Friday, February 17, 2017

वास्तु शास्त्र पर एक शोध लेख

 धर्मशास्त्रीय निर्देशों के अनुसार ‘वास्तु पूजा प्रकुर्वीत ग्रहारम्भे प्रवेशे च’ अर्थात् भूमि का परीक्षण एवं पूजन अवश्य करना चाहिए। वर्तमान समय में जनमानस का रूझान (वास्तु-शास्त्र) की ओर बढ़ा है। यहाँ तक कि विदेशों में भी वास्तु पर शोध होकर भवनों का निर्माण होने लगा है यदि निवास अथवा ‘व्यापारिक स्थान’ बनाने के पूर्व ‘वास्तु-शास्त्र’ के निर्देशों पर ध्यान दें लें तो जीवन ऐश्वर्यमय  एवं सुख-शांति से व्यतीत होगा। इसमें कोई संदेह नहीं है।
 वास्तु शास्त्र के अनुसार भवन-निर्माण करने से पूर्व शिलान्यास करना चाहिए जिस दिशा में शिलान्यास किया जाता है, उसका विचार सूर्य संक्रान्ति के आधार पर दो दिशाओं के    मध्य भाग (कोण) के अन्तर्गत किया जाता है। शिलान्यास के लिये पाँच शिलाओं का स्थापन करना चाहिए। स्थापन से पूर्व यथासम्भव देवार्चन एवं शिला-पूजन करना चाहिए। भवन-निर्माण के लिए यह आवश्यक है कि दीवार सीधी और एक आकृति वाली होनी चाहिए, कहीं से मोटी और कहीं से पतली दीवार होने से उसका प्रभाव गृहस्वामी के लिए कष्टप्रद होता है। भवन में कक्षों के अर्न्तगत रोशनी और हवा का ध्यान रखते हुए खिड़कियों तथा सामान आदि के लिये अलमारी अवश्य करना चाहिए।
 प्लाट के चारों ओर खाली स्थान छोड़ना चाहिए, जिसमें पूर्व और उत्तर दिशा में अधिक खाली स्थान रखकर गैराज व लान का प्रयोग शुभकारक होता है। भवन-निर्माण में उत्तर एवं पूर्व दिशा में भूखंड का खाली स्थान दक्षिण एवं पश्चिम दिशा की अपेक्षा अधिक रहना श्रेयस्कर होता है। भवन-निर्माण के समय उसकी आकृति का ध्यान रखना अति आवश्यक है। प्रायः भवनों के निम्नलिखित आकार का फल इस प्रकार है-
1. आयताकार  सभी प्रकार की प्राप्ति
2. चतुरान्न  धन-वृद्धि
3. भद्रासन  जीवन में सफलता
4. गोलाकार  ज्ञान एवं स्वास्थ्यवर्धक
5. चक्राकार  निर्धनता
6. त्रिकोणाकार  राजभय
7. शंक्वाकार  धनहानि, रोगकारक, मृत्युभय, दण्डादि
8. विषम भुजाकार मानसिक परेशानियाँ
9. दण्डाकार  पशुहानि
10. पणवाकार  नेत्रपीड़ा एवं गृह हानि
11. भुजाकार  स्त्रियों के लिए कष्ट एवं हानि
12. वृहद् मुखाकार पारिवारिक हानि, भ्रातृ-कलह
13. व्यंजनाकार (पंखा) धन-हानि एवं जीव हिंसा
14. कूर्म पृष्ठाकार शत्रुता, मृत्यु, हिंसा, अवनतिकारक
15. धनुषाकार  विविध परेशानियाँ, चोट एवं शत्रुभय
16. शूपाकार  सामान्य एवं कष्टकारक
वास्तु शास्त्र में 16 कक्षों की निर्धारित दिशाओं में निम्न प्रकार से कक्षों को स्थापित करना चाहिए। मुहूर्त चिंतामणि के अनुसार-पूर्व में स्नानागार, आग्नेय में रसोई, दक्षिण में शयन कक्ष, नैऋर्त्य में विश्राम कक्ष, पश्चिम में भोजन कक्ष, वायव्य में अन्न संग्रह, उत्तर में धनागार, ईशान में पूजास्थल, पूर्व एवं आग्नेय के मध्य में आग्नेय एवं दक्षिण के मध्य घृत संग्रह, दक्षिण और नैऋर्त्य के मध्य शौचालय, नैऋर्त्य और पश्चिम के मध्य अध्ययन कक्ष, पश्चिम के मध्य दण्डाकार, उत्तर-पश्चिम के मध्य शयन कक्ष, अविवाहित संतानों के लिए उत्तर एवं ईशान के मध्य औषद्द कक्ष, पूर्व एवं ईशान के मध्य स्वागत एवं सार्वजनिक कक्षों का निर्माण का उल्लेख है।
 भवन में विभिन्न कक्षों की स्थिति वास्तु के अनुसार इस प्रकार होनी चाहिए। पूजा कक्ष, भवन का मुख्य अंग है। पूजन, भजन, कीर्तन, अध्ययन-अध्यापन कार्य सदैव ईशान कोण में होना चाहिए। पूजास्थल से मानसिक शांति, बुद्धि शुद्धि, मन पर शुद्ध संस्कार प्रभाव डालते हैं। पूजा करते समय व्यक्ति का मुख पूर्व में होना चाहिए, ईश्वर की मूर्ति का मुख पूर्व, पश्चिम व दक्षिण की ओर होना चाहिए। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र, सूर्य, कार्तिकेय का मुख पूर्व या पश्चिम की ओर होना चाहिए। गणेश, कुबेर, दुर्गा, भैरव, षोडश,मातृका का मुख सदैव दक्षिण की ओर होना चाहिए। हनुमान जी का मुख नैऋत्य कोण की ओर होना चाहिए, पूजास्थल अन्य किसी कोण में बनाना उचित नहीं है। फैक्ट्री, मिल या इण्डस्ट्री के ईशान कोण में मंदिर अथवा आराद्दना-स्थल का निर्माण करना चाहिए। स्वागत कक्ष, अतिथि गृह, पीने का पानी, यह सभी ईशान कोण की ओर रखना शुभ होता है।
 रसोईघर- भवन में रसोईघर आग्नेय कोण या पूर्व या आग्नेय के मध्य या पूर्व में बनाना चाहिए। रसोईघर में चूल्हा या गैस आग्नेय कोण में रखें। ताजी हवा का पंखा उत्तर व पूर्व दिशा में लगायें।
 भोजनालय - प्राचीन काल में भोजन रसोईघर में ही किया जाता था, परन्तु वर्तमान में भोजन के लिए अलग कक्ष की स्थापना की जाती है। बहुधा स्थानाभाव में भोजन कक्ष ड्रांइगरूम के एक भाग में बना लिया जाता है। डायनिंग टेबल ड्रांइगरूम के दक्षिण-पूर्व में रखनी चाहिए अथवा भोजन कक्ष में भी दक्षिण-पूर्व में रखनी चाहिए। भोजनालय या भोजन कक्ष भवन में पश्चिम या पूर्व दिशा में बनाना चाहिए।
 भण्डारगृह अथवा स्टोर- प्राचीनकाल में पूरे वर्ष के लिये अन्नादि का संग्रह किया जाता था। इसलिए भवन में भण्डार-गृह की अलग व्यवस्था होती थी परन्तु वर्तमान में स्थानाभाव के कारण रसोईघर में खाद्यान्न रख लिया जाता है। खाद्यान्न रसोईघर में ईशान और आग्नेय कोण के मध्य पूर्वी दीवार के सहारे रखना चाहिए। यदि स्थान उपलब्ध है तो भवन के ईशान और आग्नेय कोण के मध्य पूर्वी भाग में भण्डार-गृह का निर्माण करना श्रेष्ठ होता है।
 शौचालय - वास्तु नियमों के आधार पर शौचालय हेतु नैऋर्त्य कोण व दक्षिण कोण के मध्य या नैऋत्य कोण व पश्चिम दिशा के मध्य स्थान सार्वाधिक उपयुक्त है। शौचालय में शीट इस तरह रखी जानी चाहिए कि बैठते समय उसका मुख दक्षिण या पश्चिम की ओर हो। पानी का बहाव उत्तर-पूर्व में रखें। उत्तरी व पूर्वी दीवार के साथ शौचालय न बनावायें।
 स्नानगृह - वास्तु नियमों के अनुसार, स्नानागृह भवन के पश्चिम-दक्षिण दिशा के मध्य अथवा नैऋत्य कोण व पश्चिम दिशा के मध्य होना चाहिए। मतान्तर में पूर्व में रखें। आधुनिक स्नानागृह में गीजर इत्यादि की भी व्यवस्था होती है। गीजर आदि का संबंद्द अग्नि से होने के कारण सदैव आग्नेय (दक्षिण-पूर्व) में लगाना चाहिए। स्नानागृह व शौचालय के लिए अलग-अलग स्थान सुनिश्चित किया जाना चाहिए। परन्तु स्थान सीमित होने के कारण ऐसा संभव न हो और स्नानागृह तथा शौचालय एक साथ बनाना पड़े तो भवन के दक्षिण-पश्चिम भाग में या वायव्य कोण में बनाना चाहिए। यदि कोई विकल्प न मिले तो आग्नेय कोण में शौचालय बनाकर उसके साथ पूर्व की ओर स्नानागृह समायोजित कर लेना चाहिए। यह ध्यान रखें कि स्नानागृह व शौचालय नैऋर्त्य कोण व ईशान कोण में कदापि न बनवायें, वैसे जहाँ तक संभव हो, ये अलग-अलग भाग में या वायव्य कोण में बनाने चाहिए।
