Monday, January 23, 2017

(आगमशास्त्र (तंत्र) साधना विषयक कुछ आवश्यक तथ्य)



भारतीय दर्शन एवं आगमशास्त्र की साधना पद्धतियों में तन्त्र शब्द का व्यापक प्रयोग हुआ है। आगमशास्त्र वस्तुतः अत्यन्त गम्भीर चिन्तन व वैज्ञानिक प्रक्रिया के अन्तर्गत है, परन्तु जिस शास्त्र का विशेष साधना एवं साधना पद्धति के रूप में प्रयोग हुआ है वह साधना के एक व्यापक आयाम में प्रयुक्त हुआ है और वर्तमान में उसके जो भेद दिखाई पड़ते है वे बाद के हैं। आगमशास्त्र एक वैज्ञानिक पद्धति है जो विभिन्न देवताओं का अवलम्बन करके परम तत्व तक पहुँचने का द्वार खोलती है। आगमशस्त्र में जो विविध रूपात्मकता दिखाई पड़ती है इसका मुख्य कारण है कि चूँकि मनुष्य रूपवान है इसलिए प्रथमतः रूप का माध्यम ग्रहण करना साधना में विकास के लिए सुविधाजनक और सरल है। वस्तुतः आगमशस्त्र अरूप की यात्रा का लक्ष्य प्रदर्शित करता है और निराकार तक पहुँचने के लिए यात्रा पथ के रूप में कार्य करता है, अतः आगमशास्त्र रूप के माध्यम से अरूप तक पहुँचने की एक विशिष्ट साधना पद्धति है जो सनातन साधना पद्धतियों में सर्वत्र व्याप्त है।
            तन्त्र का शब्दिक अर्थ- तन्त्र का उच्चारण करने से रूढ़-रूप में एक विशेष पद्धति का बोध होता है और वह पद्धति साधना की है। इस पद्धति की विवेचना से पूर्व तन्त्र की व्युत्पत्ति का ज्ञान अति आवश्यक है। तन्त्र शब्द की व्युत्पत्ति (तनु) धातु से हुई है। तनु का अर्थ है विस्तार करना। (तनोति विस्तारयति ज्ञानं येन यस्मात् वा तत् तन्त्रम्, अथवा तन्यते विस्तारयते ज्ञानं अनेन इति तन्त्रम्)।
            व्याकरण के दृष्टिकोण से तनु धातु के साथ त्रयीधातु का भी योग है जिससे एक अर्थ इसमें जुड़ जाता है- रक्षा करने का अर्थात् तन्त्र ज्ञान का विस्तार तो करता ही है साथ ही रक्षा भी करता है। इससे स्पष्ट है कि तन्त्र साधक को आधिभौतिक, आधिदैविक तथा आध्यात्मिक तीनों प्रकार के तापों से छुटकारा दिलाता है तथा भय-मुक्त भी करता है। तनोति विपुलानर्थान् तन्त्रमन्त्राणि समन्वितान्। त्राणं च कुरूते यस्मात्तन्त्रमित्यभिधीयते।। तन्त्रम्-इति-अभिधीयते।
            तन्त्र की व्यापकता व विशिष्टता के कारण प्राचीन काल में शास्त्र और विज्ञान को भी तन्त्र कहा जाता था। न्याय, सांख्य और योगशास्त्र को भी अनेक स्थानों पर तन्त्र शब्द से प्रदर्शित किया गया है। आयुर्वेद शास्त्र के अनेक उपखंडों के नाम में तन्त्र शब्द का जुड़ाव देखने को मिलता हहै जैसे शल्य तन्त्र, शालाक्य तन्त्र।
            परन्तु यहाँ पर जिस तन्त्र से तात्पर्य है वह एक विशेष पद्धति तथा विशेष दर्शन है। तन्त्र का ही शास्त्रीय नाम आगम है और आगम को वेद की भाँति ही मान्यता प्राप्त है। आगम इसलिए भी तन्त्र को कहा जाता है क्योंकि तन्त्र ग्रन्थों में प्रायः वक्ता देवाधिदेव शिव हैं और श्रोता जगत्जननी भगवती पार्वती, कहीं-कहीं इसके विपरीत भी है जहां वक्ता मां पार्वती और श्रोता महादेव शिव है। आगमशास्त्र में सृष्टि, प्रलय, देवतार्चन, मन्त्रों की साधना, पुरश्चरण, षट्कर्म, ध्यान-योग आदि समस्त विषयों पर अत्यन्त गंभीरतापूर्वक विचार किया गया है।
            आगम शास्त्र में इस बात का भी उल्लेख आया है कि कलियुग में आगम साधना ही प्रभावकारी तथा सिद्धिदात्री हो सकती है। प्रपंचसार तन्त्र का मत है कि सत-युग में श्रुतियों के अनुसार त्रेता-युग में स्मृतियों के अनुसार, द्वापर-युग में पुराणों के अनुसार एवं कलियुग में आगमशास्त्र के अनुसार ही धर्म की सार्थकता होती है।
            महानिर्वाण तन्त्र इस बात की घोषणा करता है कि कलियुग में आगम-मार्ग के अतिरिक्त मुक्ति पाने का दूसरा मार्ग नहीं है। शिव के मुख से बताया गया है कि- कलि-युग में जो व्यक्ति आगमशास्त्र का मार्ग त्याग कर अन्य साधना करता है, उसकी गति कदापि संभव नहीं है, यह सर्वथा सत्य है और इसमें तनिक सन्देह नहीं है।
            आगम साहित्य- आगमशास्त्र में शिव के पाँच मुख हैं जो तन्त्र में प्रतीक रूप में गृहण किए गए हैं। यही प्रकारान्तर से आम्नाय का रूप धारण करते हैं। निष्कल शिव सर्वप्रथम नाद के रूप में उद्भासित होते हैं और बिन्दु के स्वरूप को उद्भासित करते हुए आगे के विकास क्रम को प्रदर्शित करते हैं। कामिकागम के अनुसार सदाशिव के प्रत्येक मुख से पाँच श्रोतों का निर्गमन हुआ है वे श्रोत हैं- लौकिक, आध्यात्मिक, वैदिक, अतिमार्ग और मन्त्रात्मक। इस प्रकार शिव के पाँच मुख होने से श्रोतों की संख्या 25 हो जाती है। विभिन्न तन्त्र ग्रन्थों में इसका वर्णन प्राप्त है। मन्त्रात्मक तन्त्र भी पांच प्रकार के हैं। शिव के मुख पाँच होने से इनकी संख्या भी पाँच होती है और तन्त्र ग्रन्थों में आम्नाय शब्द से इन्हें बताया गया है। आम्नायों के नाम हैं- ऊर्ध्वाम्नाय, पूर्वाम्नाय, पश्चिमाम्नाय, दक्षिणाम्नाय और उत्तराम्नाय। ऊर्ध्व-मुख से उत्पन्न (मुक्ति देने वाला), पूर्व मुख से उत्पन्न (सर्वविषों को हरने वाला), उत्तर मुख से उत्पन्न (वशीकरण करने वाला), पश्चिम मुख से उत्पन्न (भूत-पिशाच ग्रह निवारण करने वाला), तथा दक्षिण मुख से उत्पन्न (शत्रुओं पर विजय दिलाने वाला) है। इसका विस्तृत विवरण कामिकागम में दिया गया है।
            आगमशास्त्र के विषय में उल्लेखनीय है कि कोई भी मंत्र प्रयोग बिना योग्य गुरू के निर्देशन के नहीं करना चाहिए, पुस्तकों, समाचारपत्रों में पढ़ कर या टेलीविजन पर देख कर भी इनके प्रयोग कदापि नहीं करने चाहिए। इसका कारण यह है कि समाचारपत्रों में या टेलीविजन में जो लोग आगमशास्त्रीय मंत्रों को करने की सलाह देते नजर आते हैं वे भी तंत्र के मर्म को नहीं जानते हैं और पुस्तकों में उनकी फलश्रुति पढ़ कर बताने लगते हैं जिनके करने से लाभ तो दूर, हानि की सम्भावनाएं प्रबल हो जाती हैं, क्योंकि आगमशास्त्र में काफी जटिलताएं हैं। आगमशास्त्र के अनुसार एक मंत्र किसी के लिए लाभदायक हो सकता है वहीं दूसरी ओर वही मंत्र दूसरे व्यक्ति के लिए अनिष्टकारक हो सकता है। प्रत्येक व्यक्ति का अपना (कुल) होता है, कुल के विपरीत मंत्र का प्रयोग सदैव कष्टदायी होगा, इसमें रंचमात्र सन्देह नहीं है। अतः आगमशास्त्र के मंत्रों के प्रयोग से पूर्व (अ क ड म), (अष्ट दल महा पद्म चक्र), (पद्म महा चक्र), (कुलाकुल चक्र), (तारा चक्र), (गण विचार), (राशि चक्र), (कूर्म चक्र), (शिव चक्र), (विष्णु चक्र), के द्वारा मंत्र का शोधन या तो स्वयं कर लेना चाहिए अथवा कि आगमशास्त्र के जानकार से करवा लेना चाहिए। आगमशास्त्र की विधियों का पूर्णरूपेण पालन करते हुए जब मंत्र सिद्धि की जाती है तब निःसन्देह साधक की मनोकामना की पूर्ति होती है।     
            तन्त्र ग्रन्थों में तन्त्र की संख्या का उल्लेख मिलता है, पर उनमें भिन्नता पायी जाती है, श्री कण्ठ संहिता, वामकेश्वर तन्त्र आदि तन्त्र ग्रन्थों में चौंसठ तन्त्रों की संख्या मिलती है, और रथकान्ता, विष्णुकान्ता, और अश्वकान्ता, में भी चौंसठ तन्त्रों का विवरण मिलता है, परन्तु चौसठ तन्त्रों के नामों में कुछ भेद भी मिलता है। वामकेश्वर तन्त्र के अनुसार चौंसठ-तन्त्रों के नाम निम्नलिखित हैं-
            (1) गणेशयामल (2) रूद्रयामल (3) महाकालीमत (4) लक्ष्मीयामल (5) उमायामल (6) स्कन्दयामल  (7) जयद्रथयामल  (8) महालक्ष्मीमत (9) कौमारी (10) वैष्णवी (11) वाराही (12) माहेन्द्री (13) चामुण्डा (14) शिवदूती (15) ब्रह्मयामल 16) विष्णुयामल (17) शम्बर (18) जालशम्बर (19) तत्वशम्बर (20) भैरवाष्टक (21) महामाया (22) ब्राह्मी      (23) चन्द्रज्ञान (24) वासुकी (25) महासंमोहन (26) महोच्छुष्म (27) वातुल (28) वातुलोत्तर (29) हृद्भेद (30) तन्त्रभेद (31) गुह्य तन्त्र (32) कामिक (33) कलावाद (34) कलासार (35) कुब्जिकामत (36) तन्त्रोत्तर (37) चीनाख्य (38) तोडल (39) तोडलोत्तर (40) पंचामृत (41) वीरावली (42) सर्वज्ञानोत्तर (43) कुलसार (44) कुलोड्डीश (45) कुल चूड़ामणि (46) भूतडामर (47) योगिनी (48) माहेश्वरी (49) विशुद्धेश्वर तन्त्र (50) कुरुपिकामत (51) रूपिकामत (52) सर्ववीरमत (53) विमलामत (54) पूर्वाम्नाय (55) पश्चिमाम्नाय (56) दक्षिणाम्नाय (57) उत्तराम्नाय (58) ऊर्ध्वाम्नाय (59) वैशेषिक मत (60) ज्ञानार्णव (61) रूप भेद (62) अरूणेश (63) मोहिनीश (64) सिद्धयोगेश्वरीमत।
