत गहराई है। प्रायः सभी पद्धतियों को तंत्र के प्रभावित करने अथवा अन्य पद्धतियों को तंत्र के प्रभाव को ग्रहण करने में मुख्य कारण यह है कि तंत्र की पद्धति वैज्ञानिक है तथा सर्वांगीण है। तंत्र ने साधना के क्षेत्र में कुछ ऐसे अन्वेषण किये है जो तंत्र के पूर्व नहीं थे और आत्म साक्षात्कार के कुछ ऐसे भी सूत्र हैं जो कई दृष्टियों से विभिन्न अवस्थाओं में साधक के लिये अधिक सुविधाजनक और उपयोगी हो सकते हैं। वैदिक काल में साधना का रूप यज्ञ था और वैदिक ऋचाओं का पाठ करना था। मंत्र जप का और मंत्र के पुरश्चरण का विधान नहीं था किन्तु तंत्र ने ही मंत्रों के जप को वाचिक, उपांशु और मानसिक में परिणित किया है।
            प्राचीन काल से लेकर मध्यकाल तक विभिन्न साधना पद्धतियों में तंत्र से प्रभाव ग्रहण करने की यह प्रक्रिया चलती रही है। वैष्णव पद्धति तो तंत्र के अंतर्गत ही आती है किन्तु जहाँ से वैष्णव में विरोध प्रतीत होता है वहाँ भी उनकी प्रक्रिया में तांत्रिक पद्धति का बहुत दूर तक समावेश है और जो विरोध दिखाई पड़ता है वह मंत्र के आधार से सम्बन्ध रखता है उसकी समग्रता से नही।
            बौद्धधर्म में तो तंत्र को प्रत्यक्षतः पूरी तरह स्वीकार कर लिया गया और इस दृष्टि से उसकी एक शाखा वज्रयान अत्यन्त महत्वपूर्ण है। बौद्धों ने तंत्र को अपनी तरह से विकसित करने में योगदान किया है। उन्हांने चीनाचार के माध्यम से भी बहुत कुछ ग्रहण किया है। तारा महाविद्या उनकी मुख्य साधना रही है। जैन धर्म में भी तंत्र का प्रभाव समुचित रूप से देखा जाता है।
            इस प्रकार हम देखते हैं कि भारत की सभी साधना पद्धतियाँ तंत्र से प्रभावित हैं। यह अलग बात है कि किस पद्धति को कितनी सफलता मिली। कुछ पद्धतियों ने केवल तंत्र में योग के हिस्से को लेकर अपने को विकसित किया है और कुछ ने इसके साथ कुछ अन्य अंगों को भी लेकर विकसित किया है। मध्यकाल में गोरखनाथ का सम्प्रदाय जो कि योग के लिए विख्यात है, उस सम्प्रदाय ने तंत्र को ग्रहण करके अपनी पद्धति को अलग तरह से विकसित किया। यदि सारी पद्धतियों में तंत्र प्रभाव ग्रहण की खोज और विश्लेषण किया जाय तो यह शोध हेतु एक पूर्ण विषय होगा। अब इस लेख को यहीं समाप्त करता हूं।
            विशेष जानकारी हेतु मेरे द्वारा लिखे शीघ्र प्रकाशित होने जा रहे महाग्रन्थ श्री विद्या रहस्य, एवं यंत्र मंत्र तंत्र महासागर का अध्ययन करें।