 शयनकक्ष- भवन में शयन कक्ष दक्षिण या पश्चिम दिशा में होना चाहिए। सोते समय सिर दक्षिण दिशा में, पैर उत्तर दिशा में होना चाहिए। ऐसा होने को सोने वाले को शांति व गहरी नींद आती है। घर में सुख-समृद्धि व धन-धान्य की वृद्धि होती है। यदि दक्षिण दिशा में सिरहाना रखना संभव न हो तो सिरहाना पश्चिम दिशा की ओर होना चाहिए। अन्य दिशाओं में सिरहाना रखने से मन शान्त नहीं होता है।
 अध्ययन कक्ष- वास्तु नियमों के अनुसार वायव्य, नैऋत्य कोण और पश्चिम दिशा के मध्य अध्ययन कक्ष बनाना श्रेष्ठ होता है। ईशान कोण में पूर्व दिशा में पूजागृह के साथ भी सर्वोत्तम होता है।
 पानी की टंकी-  भवन की छत पर पानी की टंकी बनाने हेतु भव्य व उत्तर दिशा के मध्य या वायव्य व पश्चिम दिशा के मध्य का स्थान शुभ होता है। भूमिगत पानी की टंकी के लिए ईशान कोण सर्वोत्तम होता है।
 जल प्रवाह- भवन निर्माण के समय जलप्रवाह का विशेष ध्यान रखना चाहिए। वास्तु नियम के अनुसार समस्त जलप्रवाह पूर्व, वायव्य, उत्तर और ईशान कोण में रखना शुभ है। जल उत्तर-पूर्व व उत्तर-पश्चिम कोण से घर के बाहर निकलना चाहिए। वास्तु के अनुसार पूर्व दिशा में जल निकास शुभ, उत्तर दिशा में द्दन-लाभ, दक्षिण दिशा में रोग व कष्ट, पश्चिम में धन हानिकारक है। जल का निकास ईशान, उत्तर और पूर्व दिशा में शुभ होता है। अर्थात् भवन का समस्त जलप्रवाह पूर्व, वायव्य, उत्तर और ईशान दिशा में रखना शुभ होता है। भवन के पूर्व दिशा में  नाली निकालने का मार्ग वृद्धिदायक, उत्तर दिशा में अर्थलाभ, दक्षिण दिशा की ओर रोग, पीड़ा एवं पश्चिम दिशा की ओर धन हानि होती है। अतः वास्तुशास्त्र नियमों के अनुसार जल का प्रवाह उत्तर-पूर्व (ईशान) पूर्व-उत्तर दिशा की ओर ही रखना चाहिए।
 आँगन- भवन का केन्द्रीय स्थल ब्रह्मस्थान कहलाता है। प्राचीन समय में ब्रह्मस्थान आंगन (चौक) होता था। वर्तमान में स्थानाभाव के कारण आंगन का प्रावधान खत्म होता जा रहा है। भवन के मध्य में आंगन या खुलास्थान इस प्रकार उत्तर या पूर्व की ओर रखें जिससे सूर्य का प्रकाश अधिकाधिक प्रविष्ट हो आंगन मध्य मेंं ऊँचा और चारों ओर नीचा हो तो शुभ एवं मध्य में नीचा और चारों और ऊँचा हानिकारक होता है।
 पशुशाला- वास्तु के आधार पर गौशाला अथवा पशुशाला के लिए भवन में उत्तर-पश्चिम दिशा और अर्थात् वायव्य कोण का स्थान शुभप्रद होता है।
 बालकनी- हवा, धूप व भवन के सौन्दर्य के लिए बालकनी का विशेष महत्व है। वास्तु के आधार पर यदि भूखण्ड पूर्वोन्मुख है तो बालकनी उत्तर-पूर्व यदि भूखण्ड पश्चिमोन्मुख है तो बालकनी का स्थान-सा चयन करते समय ध्यान रखें कि सूर्य का प्रकाश एवं प्राकृतिक हवा का प्रवेश भवन में होता रहे।
 गैराज- वास्तु के अनुसार गैराज भवन के दक्षिण-पूर्व या उत्तर-पश्चिम दिशा में बनाना चाहिए।
 विद्युत एवं प्रकाश- भवन निर्माण के समय विद्युत एवं प्रकाश का विशेष ध्यान रखना चाहिए। बिजली का मेन स्विच बोर्ड, भवन के दक्षिण भाग में लगवाना चाहिये। कक्ष में प्रवेश करते समय दाहिने हाथ की ओर बिजली का बोर्ड लगवाना चाहिये। बायीं ओर अशुभकारक होता है। भवन के प्रत्येक कक्ष का निर्माण इस तरह करवाना चाहिये कि सूर्य की किरणें निर्बाध प्रवेश करें। स्वास्थ्य एवं भवन की सुरक्षा के लिये सूर्य का प्रकाश व वायु संचारण का विशेष ध्यान रखना चाहिये। प्रदूषित वायु को बाहर निकालने के लिये एक्जास्ट आदि का सही दिशा में निर्धारण करना चाहिए।
 सोपान या सीढ़ी- वास्तु के अनुसार सीढ़ियों का द्वार पूर्व व दक्षिण दिशा में शुभ होता है। यदि सीढ़ियाँ घुमावदार बनवानी हों तो उसका घुमाव सदैव पूर्व से दक्षिण, दक्षिण से पश्चिम, पश्चिम से उत्तर और उत्तर से पूर्व की ओर होना चाहिए। सीढ़ियाँ हमेशा विषम संख्या में बनवानी चाहिए। सीढ़ियों के नीचे एवं ऊपर द्वार खुला होना चाहिए।
 तिजोरी- भवन मेंं तिजोरी नगदी आदि सदैव उत्तर दिशा में रखना चाहिए, क्यांकि कुबेर का वास उत्तर दिशा में होता है। तिजोरी में श्रीयंत्र या लक्ष्मी-कुबेर यंत्र भी रखना चाहिए, ऐसा करने पर तिजोरी कभी खाली नहीं होती है।
 तहखाना या तलघर- तहखाने का निर्माण भूखण्ड के पूर्व या उत्तर दिशा की ओर करवाना शुभ तथा अन्य दिशाओं में अशुभकारक होता है। सम्पूर्ण भवन में तलघन नहींं बनवाना चाहिए, यदि तलघर का आकार चूल्हे के आकार त्रिशाल वास्तु आकार का हो तो यह निर्माणकर्ता के लिये कष्टप्रद होता है।
 सेवक कक्ष- वास्तु के अनुसार सेवकों के लिये कक्ष भवन के दक्षिण-पूर्व या उत्तर-पूर्व में होना चाहिए। इसमें सेवक भी प्रसन्नता से रहते हैं। उत्तर एवं दिशा की दीवारों का वजन अद्दिक न हो।
 खिड़कियाँ- भवन में खिड़कियों की संख्या सम होनी चाहिए। पश्चिमी, पूर्वी और उत्तरी दीवारों पर खिड़कियों का निर्माण शुभ होता है। प्रायः द्वार के सामने खिड़कियां होनी चाहिये, ऐसा करने से गृह में सुख-शांति रहती है। खिड़कियों का निर्माण सन्धि का भाग में ऊँचाई कम रखना चाहिए।
 खुला द्वार- भूखण्ड में उत्तर-पूर्व (ईशान) में खुला द्वार रखना चाहिए, दक्षिण व पश्चिम में खुला स्थान कम होना चाहिए। यदि दो मंजिल भवन है तो पूर्व एवं उत्तर दिशा की ओर भवन की ऊँचाई कम होनी चाहिए।
 मुख्य द्वार- वास्तु नियम के अनुसार मुख्य द्वार उत्तर या पूर्व दिशा में हो। दक्षिण एवं पश्चिम में द्वार नहीं होना चाहिए। यदि भूखण्ड पूर्वोन्मुख हो तो मुख्य द्वार ईशान और पूर्व दिशा की ओर बनाना चाहिये। यदि भूखण्ड दक्षिणोन्मुख हो तो मुख्य द्वार आग्नेय और दक्षिण दिशा के मध्य बनाना चाहिये। यदि भूखण्ड पश्चिमोन्मुख हो तो मुख्य द्वार पर नैऋर्त्य और पश्चिम दिशा के मध्य बनाना चाहिये। उत्तरोन्मुख हो तो मुख्य द्वार वायव्य और उत्तर दिशा के मध्य होना चाहिए। दरवाजों की संख्या सम होनी चाहिए। द्वार के सामने सीढ़ी, खम्बा नहीं होना चाहिए।
 भवन में वृक्ष- ऊँचे व घने वृक्ष दक्षिण,पश्चिम भाग में लगाने चाहिए। अन्य वृक्ष किसी भी दिशा में लाभदायक होते हैं।
 भवन की ऊँचाई- भवन की ऊँचाई के लिये भवन की चौड़ाई के 16वें भाग में चार हाथ (16 अँगुल) जोड़कर जितना योग हो, उसके समान ऊँचाई होनी चाहिए। यदि भवन को दो मंजिल या इससे अधिक का निर्माण कराना हो तो पहली ऊँचाई रखनी चाहिए। यही क्रम तीसरी मंजिल के लिये भी होना चाहिये।
 यदि इस क्रम में 4, 3-1/2, 3 हाथ जोड़ा जाय तो ऊँचाई उत्तम, मध्यम, कनिष्ठ तीन प्रकार की होगी। यदि इस क्रम में भी क्रमशः चार हाथ में 26, 21, 16 अंगुल तथा 3-1/2 और तीन हाथ में 26, 21, 15 अंगुल और जोड़ने पर उत्तम, मध्यम, कनिष्ठ ऊँचाई के तीन-तीन भेद हो जायेंगे। इस प्रकार कुल 12 भेद होंगे, इनमें 8वां और 10वां भाग समान होने से 11 भेद हो जायेंगे। भवन में ऊँचाई का निर्णय इस रीति से करना चाहिये। कई विद्वानों के मत में चारों दिशाओं में ऊँचाई समान होनी चाहिये, पूर्वोत्तर में ऊँचा गृह पुत्रनाशक होता है। आठों दिशाओं में भवन के ऊँचे अथवा नीचे होने का परिणाम से जानना चाहिये।