            उल्लेखनीय है कि भिन्न-भिन्न आगम ग्रन्थों में चौंसठ तन्त्रों के नाम आते हैं उनमें संख्या तो 64 ही रहती है परन्तु नामों में अन्तर आ जाता है। मुख्यतः इसका विवरण श्री कण्ठ संहिता, वामकेश्वर तन्त्र, भास्करराय सम्मत सर्वोल्लास तन्त्र, तोडलोत्तर तन्त्र, महासिद्धिसार तन्त्र आदि में मिलता है।
            आदि गुरू शंकराचार्य ने सौन्दर्य लहरी में चौंसठ तंत्रों की संख्या का उल्लेख किया है। चौंसठ की संख्या शायद शिव द्वारा अभिमत चौंसठ वर्णों की निर्देशिका हो सकती है। यह अनुमान है कि विभिन्न मतों तथा विभिन्न कालों में भिन्न-भिन्न तंत्रों का निर्माण हुआ। वर्तमान में सभी तंत्र ग्रन्थ उपलब्ध नहीं होते हैं फिर भी जो प्राप्त हैं उनकी संख्या पर्याप्त है। इसके अतिरिक्त पीठ, भैरव तथा यामल के आधार पर तंत्रों के नाम उपलब्ध होते हैं। पीठ के अनुसार विद्यापीठ, मंत्रपीठ, मुद्रापीठ और मंडल पीठ हैं, जो वस्तुतः तंत्रों के ही भेद हैं। पीठ से सम्बन्धित तंत्रों के नाम इस प्रकार हैं - लाकिनी कल्प, योगिनी जाल, योगिनी हृदय इत्यादि। भैरवों के नामानुसार तंत्रों के जो नाम हैं वे हैं- स्वच्छन्द भैरव, क्रोध भैरव, उन्मत्त भैरव, उग्र भैरव, कपाल भैरव, झंकार भैरव, शेखर भैरव और विजय भैरव आदि। यामल के अनुसार यामलों के आठ नाम हैं- ब्रह्म यामल, विष्णु यामल, रूद्र यामल, कुबेर यामल, स्कन्द यामल, यम यामल, वायु यामल और इन्द्र यामल। इन यामलों के नामों में कहीं-कहीं नामान्तर भी मिलता है। संमोहन तंत्र में कहा गया है कि चीन में 100 मूल तंत्र और 37 उपतंत्र है। द्रविड़ में 20 मूल और 25 उपतंत्र हैं। केरल में 60 मूलतंत्र और 500 उपतंत्र हैं। काश्मीर में 100 मूलतंत्र और 10 उपतंत्र है तथा गौड़ में 27 मूलतंत्र और 16 उपतंत्र हैं। शैव, वैष्णव, गाणपत्य और सौर-भेद से इनकी संख्या में और भी अधिकता आ जाती है।
            शाक्त तंत्रों में उपास्य देवताओं के अनुसार भी तंत्र ग्रन्थों में विभाग है। इस दृष्टि से काली, तारा, श्री विद्या, भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्ता, धूमावती, बगला, मातंगी, कमला इन दश महाविद्याओं से सम्बद्ध अलग-अलग ग्रन्थ उपलब्ध हैं।
            महाविद्या काली से सम्बन्धित ग्रन्थों की संख्या काफी है। इनमें से कुछ मुख्य नाम इस प्रकार है - काली यामल, काली कल्प, कालीकुल क्रमार्चन, काली विलास तंत्र, काली कुल सर्वस्व, काली सपर्याक्रम, काली तंत्र, काली परा, कालीकुल, कालिकार्णव, भद्रकाली चिंतामणि, व्योमकेश संहिता, कल्पवल्ली, श्यामा रहस्य, विश्वसार तंत्र, कामेश्वरी तंत्र, कुल चूड़ामणि, कौलावलि, कुलमूलावतार, श्यामासपर्या, शक्ति संगम तंत्र, आदि महत्वपूर्ण हैं। अनेक ग्रन्थ ऐसे भी हैं जो विभिन्न देवताओं की उपासना से सम्बन्धित सामग्री से परिपूर्ण है। यह एक प्रकार से संकलन ग्रंथ हैं फिर भी महत्वपूर्ण हैं, जैसे मंत्र महार्णव, मंत्र-महोदधि, शाक्त प्रमोद, तंत्रसार, शारदा तिलक आदि।
            महाविद्या तारा से सम्बन्धित जो ग्रन्थ हैं उनमें मुख्य हैं- तारोपनिषद, तारार्णव, तारा तंत्र, तारा रहस्य, तारा कल्प, तारा सूक्त, तोडल तंत्र,  नील यंत्र, महानील तंत्र, नील सरस्वती तंत्र, चीनाचार, तन्त्र रत्न, तारा शाबर तंत्र,  एक-जटी तंत्र, एक जटा-कल्प, महाचीनाचार क्रम, एक-वीर तंत्र, तारिणी तंत्र आदि। तारा से सम्बद्ध संकलन ग्रन्थ भी हैं, उनमें मुख्य तारा भक्ति सुधार्णव है।
            महाविद्या श्री विद्या से सम्बन्धित जो ग्रन्थ उपलब्द्द होते हैं उनमें मुख्य हैं- त्रिपुरा रहस्य (माहात्म्य खण्ड एवं ज्ञान खण्ड), श्री विद्यार्णव तंत्र, श्री विद्या रत्नाकर एवं श्री विद्या वरिवस्या ( दोनों ग्रन्थ ब्रह्मलीन धर्म-सम्राट् यतिचक्र चूड़ामणि पूज्य चरण-रज स्वामी करपात्रि जी महाराज द्वारा रचित) स्वच्छन्द तंत्र, कालोत्तर वासना, श्री पराक्रम, ललितार्चन, चन्द्रिका, सौभाग्य तन्त्रोत्तर, सौभाग्य सुभगोदय, शक्ति संगम तंत्र का सुन्दरी खण्ड, श्री क्रमोतंग, सुभगपारिजात,  सुभगार्चारत्न, चन्द्र ज्ञान, सुन्दरी हृदय, नित्याषोडशिकार्णव, मातृका हृदय, संमोहन, वामकेश्वर, बहुरूपाष्टक, प्रस्तावचिन्तामणि और मेरू प्रस्तर। इसके अतिरिक्त संकलन ग्रन्थ, श्री योगिनी हृदय, परशुराम कल्प सूत्र वृत्ति, परमानन्द तंत्र, सौभाग्य कल्पलतिका, ज्ञानार्णव, श्री क्रम संहिता, दक्षिणामूर्ति संहिता, आज्ञावतार, संकेत पादुका, चन्द्रपीठ ललितोपाख्यान, लक्ष्मी तंत्र, कामकला विलास, सौभाग्य चन्द्रोदय, श्री विद्यारत्न सूत्र आदि अनेक ग्रन्थ हैं।
            महाविद्या भुवनेश्वरी से सम्बन्धित भुवनेश्वरी रहस्य, भुवनेश्वरी तंत्र, भुवनेश्वरी पारिजात आदि मुख्य ग्रन्थ हैं।
            महाविद्या भैरवी से सम्बन्धित भैरवी सपर्याविधि, भैरवी रहस्य, भैरवी तंत्र, मुण्डमाला तंत्रादि ग्रन्थ हैं।
            महाविद्या छिन्नमस्ता से सम्बन्धित शक्ति संगम के समावेश तंत्र का छिन्ना खण्ड है, किन्तु छिन्न मस्ता का पर्याप्त उल्लेख प्रकरण ग्रन्थों में मिलता है।
            महाविद्या द्दूमावती के लिये प्राणःतोषिणी तंत्र विशेष रूप से उल्लेख है इसके अतिरिक्त मंत्र महोदधि, मंत्र महार्णव आदि प्रकरण ग्रन्थों में इनका स्वरूप और साधना का विवेचन है।
            महाविद्या बगला से सम्बन्धित मुख्य ग्रन्थ है- सांख्यायन तंत्र। इसके अतिरिक्त बगला क्रम कल्पवल्ली नाम का एक और महत्वपूर्ण ग्रन्थ मिलता है। प्रकरण ग्रन्थों में बगलामुखी रहस्यम् की चर्चा है।
            महाविद्या मातंगी से सम्बद्ध ग्रन्थों में मातंगी क्रम, मातंगी पद्धति आदि ग्रन्थों का उल्लेख है। इसके अतिरिक्त प्रकरण ग्रन्थ इस विद्या का मुख्य आधार है।
            महाविद्या कमला से सम्बन्धित ग्रन्थों में तंत्रसार, शारदा तिलक, शाक्त प्रमोद आदि ग्रन्थ आते हैं।
            तंत्र साहित्य अपने आपमें बहुत विशाल है तथा उसके अन्तर्गत विभिन्न सम्प्रदायों की साधना पद्धतियाँ आ जाती है।
            आगम शास्त्र के विकास का क्रमः- आगमतंत्र की प्राचीनता असंदिग्ध है, वेदों के समानान्तर प्राचीनता की दृष्टि से इसे माना जाता है। कुछ विद्धानों के मत से तो वेद से भी प्राचीन आगमतंत्र है। एक धारणा यह है कि तन्त्र वेद के समानान्तर विकसित हुआ और तांत्रिक पद्धतियों का अवतार रूप से प्रभाव वेदों में आया है। जनमानस में एक धारणा है कि भारत में सबसे प्राचीन वेद हैं तथा जितने भी धर्म एवं साधना पद्धतियां हैं वे सब वेद के बाद के हैं और वेद से प्रभावित हैं, किन्तु तंत्र का व्यापक क्षेत्र देखते हुए यह अनुमान है कि तंत्र किसी न किसी रूप में वेदों के पूर्व समाज में था तथा वेदों के समानान्तर भी था। तांत्रिक ग्रन्थ जो वर्तमान में उपलब्ध हैं, वेदों के बहुत बाद के है पर ग्रन्थों के निर्माण के साथ इसके उद्भव को जोड़ना किसी भी तरह सही नहीं होगा, कुछ ऐसी विचारधाराएँ और साधनात्मक क्रियाएँ होती हैं जो लिखित में तो बाद में आती हैं किन्तु व्यवहार में कई वर्ष पूर्व से चलती रहती हैं। वेद के लिये जो शब्द प्रचलित था और उसी अर्थ में जाना गया वह शब्द है  निगम , और तंत्र के लिये जो शब्द प्रचलन में था वह शब्द है  आगम । प्रायः निगम आगम शब्द एक साथ प्रयुक्त होते हैं। अतः दोनों को समानान्तर मानने में आपत्ति नहीं होनी चाहिए।