Thursday, February 16, 2017

विद्यारम्भ मुहूर्त

जनवरी (2017)
18 माघ.कृ.06 बुध हस्त में।
29 माघ.शु.02 रवि धनिष्ठा में, घं.13/03 के बाद।
फरवरी (2017)
01 माघ.शु.05 बुध  उ.भा. में।
02 माघ.शु.06 गुरू  रेवती में।
08 माघ.शु.12 बुध  आर्द्रा में।
16 फा.कृ.05 गुरू  चित्रा/स्वाती में,     षष्ठी में।
17 फा.कृ.06 शुक्र  स्वाती में,
   घं.09/26 के पूर्व।
22 फा.कृ.11 बुध  पू.षा. में।
मार्च (2017)
01 फा.शु.03 बुध  रेवती में।
02 फा.शु.04 गुरू  अश्विनी में,
   घं.13/04 के बाद।
08 फा.शु.11 बुध  पुनर्वसु में,
   घं.11/32 के पूर्व।
09 फा.शु.12 गुरू  पुष्य में,
   घं.08/59 के पूर्व।
अप्रैल (2017)
21 वैशाख कृ. 10 शुक्र धनिष्ठा में।
    घं.17 मि.03 के पूर्व।
23 वैशाख कृ. 12 रवि उ.भा. में।
28 वैशाख शु. 02 शुक्र रोहिणी में।
30 वैशाख शु. 05 रवि मृगशिरा/आर्द्रा में।
मई (2017)
01 वैशाख शु. 06 सोम आर्द्रा/ पुनर्वसु में।
05 वैशाख शु. 10 शुक्र पू.फा. में।
    घं.15 मि.40 के पूर्व।
07 वैशाख शु. 12 रवि उ.फा./ हस्त में।
    घं.15 मि.03 के पूर्व।
12 ज्येष्ठ कृ.  01 शुक्र अनुराधा, द्वितीया में।
17 ज्येष्ठ कृ.  06 बुध उ.षा./श्रवण में।       घं.16 मि.34 के पूर्व।
21 ज्येष्ठ कृ.  10 रवि पू.भा. में।
    घं.05 मि.25 के पूर्व।
28 ज्येष्ठ शु.  03 रवि आर्द्रा में।
    घं.10 मि.44 के पूर्व।
जून (2017)
05 ज्येष्ठ शु.  11 सोम चित्रा में।
    घं.09 मि.45 के पूर्व।
11 आषाढ़ कृ. 02 रवि मूल/पू.षा. में।
25 आषाढ शु. 02 रवि पुनर्वसु में।
29 आषाढ शु. 06 गुरू पू.फा. में।
    घं.07 मि.07 के पूर्व।
फरवरी (2018)
09 फाल्गुन कृ. 09 शुक्र अनुराधा में।
    घं.14 मि.36 से
    घं.16 मि. 57 के बीच।
11 फाल्गुन कृ. 11 रवि मूल में।
18 फाल्गुन शु. 03 रवि पू.भा./उ.भा. में।
21 फाल्गुन शु. 06 बुध अश्विनी में।
25 फाल्गुन शु. 10 रवि मृगशिरा/आर्द्रा में।
मार्च (2018)
04 चैत्र कृ.  03 रवि हस्त में।
    घं.13 मि.40 के पूर्व।

अक्षरारम्भ मुहूर्त

जनवरी (2017)
06 पौ.शु.08 शुक्र रेवती में।
09 पौ.शु.12 सोम रोहिणी में।
18 माघ कृ.06 बुध हस्त में,
   घं.12/49 के पूर्व।
19 माघ कृ.07 गुरू चित्रा में।
20 माघ कृ.08 शुक्र स्वाती में, घं.12/35 के पूर्व।
23 माघ कृ.11 सोम अनुराधा में।
30 माघ शु.03 सोम शतभिषा में, घं.11/31 के पूर्व। 
फरवरी (2017)
01 माघ.शु.05 बुध  उ.भा. में।
02 माघ.शु.06 गुरू  रेवती में।
03 माघ.शु.07 शुक्र  अश्विनी में।
06 माघ.शु.10 सोम  रोहिणी में, घं.14/53 के पूर्व।
08 माघ.शु.12 बुध  आर्द्रा/पुनर्वसु में, घं.12/14  बाद।
09 माघ.शु.13 गुरू  पुनर्वसु में,
   घं.09/22 के पूर्व।
13 फा.कृ.03 सोम  उ.फा. में,
 घं.08/59 से घं.16/45 के बीच।
16 फा.कृ.05 गुरू  चित्रा में,
   घं.07/24 के बाद।
17 फा.कृ.06 शुक्र  स्वाती में,
   घं.09/26 के पूर्व।
24 फा.कृ.13 शुक्र  उ.षा./श्रवण   में।
27 फा.शु.01 सोम  शतभिषा में,
   घं.05/50 के पूर्व।    
मार्च (2017)
01 फा.शु.03 बुध  रेवती में।
02 फा.शु.04 गुरू  अश्विनी में,
  घं.13 मि.04 के बाद।
08 फा.शु.11 बुध  पुनर्वसु में,
   घं.11/32 के पूर्व।
09 फा.शु.12 गुरू  पुष्य में,
   घं.08 मि.59 के पूर्व।
13 चै.कृ.01 सोम  उ.फा. में।
15 चै.कृ.03 बुध  चित्रा में,
   घं.10 मि.30 के पूर्व।
23 चै.कृ.10 गुरू  उ.षा. में,
   घं.13 मि.28 के बाद।
24 चै.कृ.11 शुक्र  श्रवण में।
29 चै.शु.02 बुध  रेवती में।
 
मार्च (2017)
29 चैत्र शु.  02 बुध रेवती में।    मई (2017)
01 वैशाख शु. 06 सोम पुनर्वसु में।
12 ज्येष्ठ कृ.  01 शुक्र अनुराधा, द्वि. में।
17 ज्येष्ठ कृ.  06 बुध श्रवण में।
    घं.16 मि.34 के पूर्व।
22 ज्येष्ठ कृ.  11 सोम रेवती में।
29 ज्येष्ठ शु.  04 सोम पुनर्वसु/पुष्य में।
    घं.11 मि.09 के बाद।
जून (2017)
05 ज्येष्ठ शु.  11 सोम चित्रा में।
    घं.09 मि.45 के बाद।
19 आषाढ़ कृ. 10 सोम रेवती में।
    घं.14 मि.22 के पूर्व।
26 आषाढ़ शु. 03 सोम पुष्य में।
जुलाई (2017)
03 आषाढ़ शु. 10 सोम स्वाती में।
फरवरी (2018)
09 फाल्गुन कृ. 09 शुक्र अनुराधा में,       घं.14 मि.36 से
    घं.16 मि. 57 के बीच।
21 फाल्गुन शु. 06 बुध अश्विनी में।