            तंत्र वस्तुतः एक साधना पद्धति है, आगम ग्रन्थों में जिन साधकों अथवा विभिन्न महाविद्याओं के उपासकों का नाम आता है वे प्रायः वैदिक ऋषि हैं। इसके साथ ही यह भी ध्यान देने योग्य है कि तंत्र का जो उद्देश्य और मूल स्रोत है वे दोनों वेदों में भी मिलते हैं। शक्ति तत्व उन्हीं में एक है इसीलिये तंत्र की शाक्त परम्परा अथवा अन्य परम्पराएँ किसी न किसी रूप में वेदों में हैं। यह स्वरूप, वैदिक संहिताओं के सबसे प्राचीन रूप ऋग्वेद, में भी उपलब्ध है और अथर्ववेद में यह स्वरूप स्पष्ट रूप से मिलता है। इसलिये तंत्र की प्राचीनता के सम्बन्ध में जो प्रश्न हैं, उनका समाधान वैदिक काल में अथवा प्राग्वैदिक काल में ही मिलता है। वेदों को आधार मान कर भारत में जिन दर्शनों का विकास हुआ, तांत्रिक दर्शन उसका मूल तत्व है। इसके अतिरिक्त उसकी अपनी स्वतन्त्र पहचान भी है। मंत्र साक्षात्कार के सम्बन्ध में यह कहा जाता है कि- ”ऋषयः मंत्र द्रष्टारः।“
            वैदिक ऋचाओं और तांत्रिक मंत्रों के साक्षात्कार करने वाले अनेक ऋषि हैं। वशिष्ठ मुनि तारा के उपासक थे। लोपामुद्रा, अगस्त्य, दुर्वासा आदि श्री विद्या के साधक थे। इसी प्रकार देवताओं का भी तांत्रिक मंत्रों के साक्षात्कार और उससे जुड़ाव का संदर्भ तंत्र ग्रन्थों में मिलता है। श्री विद्यार्णव तंत्र के अनुसार श्री विद्या के साधकों के नाम इस प्रकार हैं- मनुश्चन्दः कुबेरश्च लोपामुद्रा च कामराट्ख्या, अगस्त्यनन्दि सूर्याश्च विष्णु स्कन्द शिवास्तथा।। दुर्वासाश्च महादेव्याः द्वादशोपासकाः स्मृता, शक्रश्चचोन्मना चैव तथा च वरूणस्ततः।। धर्मराजोऽनलो नागराजो वायुर्वुधस्तथा, ईशानश्च रतिश्चैव तथा नारायणोऽपि च।। ब्रह्मा जीवो महादेव्यास्त्रयोदश उपासकाः, पंचविशति संख्योपासकानां महेश्वरि।।
            ऐतिहासिक काल में श्री गौड़पाद, गोविन्दपाद, और आदि गुरू शंकराचार्य का नाम विशेष उल्लेखनीय हैं। यह सभी आचार्य भारतीय दर्शन के क्षेत्र में और वैदिक व्याख्यान तथा तत्वज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण हैं। यह तीनों आचार्य श्री विद्या के उपासक थे। गौड़पादाचार्य की पुस्तक श्री विद्यारत्न सूत्र उपलब्ध है। शंकराचार्य की सौन्दर्य लहरी सुप्रसिद्ध है। शंकराचार्य की जो गुरू परम्परा का है उससे पता लगता है कि प्राचीन काल से यह विद्या उत्तरोत्तर क्रम से शिष्य परम्परा से उपस्थित है। अतः निष्कर्ष निकलता है कि तांत्रिक साधना और शक्ति उपासना निर्विरोध रूप से वैदिक परम्परा के मान्य आचार्यों में भी समान रूप से प्रचलित थी।
            आगमशास्त्र की धार्मिक और साधनात्मक पृष्ठभूमि- तंत्र की अवधारणा है कि तांत्रिक साधना का उपदेश देवाधिदेव शिव के द्वारा हुआ है। शिव के सम्बन्ध में एक विशेष बात है कि जितना वह देवताओं के लिये मान्य थे उतना ही वे दैत्यों के भी मान्य हैं। शिव आर्यों और अनार्यों दोनों के लिये समान रूप से मान्य हैं। धर्म वास्तव में मानवतावादी होता है, कभी भी सम्प्रदायवादी नहीं होता है। धर्म मनुष्य मात्र के लिये कल्याण की कामना रखता है। जब धर्म में संकीर्णता आने लगती है और यह किसी विशेष वर्ग में बंधने लगता है तब वह सम्प्रदायवाद का रूप लेता है। तंत्र की इस दृष्टि से यह विशेषता सर्वोपरि है कि इसने सभी के तापों को दूर करने का विचार किया। अतः तंत्र की व्यापक दृष्टि सर्वापरि है इसी कारण यह अन्य सभी धर्मो से विशिष्ट भी है। यह वर्ग, जाति, स्थान, लिंग, आदि का भेद नहीं करता।
            उत्तर वैदिक काल में आर्यों का समाज चार वर्णों में विभक्त हो चुका था और स्मृतिकाल आते-आते स्त्रियों एवं शूद्रों को वेद पढ़ने तथा साद्दना से वंचित कर दिया गया। सामाजिक स्तर पर ऊँच-नीच तथा छुआछूत का भेदभाव बहुत बढ़ गया था। आर्य एवं अनार्य भेद हो चुका था। अतः मनुष्य जाति के लिये श्रेय के साधन और अवसर भी विषम हो गये थे। ऐसी परिस्थिति में आगम ही एक ऐसा साधन मार्ग था जो सभी को समान अवसर और समान प्रतिष्ठा देने वाला था।
            वैदिक काल में स्त्रियाँ भी मन्त्रों का साक्षात्कार करने वाली हुआ करती थीं और उच्चकोटि की साधिका होती थीं, पर बाद में उन्हें वेदाध्ययन और मंत्र साधना से वंचित कर दिया गया। शाक्त संप्रदाय ने स्त्रियों की पुनः प्रतिष्ठा की यहां तक कि उन्हें गुरूपद प्रदान किया। जिस नारी सम्प्रदाय को साधना विरोधी तत्वों द्वारा, नारी नरकस्यं द्वारं की स्थिति  तक पहुँचा दिया था, उन्हें साधना/उपास्य के सर्वोच्च पद पर स्थापित किया गया, उन्हें पूज्य माना गया और कहा गया कि  पुष्पेणाऽपि न ताडयेत् , अर्थात् स्त्री को पुष्प से भी ताड़न नहीं करना चाहिए। इसका अनुमान कुलार्णव तंत्र के वक्तव्य से लगाया जा सकता है कि जिसमें शिव के मुंह से यह वाक्य निसृत होता है कि चक्र में स्त्री हो अथवा पुरूष, क्लीव हो अथवा चाण्डाल, यहाँ तक कि उसमें द्विजोत्तम ही क्यों न हो फिर भी उन सभी में कोई भेद नहीं होता। यह भी कहा है कि चक्र में जाति भेद कहीं नहीं होता सभी शिव सदृश होते हैं जैसे वेद में स्थित सभी ब्रह्म कहलाते हैं उसी तरह चक्र में सभी पुरूष शिव के समान हैं और सभी स्त्रियाँ पार्वती के समान हैं।
            तंत्र ने धार्मिक दृष्टि से किसी का विरोध नहीं किया अपितु जो भी उपयोगी था उसे ग्रहण किया। जैसे वैदिक मंत्रों का भी उसमें समावेश पाया जाता है। तंत्र ने षट्चक्र, कुण्डलिनी योग, मंत्रयोग, अन्तर्योग आदि साधनाओं का उपयोग किया है।
            मनुष्य की प्रवृत्तियाँ भिन्न-भिन्न होती है तथा साधना क्रम में साधना की और साधक की अवस्थाओं में भिन्नता होती है। इस दृष्टि से दिव्य भाव की स्थिति में पहुँचने के पूर्व एक ही विधान से काम नहीं चल सकता, वैसा करने पर या तो सभी की प्रवृत्ति साधना में नहीं हो सकती, अथवा सम्यक् विकास में बाधा हो सकती है। इसीलिये तंत्र ने विभिन्न आचारों की व्यवस्था की है जबकि आचार प्रकृति तथा अवस्था के अनुसार एक व्यवस्था मात्र है। आचार बंधन नहीं है अपितु बंधन से मुक्ति का मार्ग है। आचार को तात्कालिक नियम भी कहा जा सकता है। तंत्र ने सात आचारों को स्वीकार किया है- वेदाचार, वैष्णवाचार, शैवाचार, दक्षिणाचार, वामाचार, सिद्धान्ताचार और कौलाचार। इन आचारों को उत्तरोत्तर क्रम से श्रेष्ठ माना गया है- सर्वेभ्यश्चोत्तभा वेदा वैष्णवं परम्। वैष्णवादुत्तमं शैवं शैवाद् दक्षिणामुत्तमम्।। दक्षिणादुत्तमं वामं वामात् सिद्धान्तमुत्तमम्। सिद्धान्तादुत्तमं कौलं कौलात्परतरंनहि।।
            इसी प्रकार साधनाक्रम में तंत्र तीन प्रकार के भावों पर विचार करता है, वे भाव है - पशु भाव, वीर भाव, दिव्य भाव,। ये भाव साधना की अवस्था के परिचायक हैं, और इनमें उत्तरोत्तर क्रम विकास भी होता है। यह आवश्यक नहीं है कि एक ही भाव में जीवन भर रहा जाए, अपितु लक्ष्य तो यह है कि सभी साधक दिव्य भाव में पहुँचे। कोई पशु भाव से आरम्भ करके दिव्य भाव में पहुँच सकता है।
            तंत्र का दृष्टिकोण अपने मूल लक्ष्य की प्राप्ति में सदा सतर्क है और उसकी प्राप्ति के लिये जितने भी कोषों से सहायता की अपेक्षा है, तंत्र उन सभी बिन्दुओं पर गंभीरता से ध्यान रखता है। तंत्र का मूल लक्ष्य है- ज्ञानोपलब्द्दि, आत्मसाक्षात्कार और त्रय-तापों से मुक्ति। जीवन मुक्त होना भी उसका लक्ष्य है। आगम जगत् से पलायन नहीं अपितु जगत् को स्वीकार करता है। इसीलिये तंत्र भोग और मोक्ष में विरोध अनुभव नहीं करता। कहा गया है कि जहाँ भोग है वहाँ मोक्ष नहीं हो सकता और जहाँ मोक्ष है वहाँ भोग नहीं हो सकता, किन्तु शक्ति उपासकों के लिये भोग और मोक्ष दोनों विरोधरहित होकर करस्थ रहते हैं। तंत्र का यह प्रसिद्ध श्लोक प्रायः उधृत है- यत्रास्ति भोगो न च मोक्षो यत्रास्ति मोक्षो न च तत्र भोगः। श्री सुन्दरी सेवन तत्पराणां भोगश्च मोक्षश्च करस्थ एव।।