चूड़ाकरण (चौल मुण्डन) मुहूर्त

जनवरी (2017)
19 माघ.कृ.07 गुरू चित्रा में।
30 माघ.शु.03 सोम शतभिषा में।
फरवरी    (2017)
03    माघ.शु.07    शुक्र    अश्विनी    में।
08    माघ.शु.12    बुध    पुनर्वसु    में,    घं.12/14    के    बाद।
09    माघ.शु.13    गुरू    पुनर्वसु    में।
24    फा.कृ.13    शुक्र    श्रवण    में।    
मार्च    (2017)
02    फा.शु.04    गुरू    अश्विनी    में,घं.13/04    के    बाद।
08    फा.शु.11    बुध    पुनर्वसु    में,
    घं.11/32    के    पूर्व।

अप्रैल    (2017)
21    वैशाख    कृ.    10    शुक्र    धनिष्ठा    में,    घं.17    मि.03    के    पूर्व।
22    वैशाख    कृ.    11    शनि    शतभिषा    में,    (वैश्यों    के    लिए)
30    वैशाख    शु.    05    रवि    मृगशिरा    में,    (ब्राह्मणों    के    लिए)
मई    (2017)
02    वैशाख    शु.    07    मंगल    पुष्य    में,    (क्षत्रियों    के    लिए)
08    वैशाख    शु.    13    सोम    हस्त/    चित्रा    में।
13    ज्येष्ठ    कृ.    02    शनि    ज्येष्ठा    में,    (वैश्यों    के    लिए)
16    ज्येष्ठ    कृ.         05    मंगल    उ.षा.    मे,    (क्षत्रियों    के    लिए)
18    ज्येष्ठ    कृ    .07    गुरू    श्रवण/धनिष्ठा    में।
23    ज्येष्ठ    कृ.    12    मंगल    अश्विनी    में,    (क्षत्रियों    के    लिए)
27    ज्येष्ठ    शु.    02    शनि    मृगशिरा    में।
    (वैश्यों    के    लिए)
29    ज्येष्ठ    शु.    04    सोम    पुनर्वसु/पुष्य    में।
    घं.11    मि.09    के    बाद।
30    ज्येष्ठ    शु.    05    मंगल    पुष्य    में।
    (क्षत्रियों    के    लिए)
जून    (2017)
03    ज्येष्ठ    शु.    09    शनि    हस्त    में।
    घं.06    मि.54    के    बाद,    (वैश्यों    के    लिए)    
06    ज्येष्ठ    शु.    12    मंगल    स्वाती    में।    
    घं.11    मि.45    के    बाद,    (क्षत्रियों    के    लिए)
20    आषाढ़    कृ.    11    मंगल    अश्विनी    में।    
    (क्षत्रियों    के    लिए)
25    आषाढ़    शु.    02    रवि    पुनर्वसु    में।
    (ब्राह्मणों    के    लिए)
26    आषाढ़    शु.    03    सोम    पुष्य    में।
जुलाई    (2017)    
03    आषाढ़    शु.    10    सोम    स्वाती    में।    
फरवरी    (2018)
10    फाल्गुन    कृ.    10    शनि    ज्येष्ठा    में।
    घं.14    मि.46    के    बाद,    (वैश्यों    के    लिए)
17    फाल्गुन    शु.    02    शनि    शतभिषा    में।
    (वैश्यों    के    लिए)
20    फाल्गुन    शु.    05    मंगल    रेवती,    अष्विनी    में
    (क्षत्रियों    के    लिए)

25    फाल्गुन    शु.    10    रवि    मृगशिरा    में।
    (ब्राह्मणों    के    लिए)
मार्च    (2018)
04    चैत्र    कृ.    03    रवि    हस्त    में।
    घं.13    मि.40    के    पूर्व,    (ब्राह्मणों    के    लिए)
06    चैत्र    कृ.    05    मंगल    स्वाती    में।
    (क्षत्रियों    के    लिए)
13    चैत्र    कृ.    11    मंगल    श्रवण    में।
    (क्षत्रियों    के    लिए)

नामकरण मुहूर्त

जनवरी (2017)
06 पौ.शु.08  शुक्र रेवती में।
09 पौ.शु.12  सोम रोहिणी में।
18 माघ कृ.06  बुध हस्त में,
    घं.12/49 के पूर्व।
19 माघ कृ.07  गुरू चित्रा में।
20 माघ कृ.08  शुक्र स्वाती में,
    घं.12/35 के पूर्व।
23 माघ कृ.11  सोम अनुराधा में।
30 माघ शु.03  सोम शतभिषा में, घं.11/31 के पूर्व।
फरवरी (2017)
01 माघ.शु.05  बुध उ.भा. में।
02 माघ.शु.06  गुरू रेवती में।
03 माघ.शु.07  शुक्र अश्विनी में।
06 माघ.शु.10  सोम रोहिणी में,घं.14/53 के पूर्व।
08 माघ.शु.12  बुध पुनर्वसु में,
   घं.12/14 के बाद।
09 माघ.शु.13  गुरू पुनर्वसु में,
    घं.09/22 के पूर्व।
13 फा.कृ.03 सोम  उ.फा. में,
 घं.08/59 से घं.16/45 के बीच।
16 फा.कृ.05 गुरू  चित्रा में,
   घं.07/24 के बाद।
17 फा.कृ.06 शुक्र  स्वाती में,
   घं.09/26 के पूर्व।
24 फा.कृ.13 शुक्र  उ.षा./श्रवण में।