            तंत्र वस्तुतः आत्म साक्षात्कार की साधना है इसीलिये तंत्र में अन्तर्यजन, कुण्डलिनी साधना और षट्चक्र पर पर्याप्त जोर डाला गया है। अन्तर्यजन के माध्यम से अन्तःकरण का परिष्कार होता है तथा साधक की तुरीयावस्था में पहुँचने की स्थिति बनती है। षट्चक्रों की साधना के माध्यम से मन का, विशेषतः अचेतन मन का विभिन्न स्थितियों मे अधिरोहण होता है। कुण्डलिनी का जागरण मूलतः आत्मा का अभ्युत्थान या आत्म साक्षात्कार  की दिशा में विकास की गति से जुड़ाव है। मंत्र को इस साक्षात्कार के क्रम में सबसे समर्थ साधन के रूप में स्वीकार किया गया है। मंत्र वर्णों या अक्षरों के योग से बनता है। भिन्न-भिन्न मंत्रों की संघटना भी भिन्न-भिन्न होती है। अक्षर कभी नहीं होता और वह सूक्ष्मता की स्थिति में निरन्तर व्यापक होकर तरंगित होता रहता है। इसी दृष्टि से शब्द को ब्रह्म माना गया है। शब्द की चार अवस्थाएँ होती हैं- वैखरी, मध्यमा, पश्यन्ति और परा। वैखरी प्रकट और स्थूल रूप है। मध्यमा से अन्तः प्रवेश होता है, तथा पश्यन्ती को पार कर परावस्था में पहुँचने पर साक्षात्कार, आत्मबोध या ब्रह्मबोध की स्थिति बनती है। इसी दृष्टि से मंत्र आगम साधना का सबसे समर्थ साधन है।
            तंत्र मूलतः आत्म साधना है। इसलिये तंत्र में जो बाह्यार्चन का विधान है वहाँ पर अपनी आत्मा को ही भावरूप में इष्ट देवता मानकर यंत्र पर स्थापित किया जाता है और उसका अर्चन किया जाता है। दशमहाविद्याओं की अथवा अन्य देवताओं की रूप कल्पना करके जो ध्यान, साधना और उसका अर्चन विधान है वह आत्मा का ही रूपान्तरित रूप है। इस प्रकार की परिकल्पना से अर्थात् किसी देवता को ब्रह्मरूप एवं इष्ट मान लेने से मनुष्य के मन में अहंकार के उदय की संभावना कम होती है तथा जीव जो सीमा से बद्ध है असीम के साथ जुड़ने के प्रशस्त पथ पर बढ़ने में सुविधा का अनुभव करता है। बाहर से जो रूप साधना प्रतीत होती है वह वस्तुतः अल्प बोध के लिये मार्ग है। मनुष्य को बाह्य रूप से जो बंधन दिखाई पड़ते हैं वे इतने कठोर होते हैं कि जीव, जीवन-पर्यन्त अथवा जन्मान्तरों तक अपने स्वरूप के बोध में असमर्थ रहता है। यद्यपि ये बंधन संस्कारगत होते हैं, किन्तु ये इतने गहरे होते है कि इनसे छुटकारा पाना आसान नहीं होता। इन बंधनों को आगमशास्त्र में पाश कहा गया है और कहा गया है कि जब तक मनुष्य इन बंधनों से युक्त है तक तक वह जीव कहलाता है और जब इनसे मुक्त हो जाता है तो वह जीवन्मुक्त अर्थात् सदाशिव हो जाता है।
            वेदों में शक्ति तत्वः- शक्ति तत्व की उपासना अनादिकाल से ही संसार में होती आ रही है। इससे लौकिक एवं पारमार्थिक दोनों विषयों की सिद्धि होती है। बल, ऐश्वर्य, ज्ञान, सौन्दर्य, निःश्रेयस आदि शक्ति तत्व के ही रूपान्तर हैं। ब्रह्म भी शक्ति तत्व का अभिन्न रूपान्तर ही है। आचार्य भगवत्पाद ने सौन्दर्य लहरी में कहा हैं -
शिवः शक्तया युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं,
न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमति।।
            ब्रह्म शक्ति तत्व युक्त होकर ही कार्य करने में समर्थ है अन्यथा कुछ भी नहीं कर सकता है। प्रत्यक्ष रूप में भी देखा गया है कि शक्तिमान ही कार्य करता है। इतिहास से भी यह बात स्पष्ट है कि सदैव शक्तिशालियों का ही बोलबाला रहा है।
            वैदिक साहित्य में भी सबसे प्राचीन संहिता ग्रन्थों में अनेक मन्त्रों में शक्ति-तत्व का रहस्य कहा गया है। देवी सूक्त, रात्रि सूक्त, सरस्वती सूक्त आदि प्रसिद्ध हैं। अथर्ववेद के प्रथम काण्ड के तेरहवें सूक्त में चार मन्त्र हैं- सूक्त के भृगु अंगरिस ऋषि हैं। विद्युत देवता है। विद्युत्तत्व के द्रष्टा भृगु मुनि की शक्ति का उदाहरण पुराणों में जिस प्रकार दिया गया है वैसा अन्य किसी आर्य ग्रन्थ में नहीं मिलता है। भृगु मुनि इतने शक्तिशाली हैं कि उन्हांने ब्रह्मा, विष्णु और महेश की परीक्षा में विष्णु के लात मारी थी। यह महत्व शक्ति का ही है। भृगु अंगिरा मुनि ने ही इस अनादि शक्ति विज्ञान को जगत् के सामने प्रकट किया है। विद्युत इस सूक्त का प्रतिपाद्य देवता रूप शक्ति पदार्थ है। पाश्चात्य विज्ञान के मत से बिजली तत्व का जो प्रचार एवं उपयोग हो रहा है वह इसका स्थूल रूप ही है।
            विद्युत में गति है। जहाँ शब्द का होना नियम सिद्ध है। शब्द ही वज्र है अथवा उसकी अभिन्न शक्ति ही वज्र कहलाती है - वज्र एव वाक्। महर्षि पतंजलि महाभाष्य में कहते हैं - सवाग्वज्रो यजमानं हनस्ति वह वाणी वज्र होकर यजमान का विनाश कर देती है। अस्तु बिजली शक्ति के भौतिक दैविक एवं आध्यात्मिक रूप होते हैं। इसीलिए मंत्रों को बहुत सोच समझ कर प्रयोग करने की बात प्रत्येक तंत्र ग्रन्थ में कही गई है। 
            तांत्रिक ग्रन्थों में भगवान् शिव बताते हैं कि मूलाधार चक्र में सर्प की आकृति में साढ़े तीन फेरे में लिपटी इस जगत का अभिन्न निमित्तोपादन कारण शक्ति तत्व ही है। यह तत्व आन्तरिक साधन से जागृत होता है। त्रिपुरासार समुच्चय में कहा गया है -
            शक्तिः कुण्डलिनीति यानिगविता आईम संज्ञा जगन्निर्माणे सततोद्यता प्रचिलसत् सौदामिनी सिन्नभां शंखावर्तनिभां प्रसुप्त भुजगाकारं जगन्मोहिनीम् तन्मध्ये परिभावयेद् विसलतातन्तुपमेया कृत्तिम।। हूं कारेण गुरूपदिष्टविधिना प्रात्थाप्य सुप्तां समाहितमनास्तामुच्चरेत् कौशिकीं शक्ति ब्रह्ममहापथेन सहितामाधारतः स्वात्मना।।
            अर्थात् आईम संज्ञावली जगत् रचना में सततोद्यत, चमकती हुई बिजली के सदृश, शंख के मुख के समान आवर्त (चक्करदार) सदृश, सोये हुए सर्प के समान, सारे जगत् को मुग्ध करने वाली, विस तन्तु के समान कुण्डलिनी शक्ति मानी गई है। गुरू द्वारा बताई गई रीति से हूँ बीज के अभ्यास से सोई हुई कुण्डलिनी को उठाकर परम चित्कला से उसका योग करके आधार पद्म से लेकर सहस्रार पर्यन्त समस्त षट्चक्रों का समाहित मन द्वारा अनुभव करना चाहिए।।
            सर्व खल्विदं ब्रह्म के अनुसार शक्ति का स्थूल रूप इस पराशक्ति का रूपान्तर है। जो गुण की विचित्रता से नाना प्रकार प्रतीत हो रहा है। एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति का यही अभिप्राय है।
            द्वैत अवस्था में रहते हुए योग क्षेम की प्राप्ति करना भी अत्यंत आवश्यक है अतः सूक्त के दूसरे मन्त्र द्वारा ऋषि कहते हैं -नमस्ते प्रवतो न पाद्यस्तपः समुहसि।
            मृडया नस्तनूभ्यो मयस्तोकेभ्यस्कृधि।।
            हे देवि, प्रकृष्ट ज्ञानवालों को तू पतन की ओर नहीं ले जाती है इसलिये तुझे नमस्कार है क्योंकि तू तप, ज्ञान आदि श्रेष्ठ वस्तुओं का समूह  है। अपने कल्याणात्मक रूपों से हमारी रक्षा कर। हम तेरी सन्तान हैं। हमारे लिये कल्याण का दर्शन करो।
            भुक्ति-मुक्ति दोनों प्रकारों की प्राप्ति शक्ति साधना से होती है। इसी अभिप्राय से सप्तशती ग्रन्थ में सुरथ तथा समाधि इन दोनों अधिकारियों कों मेधा महर्षि ने उपदेश दिया है। भोगश्च मोक्षश्यच करस्थ एव - वाला सिद्धान्त इसी तत्व पर माना गया है।
            अन्धन्तमः प्रविशन्ति ये अविद्यामुपासते में भी उक्त तत्व को कहा गया है - अविद्या की उपासना करने वाले अंधकार में चले जाते हैं यही पतन है। विद्ययामृतमश्नुते विद्या से ही अमृत की प्राप्ति होती है। अस्तु तू विद्वानों को पतन की ओर नहीं ले जाती हैैै। अतः हमें भी वही मार्ग बता।
            अहं मम रूप अविद्या जन्म संसार में ही लगे रहने वाले जीव बार-बार जन्म मरण रूप संसार में आते रहते हैं क्योंकि उनके सुख का आद्दार क्षणिक, विनाशी, आपात् रमणीय यह संसार ही है। उन्हें शान्ति नहीं मिलती। अतः मुमुक्षु इससे विरक्त होकर विद्या का अनुसरण करता है। गीता में कहा है- यद् गत्वान निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम। इसी को कठोपनिषद् में- सोऽध्वनः पारमाप्नोति यस्माद् भूयो न जायते। इस प्रकार कहा गया है, अर्थात् ब्रह्म को प्राप्त होने पर फिर संसार में मुमुक्षु नहीं आता। इसी तत्व को प्रवतो न यात् इस पद से कहा गया है। यही शक्ति का परमधाम है। सप्तशती में कहा गया है -मोक्षार्थिभिर्मुनिभिरस्त समस्त दोषैविद्यासि सा भगवती परमाहि देवि। अर्थात् समस्त अविद्या दोषों से रहित होकर मोक्षार्थी मुनिगण विद्या रूप से तुम्हारा ही अभ्यास करते हैं। वह विद्या तुम हो। जब-जब भक्त समुदाय असुरों से पीड़ित होता है, तब-तब असुरों के विनाशार्थ श्री आदिशक्ति का आविर्भाव होता है जिसे किसी न किसी प्रकार से समस्त आस्तिक समुदाय मानता है।