27 फा.शु.01 सोम  शतभिषा में,
   घं.05/50 के पूर्व।     
मार्च (2017)
01 फा.शु.03 बुध  रेवती में।
02 फा.शु.04 गुरू  अश्विनी में,
   घं.13 मि.04 के बाद।
08 फा.शु.11 बुध  पुनर्वसु में,
   घं.11/32 के पूर्व।
09 फा.शु.12 गुरू  पुष्य में,
   घं.08 मि.59 के पूर्व।
13 चै.कृ.01 सोम  उ.फा. में।
15 चै.कृ.03 बुध  चित्रा में,
   घं.10 मि.30 के पूर्व।
23 चै.कृ.10 गुरू  उ.षा. में,
   घं.13 मि.28 के बाद।
24 चै.कृ.11 शुक्र  श्रवण में।
29 चै.शु.02 बुध रेवती में।
मार्च (2017)
29 चैत्र शु.   02 बुध रेवती में।
अप्रैल (2017)
05 चैत्र शु.  09 बुध पुष्य दशमी में।
12 वैशाख कृ. 01 बुध चित्रा/स्वाती में।
    घं.09 मि.02 के पूर्व।
19 वैशाख कृ. 08 बुध उ.षा. में।
21 वैशाख कृ. 10 शुक्र धनिष्ठा में।
    घं.17 मि.03 के पूर्व।
24 वैशाख कृ. 13 सोम उ.भा. में।
    घं.07 मि.24 के पूर्व।
28 वैशाख शु. 02 शुक्र रोहिणी में।
मई (2017)
01 वैशाख शु. 06 सोम पुनर्वसु में।
08 वैशाख शु. 13 सोम हस्त/ चित्रा में।
12 ज्येष्ठ कृ.  01 शुक्र अनुराधा, द्वितीया में।
17 ज्येष्ठ कृ.  06 बुध उ.षा./श्रवण में, घं.16 मि.34 के पूर्व।
18 ज्येष्ठ कृ.  07 गुरू श्रवण, धनिष्ठा में।
19 ज्येष्ठ कृ.   08 शुक्र धनिष्ठा, शतभिषा में।
22 ज्येष्ठ कृ.  11 सोम उ.भा./रेवती में।
26 ज्येष्ठ शु.  01 शुक्र रोहिणी में।
29 ज्येष्ठ शु.  04 सोम पुनर्वसु/पुष्य में।
    घं.11 मि.09 के बाद।
जून (2017)
05 ज्येष्ठ शु.  11 सोम चित्रा में।
    घं.09 मि.45 के बाद।
12 आषाढ़ कृ. 03 सोम उ.षा. में।
    घं.10 मि.52 से
    घ्ां.12 मि.21 के बीच।
19 आषाढ़ कृ. 10 सोम रेवती में।
    घं.14 मि.22 के पूर्व।
26 आषाढ़ शु. 03 सोम पुष्य में।
जुलाई (2017)
03 आषाढ़ शु. 10 सोम स्वाती में।
05 आषाढ़ शु. 12 बुध अनुराधा में।
06 आषाढ़ शु. 13 गुरू अनुराधा में।
13 श्रावण कृ.  04 गुरू शतभिषा में।
    घं.14 मि.47 के बाद।
17 श्रावण कृ.  08 सोम अश्विनी में।
20 श्रावण कृ.  12 गुरू रोहिणी में।
21 श्रावण कृ.  13 शुक्र मृगशिरा में।
    घं.12 मि.50 के पूर्व।
24 श्रावण शु.  01 सोम पुष्य में।
27 श्रावण शु.  04 गुरू उ.फा. में।
    घं.07 मि.03 के बाद।
28 श्रावण शु.  05 शुक्र हस्त में।
31 श्रावण शु.  08 सोम स्वाती में।
अगस्त (2017)
02 श्रावण शु.  10 बुध अनुराधा में।
09 भाद्रपद कृ. 02 बुध शतभिषा में।
10 भाद्रपद कृ. 03 गुरू शतभिषा में।
17 भाद्रपद कृ. 10 गुरू मृगशिरा में।
    घं.12 मि.46 के बाद।
23 भाद्रपद शु. 02 बुध उ.फा. में।
24 भाद्रपद शु. 03 गुरू उ.फा. में।
सितम्बर (2017)
04 भाद्रपद शु. 13 सोम श्रवण, धनिष्ठा में।
07 आश्विन कृ. 01 गुरू उ.भा. में।
08 आश्विन कृ. 02 शुक्र उ.भा./रेवती में।
13 आश्विन कृ. 08 बुध मृगशिरा में।
15 आश्विन कृ. 10 शुक्र पुनर्वसु में।
    घं.07 मि.35 के पूर्व।
20 आश्विन कृ. 30 बुध उ.फा. में।
    घं.11 मि.02 के बाद।
21 आश्विन शु. 01 गुरू हस्त में।
22 आश्विन शु. 02 शुक्र चित्रा में।
25 आश्विन शु. 05 सोम अनुराधा में।
अक्टूबर (2017)
02 आश्विन शु. 12 सोम धनिष्ठा में।
    घं.11 मि.46 के पूर्व।
06 कार्तिक कृ. 01 शुक्र रेवती में।
    घं.15 मि.12 के बाद।
09 कार्तिक कृ. 04 सोम रोहिणी में।
    घं.14 मि.19 से
    घं.15 मि.55 के बीच।
नवम्बर (2017)
09 मार्गशीर्ष कृ. 06 गुरू पुनर्वसु/पुष्य में,
    घं.16 मि.44 के पूर्व।
15 मार्गशीर्ष कृ. 12 बुध हस्त/चित्रा में।
23 मार्गशीर्ष शु. 05 गुरू उ.षा. में।
27 मार्गशीर्ष शु. 08 सोम शतभिषा में।
29 मार्गशीर्ष शु. 10 बुध उ.भा. में।
दिसम्बर (2017)
04 पौष कृ.  01 सोम मृगशिरा में।
फरवरी (2018)
07 फाल्गुन कृ. 07 बुध स्वाती में।
    घं.08 मि.47 से
    घं.12 मि.18 के बीच।
08 फाल्गुन कृ. 08 गुरू अनुराधा में।
09 फाल्गुन कृ. 09 शुक्र अनुराधा में,घं.14 मि.36 से घं.16 मि. 57 के बीच।
16 फाल्गुन शु. 01 शुक्र धनिष्ठा/शत. में।
21 फाल्गुन शु. 06 बुध अश्विनी में।
मार्च (2018)
12 चैत्र कृ.  10 सोम उ.षा. में,
    घं.11 मि.16 के बाद।
15 चैत्र कृ.  13 गुरू धनिष्ठा में।

Saturday, February 11, 2017

संवत 2074 सन 2017-18 में केतु का गोचर फल

श्री शुभ सम्वत् 2072 माघ मास कृष्ण पक्ष पंचमी (उदयकालीन), तदुपरान्त माघ मास कृष्ण पक्ष षष्ठी दिन शुक्रवार अंग्रेजी तारीखानुसार 29 जनवरी 2016 को घं.25 मि. 28 पर केतु का प्रवेश अपनी स्वाभाविक वक्र गति से कुम्भ राशि में होगा। तात्कालिक चन्द्रमा उस समय हस्त नक्षत्र, कन्या राशि पर स्थित रहेगा। वर्ष के अन्त तक केतु कुम्भ राशि में रहेगा। जिसका पाद व गोचर फल इस प्रकार है।             
    सन् 2017 में कुम्भ के केतु  का पाद बोधक फल।
01 जनवरी 2017 से 17 अगस्त 2017 तक।
मेष-कन्या-वृश्चिक राशि वालों को स्वर्ण पाद से व्यापार व नौकरी में बढ़ोत्तरी, पर पारिवारिक माहौल असंतुलित रहेगा। मान सम्मान व प्रतिष्ठा में कमी आयेगी, व्यर्थ भ्रमण।
वृष-सिंह-मकर राशि वालों को रजत पाद होने से सफलता मिलेगी, प्रत्येक क्षेत्र में किये प्रयास सफल होंगे, आय के नये स्त्रोत, इष्ट मित्रों का सहयोग, व्यापार में बढ़ोत्तरी होगी।
मिथुन-तुला-कुम्भ राशि वालों को लौह पाद होने से जीवन त्रस्त हो जायेगा, सामाजिक प्रतिष्ठा में कमी, मान-सम्मान व प्रतिष्ठा में कमी, आर्थिक हानि, परिवार में तनाव।
कर्क-मीन-धनु राशि वालों को ताम्रपाद से आगमन, शुभप्रद है प्रगति, लक्ष्मी प्राप्ति, वैभव, सुख-सम्पदा, प्रगति रोजगार आदि में सफल, धर्म-कर्म, सामाजिक कार्य में रूचि।
सन् 2017 में कुम्भ के केतु का गोचर फल।
01 जनवरी 2017 से 17 अगस्त 2017 तक।
    मेष राशि वालों को एकादश केतु शुभ प्रभाव बढ़ाने वाला है। राहु जनित दुष्प्रभावां को कम कर लाभार्जन की स्थिति अनुकूल रहेगी। संतान पक्ष की चिन्ता दूर होगी।
    वृष राशि वालों को दशमस्थ केतु शुभ प्रभावी होने से राहु के शुभ प्रभावां में वृद्धि होगी। बुद्धिचातुर्य से ऐसे काम को भी अंजाम दे पायेंगे जिसकी संभावना नकारात्मक होगी।
    मिथुन राशि वालों को नवम केतु पूज्य है। घर परिवार के दायित्व तो बढ़ेंगे किन्तु उनका सहजता से निर्वाह होगा, वृद्धजनों को तीर्थ यात्रा या विदेश यात्रा करनी पड़ सकती है।
    कर्क राशि वालों को आठवें केतु कष्टप्रद है, आय में प्रगति, व्यापार में समानता नही रहेगी, क्रोध की अधिकता से जीवन कष्टदायी होगा। परिवार में विघटन की स्थितियाँ बनेगी।
    सिंह राशि वालों को सप्तमस्थ केतु पूज्य है। पारिवारिक मनमुटाव, नित्य जीवन में कुछ कठिनाई अवश्य रहेगी। नौकरी व्यापारिक जीविका की सुरक्षा बनी रहेगी।
    कन्या राशि वालों को छठवें केतु शुभ प्रभावी होने से राहुजनित अशुभ प्रभावां को कम करने में सहायक रहेगा, राजकीय सहायता पा सकेंगे। आमदनी के नये स्त्रोत बनेंगे।
    तुला राशि वालों को पंचमस्थ केतु पूज्य है। विशेष प्रयत्नां से आर्थिक लाभ मिलेगा। सामाजिक राजनीतिक लोगां को सफलता के अवसर मिलेंगे। प्रियजनां से सहयोग सम्पर्क बढे़गा।
    वृश्चिक राशि वालां को चतुर्थ केतु अशुभ है। चालू काम धन्धे में बाधक स्थिति उत्पन्न होगी। शरीर कष्ट, मतिभ्रम, अपव्यय, दुर्घटना आदि की सम्भावना रहेगी।
    धनु राशि वालों को तृतीयस्थ केतु शुभ प्रभावी होने से राहु-जनित परेशानियाँ कम होंगी, श्रम संघर्ष के बावजूद रोग, ऋण, शत्रु का भय दूर होगा। भूमि वाहनादि का सुख
    मकर राशि वालों को द्वितीयस्थ केतु पूज्य है। धन पक्ष के प्रति सचेष्ट रहें, अन्यथा असावधानी या दैवीय विपदा से द्दन हानि होगी। वाणी की कठोरता से लोगों से सम्बन्ध कटु होंगे।
    कुम्भ राशि वालों को जन्मस्थ केतु श्रम संघर्ष की शक्ति देकर सफल जीवन का मार्ग प्रशस्त करेगा। धनाभाव, स्वजनां से आन्तरिक पीड़ा, प्रशासनिक अवरोध-विरोध, द्दर्मबल और दैनिक कठिनाइयों से पूर्ण सुरक्षा देगा।
    मीन राशि वालां को द्वादशस्थ केतु अशुभ होगा। इस कारण स्वास्थ्य के प्रति यदा-कदा सचेष्टता आवश्यक होगी। निरर्थक यात्रा करनी पड़ सकती है। विदेश यात्रा का भी योग बनेगा। व्ययाधिक्य, हठवादी प्रवृत्ति बढ़ जायेगी।
सन् 2017 में मकर के केतु का गोचर फल।
17 अगस्त 2017 से सम्वत्सरान्त तक।
    मेष राशि वालों को दशमस्थ केतु शुभ प्रभावी होने से राहु के शुभ प्रभावां में वृद्धि होगी। बुद्धिचातुर्य से ऐसे काम को भी अंजाम दे पायेंगे जिसकी संभावना नकारात्मक होगी।
    वृष राशि वालों को नवम केतु पूज्य है। घर परिवार के दायित्व तो बढ़ेंगे किन्तु उनका सहजता से निर्वाह होगा, वृद्धजनों को तीर्थ यात्रा या विदेश यात्रा करनी पड़ सकती है।
    मिथुन राशि वालों को आठवें केतु कष्टप्रद है, आय में प्रगति, व्यापार में समानता नही रहेगी, क्रोध की अधिकता से जीवन कष्टदायी होगा। परिवार में विघटन की स्थितियाँ बनेगी।
    कर्क राशि वालों को सप्तमस्थ केतु पूज्य है। पारिवारिक मनमुटाव, नित्य जीवन में कुछ कठिनाई अवश्य रहेगी। नौकरी व्यापारिक जीविका की सुरक्षा बनी रहेगी।
    सिंह राशि वालों को छठवें केतु शुभ प्रभावी होने से राहुजनित अशुभ प्रभावां को कम करने में सहायक रहेगा, राजकीय सहायता पा सकेंगे। आमदनी के नये स्त्रोत बनेंगे।
    कन्या राशि वालों को पंचमस्थ केतु पूज्य है। विशेष प्रयत्नां से आर्थिक लाभ मिलेगा। सामाजिक राजनीतिक लोगां को सफलता के अवसर मिलेंगे। प्रियजनां से सहयोग सम्पर्क बढे़गा।
    तुला राशि वालां को चतुर्थ केतु अशुभ है। चालू काम धन्धे में बाधक स्थिति उत्पन्न होगी। शरीर कष्ट, मतिभ्रम, अपव्यय, दुर्घटना आदि की सम्भावना रहेगी।
    वृश्चिक राशि वालों को तृतीयस्थ केतु शुभ प्रभावी होने से राहु-जनित परेशानियाँ कम होंगी, श्रम संघर्ष के बावजूद रोग, ऋण, शत्रु का भय दूर होगा। भूमि वाहनादि का सुख
    धनु राशि वालों को द्वितीयस्थ केतु पूज्य है। धन पक्ष के प्रति सचेष्ट रहें, अन्यथा असावधानी या दैवीय विपदा से द्दन हानि होगी। वाणी की कठोरता से लोगों से सम्बन्ध कटु होंगे।
    मकर राशि वालों को जन्मस्थ केतु श्रम संघर्ष की शक्ति देकर सफल जीवन का मार्ग प्रशस्त करेगा। धनाभाव, स्वजनां से आन्तरिक पीड़ा, प्रशासनिक अवरोध-विरोध, द्दर्मबल और दैनिक कठिनाइयों से पूर्ण सुरक्षा देगा।
    कुम्भ राशि वालां को द्वादशस्थ केतु अशुभ होगा। इस कारण स्वास्थ्य के प्रति यदा-कदा सचेष्टता आवश्यक होगी। निरर्थक यात्रा करनी पड़ सकती है।
    मीन राशि वालों को एकादश केतु शुभ प्रभाव बढ़ाने वाला है। राहु जनित दुष्प्रभावां को कम कर लाभार्जन की स्थिति अनुकूल रहेगी।