            दुर्गा सप्तशती में श्री भगवती के अस्त्रों से रक्षा की प्रार्थना की गई है। खड्ग शूल गदादीनि यानि चास्त्राणि तेऽम्बिके। कर पल्लव संगीन तैरस्मान् रक्ष सर्वतः।। अर्थात् हे अम्बिके, खड्ग शूल गदा आदि जितने तुम्हारे अस्त्र शस्त्र हैं, उनसे आप सब ओर से हमारी रक्षा करें। हे देवि, समुद्र परमात्मा में अभेद सम्बन्ध सामरस्य भावापन्न होकर तू छिपी हुई है उसे हम उपनिषद द्वारा जानते हैं।
            मम योतिरप्सु अन्तः समुद्रे- इस मंत्र में भी समुद्र पद आधारार्थों में व्यवहृत हुआ है। सायणाचार्य ने इसका अर्थ परमात्मा ही किया है- समुद्रवन्त्यस्माद्भूतानि इति समुद्रः परमात्मा अर्थात् सब प्राणी समूह जिससे प्रकट होते हैं इसलिये परमात्मा को समुद्र कहते हैं। बहुत लोग इस मंत्रांश से ब्रह्म को कारण तथा शक्ति तत्व को कार्य समझते हैं परन्तु यह उनका भ्रम है। गीता में ब्रह्म का योनि कारण शक्ति को ही माना गया है। ममयोनिर्महद् ब्रह्म तस्मिनगर्भ दधाम्यहम्। वास्तव में निमित्त की अपेक्षा से ब्रह्म, शक्ति दोनों के परम कारणत्व का व्यवहार होता है।
            प्राणो वा अपानो व्यानेस्तस्रों देव्यः अर्थात् प्राण अपान और व्यान तीनों को देवी बताया गया है। वास्तव में प्राण ही शक्ति है। इसी को लोक में आत्मबल कहते हैं। इसी प्राण, अपान और व्यान को पौराणिक सिद्धान्त में महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती, कहते हैं। महाविद्याक्रम में यही काली तारा षोडशी कहलाती है।
            ता वा एता देव्यः दिशो ह्येता अर्थात् ये दशां दिशाएँ ही दश देवियाँ है। महा भागवत में ऐसी कथा आई है कि, जब सती अपने पिता दक्ष के घर जाने लगी तब उन्हें श्री शंकर ने रोका। तब अपने भयानक रूप को प्रकट किया श्री महादेव उसे न देख सकने के कारण भागे, तब भगवती ने अपने दश महाविद्या रूप दशों दिशाओं में धारण कर श्री शंकर को रोका था।
            दुर्गा सप्तशती मध्यम चरित्र की कथा को मार्कण्डेय पुराण में विस्तार से कहा गया है- सप्तशती के दूसरे अध्याय में यह कथा आई है कि महिषासुर दैत्य ने एक समय अपने आतंक से देवताओं को पीड़ित किया था। देवताओं ने ब्रह्मा, विष्णु और महेश के साथ मिलकर एक महान तेज प्रकट किया। वह तेज दिव्य स्त्री के रूप में प्रकट हुआ। अपने-अपने अस्त्र शस्त्र को उसे सब देवताओं ने प्रदान किया। सभी के अंग के रूप में वह महाशक्ति बनी थी, जिसे कहा गया है- निःशेष देवगण शक्ति समूह मूर्त्या अर्थात् समस्त देवताओं के शक्ति समूह से ही वह मूर्ति बनी थी। इसे ही सूक्त में यां तवां असृजन्त विदथे गुणानां इन रहस्यमय पदों से कहा गया हैं। उस महाशक्ति ने महिषासुर को युद्ध में मारा जिसे  ब्रह्मा, विष्णु आदि देवता भी नहीं मार सके थे।
            असुरों पर विजय प्राप्त करने पर देवताओं के अभिमान को निवृत्त करने के लिए साक्षात् कृपामयी हेमवती उमा का आविर्भाव केनोपनिषद ने बड़े ही सुन्दर रूप से लिखा है। ब्रह्मविद्या ही अभिमान अहंकार आदि रहित, शाश्वत शान्ति को देने वाली है, उसके बिना लौकिक विजय पुनः पतन का हेतु हो सकती है। अतः उपनिषद का उपसंहार- ज्येये स्वर्गे प्रतिष्ठित रूप में किया गया है। दुर्गा सप्तशती के चौथे अध्याय में उसी महत्वपूर्ण महती देवता की स्तुति भी देवताओं ने की है। संगच्छध्वं संवदध्वं संवोमनांसि जानताम् वाले वैदिक एकता के रहस्य को प्रकट करने के लिये मध्यम चरित्र की कथा लिखी गई है। सप्प्तशती शक्ति तत्व के समस्त रहस्यों को प्रकट करने वाला ग्रन्थ रत्न है। संघे शक्तिः वाली युक्ति शक्तिवाद की सर्वश्रेष्ठ उक्ति है। ऐसा कहा जाता है कि प्रथम उत्तर चरित्रों का पाठ अकेले करना मना है, किन्तु मध्यम चरित्र का पाठ अकेले भी कर सकते हैं। एकेन वा मध्यमेन नैकेनेतरयोरिह अर्थात् एक मध्यम चरित्र के पाठ से ही पूर्णता हो जाती है। एकता के विषय में वेद का कथन है- तंत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः अर्थात् एकता देखने वाले ज्ञानी समाज को शोक क्या? और मोह क्या? युद्ध या विप्लव के समय ही एकता का परम उपयोग होता है, क्यांकि युद्ध एक महान आपत्ति है। स्वार्थपरायणता के समय ही युद्ध होता है। व्यक्तिगत स्वार्थ से ही किसी देश, संस्कृति और जाति का पतन होता है। ऐसे समय में महालक्ष्मी सुमति प्रदान कर अपने राष्ट्र भक्तों की रक्षा करती है अतः उसकी स्तुति पूजा होती रहना चाहिए। महाभारत युद्ध में प्रवृत्त अर्जुन को श्री कृष्ण ने गीतोपदेश के प्रथम श्री दुर्गा भगवती की स्तुति करने को कहा था जिसे भीष्मपर्व में बड़े ही सुन्दर ढंग से बताया गया है। मन एवास्तु तुभ्यम् अर्थात् तुम एक ही को हमारा नमस्कार है। सूक्त में सात बार नमः शब्द का प्रयोग होने से संसार की संचालिका सप्त मातृका रूप को, तथा निवृत्ति की सप्तभूमिका को नमस्कार किया गया है, तस्यै ते नमोस्तु देवि, इस स्त्रीलिंग वाचक तस्मै देवि पदों से यह सूक्त शक्तिवाद का पोषक है, यह सिद्ध हो जाता है।
अन्य साधना-पद्धतियों पर आगमशास्त्र का प्रभाव-
            आगमशास्त्र अपनी वैज्ञानिकता/विशिष्टता के कारण भारत की अन्य साधना पद्धतियों को प्रभावित करता रहा है। यह प्रभाव बहुत गहराई है। प्रायः सभी पद्धतियों को तंत्र के प्रभावित करने अथवा अन्य पद्धतियों को तंत्र के प्रभाव को ग्रहण करने में मुख्य कारण यह है कि तंत्र की पद्धति वैज्ञानिक है तथा सर्वांगीण है। तंत्र ने साधना के क्षेत्र में कुछ ऐसे अन्वेषण किये है जो तंत्र के पूर्व नहीं थे और आत्म साक्षात्कार के कुछ ऐसे भी सूत्र हैं जो कई दृष्टियों से विभिन्न अवस्थाओं में साधक के लिये अधिक सुविधाजनक और उपयोगी हो सकते हैं। वैदिक काल में साधना का रूप यज्ञ था और वैदिक ऋचाओं का पाठ करना था। मंत्र जप का और मंत्र के पुरश्चरण का विधान नहीं था किन्तु तंत्र ने ही मंत्रों के जप को वाचिक, उपांशु और मानसिक में परिणित किया है।
            प्राचीन काल से लेकर मध्यकाल तक विभिन्न साधना पद्धतियों में तंत्र से प्रभाव ग्रहण करने की यह प्रक्रिया चलती रही है। वैष्णव पद्धति तो तंत्र के अंतर्गत ही आती है किन्तु जहाँ से वैष्णव में विरोध प्रतीत होता है वहाँ भी उनकी प्रक्रिया में तांत्रिक पद्धति का बहुत दूर तक समावेश है और जो विरोध दिखाई पड़ता है वह मंत्र के आधार से सम्बन्ध रखता है उसकी समग्रता से नही।
            बौद्धधर्म में तो तंत्र को प्रत्यक्षतः पूरी तरह स्वीकार कर लिया गया और इस दृष्टि से उसकी एक शाखा वज्रयान अत्यन्त महत्वपूर्ण है। बौद्धों ने तंत्र को अपनी तरह से विकसित करने में योगदान किया है। उन्हांने चीनाचार के माध्यम से भी बहुत कुछ ग्रहण किया है। तारा महाविद्या उनकी मुख्य साधना रही है। जैन धर्म में भी तंत्र का प्रभाव समुचित रूप से देखा जाता है।
            इस प्रकार हम देखते हैं कि भारत की सभी साधना पद्धतियाँ तंत्र से प्रभावित हैं। यह अलग बात है कि किस पद्धति को कितनी सफलता मिली। कुछ पद्धतियों ने केवल तंत्र में योग के हिस्से को लेकर अपने को विकसित किया है और कुछ ने इसके साथ कुछ अन्य अंगों को भी लेकर विकसित किया है। मध्यकाल में गोरखनाथ का सम्प्रदाय जो कि योग के लिए विख्यात है, उस सम्प्रदाय ने तंत्र को ग्रहण करके अपनी पद्धति को अलग तरह से विकसित किया। यदि सारी पद्धतियों में तंत्र प्रभाव ग्रहण की खोज और विश्लेषण किया जाय तो यह शोध हेतु एक पूर्ण विषय होगा। अब इस लेख को यहीं समाप्त करता हूं।
            विशेष जानकारी हेतु मेरे द्वारा लिखे शीघ्र प्रकाशित होने जा रहे महाग्रन्थ श्री विद्या रहस्य, एवं यंत्र मंत्र तंत्र महासागर का अध्ययन करें। 

Wednesday, June 25, 2014

सनातन धर्म की स्थिति क्या है ? सोचो और समझो ...

..... एक विवाद जो हमें आभास कराता है कि वर्तमान समय में सनातन धर्म की स्थिति क्या है ? आज हमारे ही देश में सनातन धर्म के सर्वोच्च पद पर विराजमान हमारे धर्मगुरु अनंत श्री विभूषित स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती के लिए जो व्यवहार हो रहा है वह भविष्य में किस बात का सूचक है . उनके पुतले जलाए जा रहे हैं , उनके लिए अपमानजनक शब्दों का खुलेआम प्रयोग किया जा रहा है . सनातन धर्मियों का एक बड़ा समूह ही अपने पुरोधा के खिलाफ उठकर खड़ा हो गया है . इसका क्या कारण हो सकता है ? इस पर विचार करना अति आवश्यक है .
..... वास्तव में देखा जाय तो पिछले काफी समय से सनातन धर्मियों को नेतृत्व ही नहीं मिला , कोई सनातन धर्मियों को यह बताने वाला ही नहीं है कि वास्तव में चार धामों का महत्व हमारे जीवन के लिए कितना महत्वपूर्ण है , कोई आम सनातनी को यह बताने वाला नहीं है कि आखिर यह शंकराचार्य कौन है , इनका हमारे धर्म में क्या स्थान है ? 
.....अगर सनातन धर्मियों को यह बताया जाता कि ' आदि गुरु शंकराचार्य जी ने सनातन धर्म का पुनरोद्धार किया था , उन्होंने मात्र ८ वर्ष की अवस्था में गृह त्याग कर संन्यास की ओर प्रस्थान किया था . उन्होंने शंकर दिग्विजय की थी . काशी में मूर्धन्य विद्वान् मंडन मिश्र , जिनके यहाँ के तोता मैना भी वेदपाठ करते थे उन्हें परास्त किया था , यहाँ तक कि मंडन मिश्र की पत्नी द्वारा शास्त्रार्थ किये जाने पर कामशास्त्र के प्रश्न आने पर दुविधा में पड़ते हुए परकाया प्रवेश भी किया था,  और वह भी तब के समय में जब न तो यातायात साधन इतने सहज थे , न संचार व्यवस्था थी ...तो  आज यह स्थिति न होती.  हमारा कोई भी धर्म गुरु ऐसा नहीं है जो आम हिन्दू मानस के सामने आकर उसको एकता का पाठ पढाता हो , सोने चांदी के सिंहासन  पर आरूढ़ हमारे धर्म गुरु स्वयं राजनीतिज्ञों के दामन में पनाह पाते है , अपने ए .सी. मठों से बाहर निकलते हैं तो केवल पूंजीपति सेठों के यहाँ जाकर विश्राम करते हैं , जबकि आज साधन कहीं अधिक हैं , तब यह हाल है ...और आपको ज्ञात होना चाहिए जिस धर्म के गुरुजन ही आम जनता के बीच नहीं आयेंगे वह जनता अपने स्वाभिमान की जंग कैसे लड़ पायेगी , वह तो भटक कर किसी साईं , औलिया , पीर , फ़कीर , संत , कथा वाचक , दरगाह और मजारों में  जायेगी ही . बावजूद इसके हिन्दू अपने को मजबूत बनाए है तो सिर्फ अपने बूते .....
.....धर्म का सही स्वरुप तक आम जनमानस को बताने वाला कोई नहीं है , धर्म के नाम पर कथाये , चुटकुले , सुनाये जाते हैं , सनातन धर्मी कैसे आर्थिक और आध्यात्मिक रूप से मजबूत हो इसकी बात कौन कर रहा है आज, कोई पानी के बताशे खिला कर जनता के कष्ट हर रहा है , कोई होली खेल रहा है .....
.....आम हिन्दू ( सनातन धर्मी) बहुत धर्म भीरु होता है , वह अपने संतों के विषय में श्रद्धा भाव रखना चाहता है , रखता है , किन्तु वह हमारे धर्मगुरु बदले में आम हिन्दू को क्या दे रहे है .
.....एक बात स्पष्ट कर दूं कि मैं कोई धर्म गुरु नहीं हूँ , मैं भी एक आम इंसान हूँ , लेखक हूँ ,सिर्फ इन समस्यायों का  निदान जो है उसकी तरफ ध्यान केन्द्रित करने की बात है , अगर एक सम्प्रदाय के धर्म गुरु अपने अनुयायियों के बीच आते है तो दूसरे धर्म गुरुओं का क्या फर्ज बनता है , क्या उन्हें अपने अनुयाइयों के बीच नहीं आना चाहिए ... मूल प्रश्न यह है .... 
.......... धर्म और राष्ट्र के प्रति सजग न रहना , मूर्खता , कायरता और स्वार्थलोलुपता की अभिव्यक्ति है. ..... आज टी. वी. पर कुछ धर्माधीशों की बात मैं ध्यान से सुन रहा था , उनमें से अधिकतर अपनी निजी खुन्नस निकालते नजर आये . एक सामान्य बात जो सबने कही वह यह कि सभी धर्म एकेश्वरवाद की बात कहते है , और सनातन धर्म कहता है कि सभी की भावनाओं का आदर करो , सभी का सम्मान करो , जिसकी जो इच्छा हो वह उसकी पूजा करे , कोई किसी भी भगवान को मान सकता है आदि आदि , आश्चर्य इस बात का है कि ऐसा बयान कुछ प्रतिष्ठा प्राप्त , दंडी सन्यासियों ने भी दिया , जिन्हें ' नारायण स्वरुप ' माना जाता है
.....अब इस पर मेरा मानना है कि सर्वप्रथम यह धर्माधीश यह जान ले कि धरती पर धर्म केवल एक है , वह है ' सनातन '...बाकी सब पंथ है . इसलिए सनातन धर्म की तुलना किसी पंथ से नहीं की जा सकती .

..... धर्म की सरल व्याख्या ( 'पंथ, 'मत' , 'मजहब' एवं ' रिलीजन ' में भेद) ..... ' धर्म ' शब्द की व्याख्या करना अत्यधिक कठिन कार्य है . हमारे सद्-ग्रंथों, धर्म-शास्त्रों तथा गुरुजनों ने अनेक प्रकार से 'धर्म' की परिभाषा लिखने का प्रयास किया है . भारतीय संस्कृति में ' धर्म ' शब्द की व्याख्या करना उतना ही कठिन है जैसे कि ' ब्रह्म ' शब्द की व्याख्या करना . ' छान्दोग्योपनिषदः ' में ' धर्म ' की तीन शाखाएँ मानी गयी हैं :-
..... १- यज्ञ , अध्ययन एवं दान अर्थात ( गृहस्थ धर्म).
..... २- तपस्या अर्थात तापस धर्म .
..... ३- ब्रह्मचारित्व अर्थात आचार्य के घर में रहकर उच्चतम ज्ञान-प्राप्ति एवं उच्च चरित्र निर्माण .
..... 'धर्म' शब्द का अर्थ विधि की भांति समय समय पर परिवर्तित होता रहा है , किन्तु शनैः -शनैः यह मानव के विशेषाधिकारों , कर्तव्यों एवं तत्संबंधी बंधनों का द्योतक , भारतीय समाज के सदस्यों की आचार्य-विधि का परिचायक एवं वर्णाश्रम का द्योतक हो गया .
..... स्मृतिकारों ने 'धर्म' के पाँच स्वरुप माने हैं :-
..... १- वर्ण-धर्म .
..... २- आश्रम धर्म .
..... ३- वर्णाश्रम धर्म.
..... ४- नैमित्तिक धर्म.
.... ५- गुण-धर्म .
..... जैमिनी ऋषि के अनुसार वेदों में प्रयुक्त अनुशासनों के अनुसार ही 'धर्म' है. 'धर्म' का सम्बन्ध उन क्रिया-संस्कारों से है , जिनसे आनंद मिलता है और जो वेदों द्वारा प्रेरित , प्रमाणित और प्रशंसित हैं.
..... अनेक परिभाषाओं को देखते हुए निष्कर्ष निकलता है कि " धर्म वही है जिसका आचरण करने से आनंद , बहुजन सुखाय -बहुजन हिताय एवं नि:श्रेयस की सिद्धि, सनातन संस्कृति का पोषण एवं स्वानुभूति सुख की उपलब्धि होती है .
..... मेरा उक्त विचार और अनुभव ग्रंथों के स्वाध्याय एवं स्वयं के अनुभव पर आधारित हैं .
..... 'धर्म' अनेक ऋषि-मुनियों , अवतारों, और वेदों द्वारा प्रतिपादित हुआ है . 'धर्म' किसी व्यक्ति विशेष द्वारा नहीं चलाया गया है .
..... जबकि दूसरी ओर 'पंथ' किसी व्यक्ति विशेष अथवा किसी 'धर्म - ग्रन्थ के द्वारा प्रवर्तित हुए हैं. ' पंथ ' का प्रादुर्भाव किसी धर्म विशेष के आयाम में ही होता है .
..... 'मत' , 'मजहब' एवं ' रिलीजन ' निश्चित रूप से किसी व्यक्ति -विशेष के द्वारा ही प्रवर्तित होते हैं .