संवत 2074 सन 2017-18 में राहु का गोचर फल

राहु का गोचर फल
    श्री शुभ सम्वत् 2072 माघ मास कृष्ण पक्ष पंचमी (उदयकालीन), तदुपरान्त माघ मास कृष्ण पक्ष षष्ठी दिन शुक्रवार अंग्रेजी तारीखानुसार 29 जनवरी 2016 को घं.25 मि. 28 पर राहु का प्रवेश अपनी स्वाभाविक वक्र गति से सिंह राशि में होगा। तात्कालिक चन्द्रमा उस समय हस्त नक्षत्र, कन्या राशि पर स्थित रहेगा।
    इसके बाद श्री शुभ सम्वत् 2074 आश्विन मास कृष्ण पक्ष द्वादशी (उदयकालीन), तदुपरान्त त्रयोदशी दिन रविवार अंग्रेजी तारीखानुसार 17 अगस्त 2017 को घं.29 मि. 30 पर राहु का प्रवेश अपनी स्वाभाविक वक्र गति से कर्क राशि में होगा। तात्कालिक चन्द्रमा उस समय मघा नक्षत्र, सिंह राशि पर स्थित रहेगा।
    सम्वत्सर के अन्त तक राहु कर्क राशि में रहेगा। जिसका पाद व गोचर फल इस प्रकार है। 
सन् 2017 में सिंह के राहु का पाद बोधक फल।
01 जनवरी 2017 से 17 अगस्त 2017 तक।
मेष-कन्या-वृश्चिक राशि वालों को स्वर्ण पाद से व्यापार व नौकरी में बढ़ोत्तरी, पर पारिवारिक माहौल असंतुलित रहेगा। मान सम्मान व प्रतिष्ठा में कमी आयेगी, व्यर्थ भ्रमण।
वृष-सिंह-मकर राशि वालों को रजत पाद होने से सफलता मिलेगी, प्रत्येक क्षेत्र में किये प्रयास सफल होंगे, आय के नये स्त्रोत, इष्ट मित्रों का सहयोग, व्यापार में बढ़ोत्तरी होगी।
मिथुन-तुला-कुम्भ राशि वालों को लौह पाद होने से जीवन त्रस्त हो जायेगा, सामाजिक प्रतिष्ठा में कमी, मान-सम्मान व प्रतिष्ठा में कमी, आर्थिक हानि, परिवार में तनाव।
कर्क-मीन-धनु राशि वालों को ताम्रपाद से आगमन, शुभप्रद है प्रगति, लक्ष्मी प्राप्ति, वैभव, सुख-सम्पदा, प्रगति रोजगार आदि में सफल, धर्म-कर्म, सामाजिक कार्य में रूचि।
सन् 2017 में सिंह के राहु का गोचर फल।
01 जनवरी 2017 से 17 अगस्त 2017 तक।
    मेष राशि वालों के लिये पंचम राहु पूज्य है। चित्त अशान्त रहेगा। श्रम से किये हुये कार्य की भी सफलता संदिग्द्द रहेगी, किन्तु राशि गत प्रभाव के कारण अवरोधां को दूर करने के प्रति सचेष्ट रहेंगे।
    वृष राशि वालों को चौथा राहु अशुभ है। कार्य की प्रगति में बाधा पहुँचेगी, अप्रत्याशित स्थितियां के कारण नौकरी-व्यापार में प्रतिकूल स्थितियां उत्पन्न हांगी।
    मिथुन राशि वालों को तीसरे राहु शुभ प्रभावी है, मन की बेचैनी दूर होगी। बिगड़ा काम बनेगा, नौकरी-व्यापार में सफलता की ओर अग्रसर होंगे। आर्थिक पक्ष मजबूत करता है।
    कर्क राशि वालां को दूसरे राहु पूज्य है, इसलिये इस राशि वाले जातक को राहु स्वास्थ्य की दृष्टि से प्रतिकूल रहेगा। मानसिक उलझनों में वृद्धि होगी, दुष्टजनां से परेशानी होगी।
    सिंह राशि वालों को जन्मस्थ राहु पूज्य है। दैनिक कामकाज अधिक परिश्रम से आंशिक रूप से ही पूरे होंगे। अव्यवस्थित दिनचर्या रहेगी। दौड़-धूप निरर्थक साबित हांगे।
    कन्या राशि वालों को द्वादश राहु अशुभ है। शारीरिक, बौद्धिक, मानसिक कष्ट बढ़ेगा। यात्रा में असफलता तो मिलेगी किन्तु कभी-कदा अनुकूल स्थितियाँ भी बनेगी।
    तुला राशि वालों को एकादश राहु शुभ है। दैनिक कामकाज उन्नति पर होगा। कार्य व्यवसाय का विस्तार, मान सम्मान पद प्रतिष्ठा की वृद्धि, भूमि-क्रय, एवं वाहनादि सौख्य की वृद्धि, उच्चवर्गीय लोगां को विदेश यात्रा भी करनी पड़ सकती है।
    वृश्चिक राशि वालां को दशमस्थ राहु शुभ है। सामयिक कार्यो में सफलता, धर्म-अध्यात्म के प्रति निष्ठा, आस्था में वृद्धि, सामाजिक विकास होगा। छात्रां को अपेक्षित सफलता मिलेगी।
    धनु राशि वालों को नवम राहु पूज्य है। पारिवारिक विरोध, भाग्योदय में रूकावटें, हानि लाभ की समानता, खर्च में वृद्धि होगी, श्रेष्ठजनों की संगति प्रभावपूर्ण साबित होगी।
    मकर राशि वालों को अष्टमस्थ राहु अशुभ है। समस्याआें की जटिलताएं बढ़ जाएंगी। शारीरिक स्वास्थ्य अनुकूल नहीं रहेगा। उत्साह-हीनता बढ़ जाने से कार्यों में सफलता संदिग्ध रहेगी।
    कुम्भ राशि वालों को सातवें राहु पूज्य है। आवश्यक कामों में श्रम से सफलता मिलेगी। नौकरी व्यापार आदि जीविका की सुरक्षा, पारिवारिक दायित्वों का निर्वाह।
    मीन राशि वालों को छठवें राहु शुभ है। अधूरे संकल्प पूरे हांगे। आरोग्य सुख उत्तम रहेगा। शारीरिक क्षमता में वृद्धि, साहस के कामां में सफलता दिलाकर सभी अरिष्टों को दूर करेगा।
सन् 2017 में कर्क के राहु का पाद बोधक फल।
17 अगस्त 2017 से सम्वत्सरान्त तक।
मेष-कन्या-धनु राशि वालों को ताम्रपाद से आगमन, शुभप्रद है प्रगति, लक्ष्मी प्राप्ति, वैभव, सुख-सम्पदा, प्रगति रोजगार आदि में सफल, धर्म-कर्म, सामाजिक कार्य में रूचि।
वृष-तुला-कुम्भ राशि वालों को रजत पाद होने से सफलता मिलेगी, प्रत्येक क्षेत्र में किये प्रयास सफल होंगे, आय के नये स्त्रोत, इष्ट मित्रों का सहयोग, व्यापार में बढ़ोत्तरी होगी।
मिथुन-सिंह-मकर राशि वालों को स्वर्ण पाद से व्यापार व नौकरी में बढ़ोत्तरी, पर पारिवारिक माहौल असंतुलित रहेगा। मान सम्मान व प्रतिष्ठा में कमी आयेगी, व्यर्थ भ्रमण।
कर्क-वृश्चिक-मीन राशि वालों को लौह पाद होने से जीवन त्रस्त हो जायेगा, सामाजिक प्रतिष्ठा में कमी, मान-सम्मान व प्रतिष्ठा में कमी, आर्थिक हानि, परिवार में तनाव।
सन् 2017 में कर्क के राहु का गोचर फल।
17 अगस्त 2017 से सम्वत्सरान्त तक।
    मेष राशि वालों को चौथा राहु अशुभ है। कार्य की प्रगति में बाधा पहुँचेगी, अप्रत्याशित स्थितियां के कारण नौकरी-व्यापार में प्रतिकूल स्थितियां उत्पन्न हांगी।
    वृष् राशि वालों को तीसरे राहु शुभ प्रभावी है, मन की बेचैनी दूर होगी। बिगड़ा काम बनेगा, नौकरी-व्यापार में सफलता की ओर अग्रसर होंगे। आर्थिक पक्ष मजबूत करता है।
    मिथुन राशि वालां को दूसरे राहु पूज्य है, इसलिये इस राशि वाले जातक को राहु स्वास्थ्य की दृष्टि से प्रतिकूल रहेगा। मानसिक उलझनों में वृद्धि होगी, दुष्टजनां से परेशानी होगी।
    कर्क राशि वालों को जन्मस्थ राहु पूज्य है। दैनिक कामकाज अधिक परिश्रम से आंशिक रूप से ही पूरे होंगे। अव्यवस्थित दिनचर्या रहेगी। दौड़-धूप निरर्थक साबित हांगे।
    सिंह राशि वालों को द्वादश राहु अशुभ है। शारीरिक, बौद्धिक, मानसिक कष्ट बढ़ेगा। यात्रा में असफलता तो मिलेगी किन्तु कभी-कदा अनुकूल स्थितियाँ भी बनेगी।
    कन्या राशि वालों को एकादश राहु शुभ है। दैनिक कामकाज उन्नति पर होगा। कार्य व्यवसाय का विस्तार, मान सम्मान पद प्रतिष्ठा की वृद्धि, भूमि-क्रय, एवं वाहनादि सौख्य की वृद्धि, उच्चवर्गीय लोगां को विदेश यात्रा भी करनी पड़ सकती है।
    तुला राशि वालां को दशमस्थ राहु शुभ है। सामयिक कार्यो में सफलता, धर्म-अध्यात्म के प्रति निष्ठा, आस्था में वृद्धि, सामाजिक विकास होगा। छात्रां को अपेक्षित सफलता मिलेगी।
    वृश्चिक राशि वालों को नवम राहु पूज्य है। पारिवारिक विरोध, भाग्योदय में रूकावटें, हानि लाभ की समानता, खर्च में वृद्धि होगी, श्रेष्ठजनों की संगति प्रभावपूर्ण साबित होगी।
    धनु राशि वालों को अष्टमस्थ राहु अशुभ है। समस्याआें की जटिलताएं बढ़ जाएंगी। शारीरिक स्वास्थ्य अनुकूल नहीं रहेगा। उत्साह-हीनता बढ़ जाने से कार्यों में सफलता संदिग्ध रहेगी।
    मकर राशि वालों को सातवें राहु पूज्य है। आवश्यक कामों में श्रम से सफलता मिलेगी। नौकरी व्यापार आदि जीविका की सुरक्षा, पारिवारिक दायित्वों का निर्वाह।
    कुम्भ राशि वालों को छठवें राहु शुभ है। अधूरे संकल्प पूरे हांगे। आरोग्य सुख उत्तम रहेगा। शारीरिक क्षमता में वृद्धि, साहस के कामां में सफलता दिलाकर सभी अरिष्टों को दूर करेगा।
    मीन राशि वालों के लिये पंचम राहु पूज्य है। चित्त अशान्त रहेगा। श्रम से किये हुये कार्य की भी सफलता संदिग्ध रहेगी, किन्तु राशि गत प्रभाव के कारण अवरोधां को दूर करने के प्रति सचेष्ट रहेंगे।