.....रह गयी बात साईं के चमत्कारों की तो ऐसे चमत्कारी संत हमारे यहाँ बहुत हुए हैं , आज एक सज्जन टी वी पर कह रहे थे कि साईं का शरीर शांत होने के बाद उनका शव तीन दिन इसलिए रखा रहा कि हिन्दू उसका दाह संस्कार करना चाहते थे , और मुसलमान उनको दफनाना चाहते थे , तब साईं के एक शिष्य को स्वप्न आया जिसमें साईं ने कहा मेरी समाधि बना दो ..अब यहाँ दो बाते हैं कि साईं के तत्कालीन भक्तों में भी आपस में सामंजस्य और सद्भाव की कमी थी ...और साईं के उपदेशों का उन पर कोई प्रभाव नहीं हुआ था , साईं उनमें आत्मतत्व नहीं जगा पाए थे , और वह उनके अनंत विलीन होने के बाद भी आपस में झगड़ रहे थे ..और दूसरी बात यदि स्वप्न को चमत्कार माने तो कबीर दास जी की तो मृतदेह ही गायब हो गयी थी , केवल फूल बचे थे , अब बताइये भला कबीर के मंदिर क्यों नहीं बने . मीरा की देह गायब हो गयी थी , रैदास के चमत्कार 'मन चंगा तो कठौती में गंगा ' आज भी मुहावरे के रूप में प्रयोग होते हैं . कालजयी कृति रामायण के रचयिता बाल्मीकी , और रामचरित मानस के रचयिता तुलसी जी के मंदिर नहीं बने  .....
..... हकीकतन आम हिन्दू स्वभाव से धर्मभीरु होता हैं जिधर भीड़ चलती है उधर ही चल देता है . अभी अधिक समय नहीं बीता है , लगभग ४० वर्ष पूर्व , एक शक्ति संतोषी माता की बहुत भक्ति होने लगी थी , अब धीरे धीरे शांत हो गयी ... काफी दिन वैभव लक्ष्मी जी का भी बोलबाला रहा , यहाँ तक कि लगभग ४० वर्ष पूर्व ' स्टोव देवता ' का लोग आवाहन करते थे , उस पर तुर्रा यह कि स्टोव देवता वहीं आयेंगे जहां प्रभात कंपनी का स्टोव होगा ...क्या कहेंगे इसे ...कानपुर में देखते देखते कई शनि मंदिर बन गए और सब अतिक्रमण करके बने , जहां पीपल का पेड़ दिखा वहाँ रातोंरात शनि मंदिर बन गए , और जनाब ! शनिवार के दिन वहाँ कई लीटर तेल के दीपक जल जाते है , जाने कितने लोहे के छल्ले बिक जाते हैं , और उन मंदिरों के बनाने वालों का यदि इतिहास खंगाला जाय तो क्या कहूं ...
..... जब अंग्रेजों ने भारत में सडकों के किनारे पीले रंग के मील पत्थर लगवाए तो कुछ समय बाद उन्हें हनुमान जी की प्रतिष्ठा प्राप्त हुई लोग उन मील पत्थरों की पूजा करने लगे , उनमें सिन्दूर पॉट कर लाल कपडे से ढका जाने लगा ...
....कभी कभी देखने को मिलता है , बन्दर की मौत पर लोग सड़क किनारे एक बोरा बिछा कर बन्दर की देह लिटा देते हैं, और उसे माला आदि पहना देते हैं ,  और चंद घंटों बाद वहाँ हजार दो हजार  रूपये एकत्र हो जाते हैं और उस बन्दर को लेजाकर कहीं दफना दिया जाता है ...तो यह है हमारा शाइनिंग इण्डिया ..... 
..... अब समय आ गया है कि हमारे धर्म गुरु अपने कवच से बाहर निकालें और जनता को सनातन धर्म की विभूतियों , उसके सार्वभौमिक गुणों से अवगत कराये , पूंजीपतियों और ए. सी. मठों के मोह से परे रहकर , आदि गुरु शंकराचार्य की तरह सम्पूर्ण विश्व में सनातन धर्म की पताका फहराएं . 
 ' यतो धर्मस्य ततो जय: ' अर्थात जहां धर्म है वहीं जय होती है ...
.....अत: मेरे विचार से सनातनियों को धैर्य से विचार करना चाहिए कि वास्तव में सत्यता क्या है , कहीं हम भ्रम में तो नहीं है.....

Thursday, May 1, 2014

..... भगवान परशुराम जयन्ती पर एक रहस्यमय प्रसंग ...

..... भगवान परशुराम जयन्ती पर एक रहस्यमय प्रसंग ...
..... अक्सर लोग प्रश्न उठाते हैं कि ब्राह्मण होकर भी भगवान् परशुराम में क्षत्रियोचित गुण का आधिक्य क्यों था ?
..... एक क्षत्रिय राजा थे , उनके केवल एक पुत्री संतान थी . उनके राज्य में एक ' ऋचीक ' नाम के ऋषि रहते थे . राजा ने ऋषि से निवेदन करके अपनी पुत्री का विवाह उनसे कर दिया . विवाह के पश्चात राजा की पत्नी ने अपनी पुत्री ( ऋषि पत्नी ) से कहा कि हे ! पुत्री जब आपके पति अपने लिए पुत्र की कामना से यज्ञ करें तो इनसे निवेदन करके मेरे लिए भी एक पुत्र का वरदान मांग लेना , पुत्री ने कहा ठीक है .
.....कालान्तर में जब ऋषि ने पुत्र की कामना से यज्ञ किया तो इनकी पत्नी ने अपनी माता का सन्देश उन्हें दिया .
..... ऋषि ने कहा एवमस्तु . तत्पश्चात ऋषि ने दो हांडी में खीर पकाई , और एक हांडी अपनी पत्नी को दी और कहा कि यह खीर तुम बरगद के वृक्ष के नीचे जाकर खा लेना , और यह दूसरी हांडी की खीर अपनी माता को दे देना और कहना कि वे पीपल के वृक्ष के नीचे बैठ कर यह खीर खा लें .
..... ऋषि पत्नी ने विचार किया कि , माता के घर चलकर दोनों लोग खीर खायेंगे .
..... जब वह माता के घर पहुँची तो माता ने कहा कि पुत्री तुम्हारे तो और भी पुत्र हो जायेंगे , मेरे केवल यही एक होगा , और तुम्हारे पति ने अपने लिए श्रेष्ठ पुत्र की कामना से खीर बनायी होगी , अत: हम लोग खीर आपस में बदल लेते हैं .
..... ऋषि पत्नी ने यह बात मान ली , और खीर की हांडी बदल कर ऋषि पत्नी ने माता वाली खीर पीपल के नीचे , और माता ने ऋषि पत्नी वाली खीर बरगद के नीचे खाली .
.....कालान्तर में दोनों गर्भवती हुई , ऋषि ने जब अपनी पत्नी का मुख और शरीर देखा तो कहा कि कुछ बदलाव है और उन्होंने खीर वाली बात पूछी , तब ऋषि पत्नी ने सब सही बता दिया . तब ऋषि बोले यह तो बड़ा अनर्थ हो गया , क्योंकि मैंने आपकी माता के लिए क्षत्रिय गुण-धर्म से विभूषित खीर बनायी थी और आपके लिए ब्राह्मण गुण-धर्म से विभूषित , ऐसा सुन कर ऋषि पत्नी दुखी हो गयी , और बोली इस बात से मुक्ति कैसे मिले .
.....तब ऋषि ने कहा कि अब मैं कुछ नहीं कर सकता , तब ऋषि पत्नी ने विलाप शुरू कर दिया .
.....अंत में ऋषि ने कहा कि , जो मैंने अपने तपोबल से खीर बनायी थी उसका असर तो समाप्त नहीं होगा , लेकिन मैं ऐसा कर सकता हूँ , इस पीढी में तो हमारे यहाँ ब्राह्मण गुण-धर्म से विभूषित पुत्र होगा , और आपकी माता के यहाँ क्षत्रिय गुण-धर्म से विभूषित पुत्र होगा , किन्तु अगली पीढी में वह गुण-धर्म बदल जाएगा और अपने यहाँ जो हमारा पौत्र होगा वह क्षत्रिय गुण -धर्म वाला , और आपकी माता के यहाँ उनका पौत्र ब्राह्मण गुण-धर्म वाला होगा ...ऋषि पत्नी ने कहा ठीक है ऐसा मुझे स्वीकार है .
..... इसी के फलस्वरूप राजा के यहाँ ' गाधि ' नामक पुत्र हुए , और ऋषि के यहाँ ' जमदग्नि ' हुए और अगली पीढी में गाधि के पुत्र 'विश्वामित्र ' हुए जो ब्रह्म बल की प्राप्ति के लिए सदैव प्रयत्नशील रहे , और ब्राह्मणोंचित गुण धर्म वाले थे ...और ऋषि पुत्र जमदग्नि के यहाँ परशुराम जी का जन्म हुआ जो क्षत्रिय गुण-धर्म वाले थे....
...... यह एक पौराणिक कथानक है , याद आ गया, सो आज श्री परशुराम जयन्ती के शुभ अवसर पर लिख दिया....
..... जय परशुराम...

Wednesday, April 30, 2014

अक्षय तृतीया ( परशुराम जयन्ती )

. मेरे आत्मीय मित्रों ! यथोचित अभिवादन ...
..... परम पावन तिथि वैशाख शुक्ल तृतीया को अक्षय तृतीया के नाम से जाना जाता है . यह शुभ तिथि दो कारणों से अत्यंत शुभ और पावन मानी जाती है .
.....१- इसी तिथि वैशाख शुक्ल तृतीया को त्रेता युग का प्रारम्भ हुआ था इस कारण इस तिथि को त्रेतायुगादि भी कहा जाता है , मान्यता है कि, इस दिन किसी भी शुभ कार्य या व्यापार का शुभारम्भ करने से वह निर्बाध चलता है .
..... २- इसी शुभ तिथि को सायंकाल ( प्रदोष वेला ) में भगवान श्री परशुराम जी का अवतार हुआ था .
..... इस दो कारणों से इस तिथि को परम शुभ माना जाता है .
..... इस वर्ष वैशाख शुक्ल तृतीया ०१-०५-२०१४ गुरुवार को दोपहर ११ बजकर २५ मिनट से प्राम्भ होगी और ०२-०५ -२०१४ शुक्रवार को दोपहर १२ बजकर ०५ मिनट तक रहेगी .
..... उल्लेखनीय है कि स्मृति मतानुसार श्री परशुराम जी का जन्म वैशाख शुक्ल तृतीया को सायं काल (प्रदोष वेला ) हुआ था , अत: जब तृतीया तिथि सायं कालीन विद्यमान होगी तब परशुराम जयन्ती मनाई जायेगी ...इस वर्ष सायं कालीन तृतीया १ मई को है ..अत: जयन्ती १ मई को सायंकालीन ( प्रदोष वेला में ) मनाई जायेगी ....
..... अक्षय तृतीया अर्थात त्रेतायुगादि पर्व उदयाकालीन तिथि के अनुसार ०२-०५-२०१४ शुक्रवार को मनाया जाएगा ...
..... इस पावन तिथि को कई व्यापारी बंधु खाता -बसना पूजन भी करते हैं. उनको यह पूजन ०२-०५-२०१४ शुक्रवार को करना चाहिए . व्यापार के लिए रोहिणी और मृगशिरा नक्षत्र शुभ होते हैं . इस दिन सूर्योदय से ११ बजकर १९ मिनट तक रोहिणी नक्षत्र रहेगा तत्पश्चात मृगशिरा नक्षत्र शुरू होगा ..
..... इस दिन स्थिर लग्न 'वृष' सुबह ०६ बजकर ०८ मिनट से सुबह ०८ बजकर ०४ मिनट तक रहेगी .
..... चौघड़िया मुहूर्त के अनुसार चर-लाभ-अमृत की संयुक्त वेला ०५/२२ से १०/१६ तक सुबह रहेगी . शुभ चौघड़िया की वेला ११/५४ से ०१/३२ दोपहर तक रहेगी .
..... ' गोधूलि सा मुनिभिरुक्ता सर्वकार्येषु प्रशस्ता ' इस धर्म शास्त्रीय वचनानुसार ०२ मई को गोधूलि वेला में तृतीया तिथि का अभाव है . अत: जो लोग गोधूलि वेला में खाता-बसना पूजन करना चाहे वे एक दिन पूर्व ०१ मई को सायंकाल ०६ / २७ से ०८ /३८ के बीच कर सकते हैं .

Monday, September 9, 2013

" श्री श्वेतार्क गणपति '


........... श्री मन्महा गणाधिपतये नम: ...........
..... हे गणपति ! आपका हम स्वकार्य सिद्धि हेतु आव्हान करते हैं. आप सबकी प्रार्थना सुनने वाले हैं. जितने संसार के गण हैं आप सबके स्वामी हैं . विद्वानों के भी आप विद्वान् हैं. आप सब ब्रह्मवेत्ताओं में ज्येष्ठ हैं. आप हमारे ह्रदय रूपी आसन में आकर विराजमान हो....
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.....भगवान् गजानन की मान्यता भारतवर्ष में प्राचीन समय से चली आ रही है , स्मार्त (गृहस्थ ) उपासना में भी श्री गणेश जी की गणना की जाती है . यजुर्वेद में भी ' गणानान्त्वा गणपति हवामहे ...' इत्यादि मन्त्र में गणपति का अर्थ ग्रहण किया गया है , यद्यपि वेद भाष्यकार ' उव्वट महीधर ' ने इस मन्त्र का अर्थ प्रकरणानुसार अश्व किया है , तथापि ' यास्क मुनि ' के कथनानुसार तप से वेद मन्त्रों के अनेकार्थ हो जाते हैं . ऐसा सिद्धांत होने से गणपतिपरक अर्थ की संभावना में कोई संदेह नहीं किया जा सकता .
..... अवैदिक जैन पंथ और बौद्ध पंथ में भी गणेश की मान्यता को स्वीकार किया गया है .
..... बहुत से लोगो का मानना है कि गणेश पूजा अनार्यों से आर्यों में आयी , यह कथन सर्वथा अप्रामाणिक है .
..... नेपाल, तिब्बत , कम्बोडिया , जापान , चीन , मंगोल आदि देशों में भी गणेश प्रतिमाएं मिली है , जिससे गणेश उपासना की व्यापकता सिद्ध होती है , और गणेश का वैज्ञानिक रूप व उपासना क्रम भारतवर्ष से ही इन देशों में गया है , क्योंकि ' मनु जी ' ने कहा है कि ...
..... एतद्देश प्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मन:| स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरंपृथिव्याम सर्व मानवा:||
..... इस देश में पैदा हुए अग्रजन्मा के द्वारा ही संसार के सभी देशों के लोगों ने ज्ञान प्राप्त किया है. इसलिए इस गणेश विज्ञान को अनार्यों से सीखने का कोई प्रमाण नहीं है ...
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----- महाकवि कालीदास ने ' चिदगगन चन्द्रिका ' में श्री गणेश जी के आविर्भाव के सम्बन्ध में लिखा है ......
..... सर्वप्रथम चिद्शक्ति से स्फुरित होता हुआ क्षीर समुद्र पौर्णमासी चन्द्र के समान जो निस्तरंग स्फुरित हो रहा है , जहां कि इस चिद्व्योम में नादतत्व का फैलाव हो रहा है , जो तेजोमयी बिन्दुमाला धारण किये हुए हैं , आदि शिवशक्ति का स्पंद जिनका स्वरुप है , ॐ कार रूपी शुण्ड से जिनकी क्रियाशक्ति प्रकट हो रही है , दन्त जिनके मुख से निकला हुआ है , शक्ति से उत्पन्न होने वाले जो गणेश है वे हमारे क्लेशों को दूर करें...
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..... आप सभी मित्रों के लिए यहाँ पर " श्री श्वेतार्क गणपति ' की दो दुर्लभ प्रतिमाएं दर्शनार्थ प्रस्तुत कर रहा हूँ , इसमें से एक प्रतिमा में अभिमंत्रित होते समय ही एक ' नागदेव' आकर लिपट गए थे ...मानो आदिदेव महादेव ने स्वयं अपने गण को आशीर्वाद देने भेज दिया हो....दर्शन लाभ करें ...श्री महागणपति आपकी मनोकामनाएं पूर्ण करें...
..... आपका ' विजय '

Saturday, September 7, 2013

यह कितनी विडम्बना है ...

..... मेरे आत्मीय मित्रों ! जय महाशक्ति ...
..... आज आपसे एक बहुत गंभीर चर्चा करने जा रहा हूँ , पिछले कुछ वर्षों से धर्म और ज्योतिष के क्षेत्र में कुछ ऐसा बदलाव आया है जिसके कारण इन विषयों से आम जनमानस का विश्वास कम होने लगा है ...
..... अक्सर फेसबुक पर भी यन्त्र , मंत्र , तंत्र , ज्योतिष , पराविज्ञान , काला जादू , लालकिताब , रावण संहिता , भृगुसंहिता आदि अत्यंत गूढ़ विषयों पर भी आधी अधूरी जानकारी देखने को मिलती है....
..... भूत , प्रेत , पिशाच , जिन्न , चुड़ैल , बैताल , ब्रह्म राक्षस , योगिनी , डाकिनी , शाकिनी आदि के विषय में भी भ्रान्तिपरक बातें आम जन जीवन में सुनने देखने को मिलती है . इन्हीं बातो को हौव्वा बना कर आम जनमानस को डरा कर उसका शोषण करने का सर्वत्र प्रयास होता रहता है ....जबकि इसकी हकीकत कुछ और है ....
..... यद्यपि इस तरह का कार्य करने वाले इन विषयों के कदापि जानकार नहीं होते , किन्तु फिर भी अपने वाणी और क्रियाकलापों से ऐसे लोग आम जनमानस का शोषण करने में कामयाब हो ही जाते है ....
..... कुछ बड़े बाबा टाइप जीवधारी भी काला जादू , या तंत्र मन्त्र की आड़ में अपना वर्चस्व बनाने में कामयाब होते है ...
..... एक दिन ' श्री पुष्कर व्यास जी' ने एक प्रश्न फेसबुक पर किया था कि , ' बृहस्पति ' का एक नाम ' जीव' भी है , यह नाम कैसे और कब पडा , इस प्रश्न के उत्तर कई ज्योतिषी बंधुओं ने स्वविवेक से दिए , किन्तु उनमें से एक भी उत्तर सही नहीं था ....? यह कितनी विडम्बना है ...
..... अब ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि इस आभासीय और वास्तविक जगत में यह कैसे जाना जाय कि जो ज्योतिषीगण इसका व्यावसायिक उपयोग कर रहे हैं , उन्हें ज्योतिष जैसे गूढ़ विषय का वास्तविक ज्ञान है भी या नहीं ...
..... जिन मन्त्रों के विषय में लिख रहे है उन मन्त्रों का वैज्ञानिक रूप क्या है , और वह कौन सी विधियां है जिनसे मन्त्र प्रभावशाली हो कर अपना असर दिखाते हैं...क्या हर मन्त्र हर व्यक्ति को लाभ करेगा ? क्या इसका कोई रास्ता निकाला जा सकता है ...? क्या किसी पुस्तक से पढ़कर इन मन्त्रों का प्रयोग किया जाना उचित है ? बहुत से प्रश्न है ...यह एक महत्वपूर्ण विषय है ....
..... ..... सोशल मीडिया अब काफी ताकतवर हो चुका है , मैं सोच रहा हूँ कि इसी के जरिये मैं आम जनमानस और अपने मित्रों को इन विषयों की वास्तविकता बताऊँ , ताकि वे किसी के द्वारा गुमराह न किये जा सके , और अपने उत्थान के लिए स्वत: वे ऐसे आसान उपाय और उनकी विधियां जान सके , जिससे वास्तव में उनके जीवन में सही मार्गदर्शन हो सके ...और वह अपना आत्मिक , मानसिक , आर्थिक उत्थान स्वयं कर सकें ...
..... मेरे आत्मीय मित्रों क्या उचित रहेगा ? क्या मुझे ऐसा करना चाहिए...? आपकी क्या सलाह है ....?

Tuesday, September 3, 2013

......... महापुराण .........

..... मेरे आत्मीय बंधुओं ! यथोचित अभिवादन ...
..... फेस बुक पर बहुत समय से यह विवाद चला आ रहा है कि ' विष्णु ( श्री मद्भागवत ) भागवत महा पुराण है या देवी भागवत ...? वैष्णव श्री मद्भागवत को महापुराण और शाक्त देवी भागवत को महापुराण मानते है ... दोनों में एक के मत से एक महापुराण और दूसरा उप पुराण है ...वास्तव में पुराणों की गणना में कहीं भी इस तरह का उल्लेख नहीं है . गणना में केवल ' भागवत ' शब्द आया है ...
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......... महापुराण .........
अठारह पुराणों को बताने के लिए यह श्लोक है ...
.....मद्वयं भद्वयं चैव ब्रत्रयं व चतुष्टकम | अनापलिंगकूस्कानि पुराणानि पृथक पृथक ||
..... अर्थात -मद्वयं = मार्कंडेय , मत्स्य . भद्वयं = भागवत , भविष्य . चैव ब्रत्रयं = ब्रह्माण्ड , ब्रह्म , ब्रह्मवैवर्त . व चतुष्टकम = विष्णु , वामन, वाराह , वायु ( शिव ) | अनापलिंगकूस्कानि = अग्नि , नारद , पद्म , लिंग , गरुड़ , कूर्म , स्कन्द .पुराणानि पृथक पृथक || यह अठारह महापुराण है ...
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.....उप पुराण....
..... १- आदि पुराण , २- नरसिंह पुराण, ३- स्कन्द पुराण , ४- शिवधर्म पुराण , ५- दुर्वासा पुराण , ६- नारदोक्त पुराण , ७- कपिल पुराण , ८- वामन पुराण , ९- औशनस पुराण , १०- ब्रह्माण्ड पुराण , ११- वरुण पुराण , १२- कालिका पुराण , १३- माहेश्वर पुराण , १४ - साम्ब पुराण , १५- सौर पुराण , १६- पाराशर पुराण , १७ - मारीच पुराण , १८- भास्कर पुराण ...
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..... औप पुराण .....
..... १- सनत्कुमार पुराण , २- बृहन्नारदीय पुराण , ३- आदित्य पुराण , ४- मानव पुराण , ५- नंदिकेश्वर पुराण , ६- कौर्म पुराण , ७- भागवत पुराण , ८- वशिष्ठ पुराण , ९- भार्गव पुराण , १०- मुदगल पुराण , ११- कल्कि पुराण , १२-देवी पुराण , १३- महाभागवत पुराण , १४- बृहत्धर्म पुराण , १५- परानंद पुराण , १६- पशुपति पुराण , १७- वन्हि पुराण , १८- हरिवंश पुराण ...