संवत 2074 सन 2017-18 में गुरू का गोचर फल

                श्री शुभ सम्वत् 2073, श्रावण मास शुक्ल पक्ष उदयकालीन तिथि अष्टमी, तत्पश्चात् नवमी गुरूवार अंग्रेजी तारीखानुसार 11 अगस्त 2016 को घं.21 मि.26 पर गुरू देव कन्या राशि में प्रवेश कर चुके है, तात्कालिक चन्द्र उस समय अनुराधा नक्षत्र एवं वृश्चिक राशि में स्थित था। वर्ष 2017 के प्रारम्भ में गुरूदेव कन्या राशि में ही रहेंगे।
    श्री शुभ सम्वत् 2074, आश्विन मास कृष्ण पक्ष उदयकालीन तिथि सप्तमी, तत्पश्चात् अष्टमी मंगलवार अंग्रेजी तारीखानुसार 12 सितम्बर 2017 को घं.28 मि.10 पर गुरू देव तुला राशि में प्रवेश करेंगे, तात्कालिक चन्द्र उस समय रोहिणी नक्षत्र एवं वृष राशि में स्थित रहेगा। सम्वम्सरान्त तक गुरूदेव कन्या राशि में ही रहेंगे। 
    अंग्रेजी तारीखानुसार 06 फरवरी 2017 सोमवार को घं.22 मि.04 से गुरूदेव कन्या राशि में वक्री होंगे, तत्पश्चात् ता.09 जून 2017 दिन शुक्रवार को घं.29 मि.21 पर गुरू देव मार्गी हो जाएंगे, और 09 मार्च 2018 तक मार्गी ही रहेंगे, तत्पश्चात् 09 मार्च 2018 से पुनः गुरूदेव घं.20 मि.04 पर वक्री होंगे। जिसका पाद एवं गोचर फल इस प्रकार है। विशेष तथ्य यह है कि वक्री गुरू की अवधि में विपरीत फल समझें अर्थात् शुभ स्थान पर अशुभ व अशुभ की जगह शुभ फल मानें।
सन् 2017 में कन्या राशि के गुरू का पाद बोधक फल
01 जनवरी 2017 से 12 सितम्बर 2017 तक।
    मेष-सिंह-धनु राशि वालों को लौह पाद होने से जीवन त्रस्त हो जायेगा, सामाजिक प्रतिष्ठा में कमी, मान-सम्मान व प्रतिष्ठा में कमी, आर्थिक हानि, परिवार में तनाव।
वृष-कन्या-कुम्भ राशि वालों को ताम्रपाद से आगमन, शुभप्रद है प्रगति, लक्ष्मी प्राप्ति, वैभव, सुख-सम्पदा, प्रगति रोजगार आदि में सफल, धर्म-कर्म, सामाजिक कार्य में रूचि लेंगे।
मिथुन-वृश्चिक-मकर राशि वालों को स्वर्ण पाद से व्यापार व नौकरी में बढ़ोत्तरी, पर पारिवारिक माहौल असंतुलित रहेगा। मान सम्मान व प्रतिष्ठा में कमी आयेगी, व्यर्थ भ्रमण।
कर्क-तुला-मीन राशि वालों को रजत पाद होने से सफलता मिलेगी, प्रत्येक क्षेत्र में किये प्रयास सफल होंगे, आय के नये स्त्रोत, इष्ट मित्रों का सहयोग, व्यापार में बढ़ोत्तरी होगी।
सन् 2017 में कन्या राशि के लिए गुरू का गोचर फल
01 जनवरी 2017 से 12 सितम्बर 2017 तक।
    मेष राशि वालां के लिये छठवें गुरू पूज्य है यह परेशानियां को बढ़ाने में सहायक होगा। कार्यो में आकस्मिक व्यवधान, स्वास्थ्य बाधा, मानसिक चिन्ता व्यग्रता रहेगी।
    वृष राशि वालां के लिये पंचमस्थ गुरू शुभ है यह श्रेष्ठ प्रभाव उत्पन्न करेगा, परन्तु अनुकूल परिणाम पाने के लिये विशेष प्रयास भी करना पड़ेगा। श्रम संघर्ष से अभीष्ट सिद्धि, आर्थिक अभ्युन्नति, मुकदमा-परीक्षा प्रतियोगिता में अनुकूल अवसर मिलेंगे।
    मिथुन राशि वालां के लिये चतुर्थ गुरू अशुभ है अतः सुख-सौभाग्य में कमी होने के साथ ही आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहेगा, आपका प्रयास-परिश्रम ही परेशानियां को कम करेगा। आर्थिक लेन देन के प्रति सचेष्ट रहें। स्वजन कुटुम्बियां से विघ्न बाधा, मित्रों से तनाव की स्थिति बनेगी। 
    कर्क राशि वालां के लिये तृतीय भाव में गुरू पूज्य है। विशेष प्रयास करना होगा। आर्थिक दृष्टि से गुरू अभ्युन्नति की ओर ले जायेगा। स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। मान सम्मान पद प्रतिष्ठा धन ऐश्वर्य की वृद्धि होगी। आत्मबल मनोबल की वृद्धि होगी।
    सिंह राशि वालां को द्वितीयस्थ गुरू ज्यादा अच्छा नहीं है। यह दुख कलह विवाद करायेगा। कार्यक्षेत्र में उन्नति एवं सफलता तथा अभीष्ट सिद्धि कठिन संघर्ष से ही प्राप्त होगी। आजीविका विहीन लोगों को स्थिर व्यवसाय की प्राप्ति होगी।
    कन्या राशि वालों को जन्मस्थ गुरू पूज्य हैं यह भाग्यवृद्धि में सहायक होगा। शारीरिक स्वास्थ्य के प्रति सावधानी बरतनी चाहिये। कर्तव्यनिष्ठ जीवन शैली के कारण सुख सौभाग्य, द्दन-ऐश्वर्य की वृद्धि होगी। पारिवारिक दायित्व का निर्वाह होगा।
    तुला राशि वालों को लिये बारहवें गुरू नेष्ट है अतः स्वास्थ्य कमजोर रहेगा। सहयोगीजनां से वैमनस्य बढे़गा। सामाजिक राजनीतिक क्षेत्र से जुड़े व्यक्तियां की समस्याआें का सहज समाद्दान नहीं हो पायेगा। धन-व्यय की अधिकता रहेगी।
    वृश्चिक राशि वालां के लिये ग्यारहवें गुरू शुभ और सर्वसिद्धिकारक रहेगा। सामायिक समस्याओं का समाधान अपनी इच्छा के अनुरूप होगा। आर्थिक पक्ष मजबूत होगा। नये निवेश या उद्यमों के प्रति आकर्षण ही नहीं बढे़गा।
    धनु राशि वालां के लिये दशमस्थ गुरू पूज्य है यह कठोर श्रम संघर्ष परेशानियों उलझनों को बढ़ाने वाला ही साबित होगा, अनावश्यक परिवर्तन से हानि, मानसिक चिन्ता में वृद्धि विरोध पक्ष के कारण कार्यो में गतिरोध, व्ययाधिक्य रहेगा।
    मकर राशि वालों के लिये भाग्यस्थ गुरू शुभ फलप्रद है। गुरू का आगमन आपको श्रेष्ठ स्थिति की ओर ले जाने वाला साबित होगा। आयु आरोग्य सुख की वृद्धि अभीष्ट कामों में सफलता, संतानपक्ष से सुखद अनुभूति। धन-ऐश्वर्य की वृद्धि।
    कुम्भ राशि वालां के लिये अष्टम भाव में गुरू नेष्ट माना गया है किन्तु कठिनाईयां में भी आशा की किरण दिखलाई पड़ेगी। मानसिक अशान्ति, मतिभ्रम, चित्त की अस्थिरता से परेशानी होगी। आर्थिक क्षेत्र में असंतुलन बढे़गा।
    मीन राशि वालों के लिये सातवें गुरू शुभ है। यह श्रेष्ठ प्रभाव उत्पन्न करेगा। कार्य व्यापार की सफलता के लिये विशेष सार्थक प्रयास करना होगा। विचारां में सहिष्णुता परोपकार की भावना का उदय होगा। आर्थिक दृष्टि से गुरू सफलतादायी है।
सन् 2017 में तुला राशि के गुरू का पाद बोधक फल
12 सितम्बर 2017 से सम्वत्सरान्त तक।
    मेष-कन्या-मकर राशि वालों को रजत पाद होने से सफलता मिलेगी, प्रत्येक क्षेत्र में किये प्रयास सफल होंगे, आय के नये स्त्रोत, इष्ट मित्रों का सहयोग, व्यापार में बढ़ोत्तरी होगी।        
वृष-कर्क-धनु राशि वालों को स्वर्ण पाद से व्यापार व नौकरी में बढ़ोत्तरी, पर पारिवारिक माहौल असंतुलित रहेगा। मान सम्मान व प्रतिष्ठा में कमी आयेगी, व्यर्थ भ्रमण भी करना पड़ेगा।
मिथुन-तुला-कुम्भ राशि वालों को लौह पाद होने से जीवन त्रस्त हो जायेगा, सामाजिक प्रतिष्ठा में कमी, मान-सम्मान व प्रतिष्ठा में कमी, आर्थिक हानि, परिवार में तनाव, अशान्ति। 
    सिंह-वृश्चिक-कुम्भ राशि वालों को ताम्रपाद से आगमन, शुभप्रद है प्रगति, लक्ष्मी प्राप्ति, वैभव, सुख-सम्पदा, प्रगति रोजगार आदि में सफल, धर्म-कर्म, सामाजिक कार्य में रूचि लेंगे।
सन् 2017 में तुला राशि के गुरू का गोचर फल
12 सितम्बर 2017 से सम्वत्सरान्त तक।
    मेष राशि वालों के लिये सातवें गुरू शुभ है। यह श्रेष्ठ प्रभाव उत्पन्न करेगा। कार्य व्यापार की सफलता के लिये विशेष सार्थक प्रयास करना होगा। विचारां में सहिष्णुता परोपकार की भावना का उदय होगा। आर्थिक दृष्टि से गुरू सफलतादायी है।
    वृष राशि वालां के लिये छठवें गुरू पूज्य है यह परेशानियां को बढ़ाने में सहायक होगा। कार्यो में आकस्मिक व्यवधान, स्वास्थ्य बाधा, मानसिक चिन्ता व्यग्रता रहेगी।   
    मिथुन राशि वालां के लिये पंचमस्थ गुरू शुभ है यह श्रेष्ठ प्रभाव उत्पन्न करेगा, परन्तु अनुकूल परिणाम पाने के लिये विशेष प्रयास भी करना पड़ेगा। श्रम संघर्ष से अभीष्ट सिद्धि, आर्थिक अभ्युन्नति, मुकदमा-परीक्षा प्रतियोगिता में सफलता के अनुकूल अवसर मिलेंगे। एकाधिक स्त्रोतो से आमदनी होगी।    
    कर्क राशि वालां के लिये चतुर्थ गुरू अशुभ है अतः सुख-सौभाग्य में कमी होने के साथ ही आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहेगा, आपका प्रयास-परिश्रम ही परेशानियां को कम करेगा। आर्थिक लेन देन के प्रति सचेष्ट रहें। स्वजन कुटुम्बियां से विघ्न बाधा, मित्रों से तनाव की स्थिति बनेगी। 
    सिंह राशि वालां के लिये तृतीय भाव में गुरू पूज्य है। विशेष प्रयास करना होगा। आर्थिक दृष्टि से गुरू अभ्युन्नति की ओर ले जायेगा। स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। मान सम्मान पद प्रतिष्ठा धन ऐश्वर्य की वृद्धि होगी। आत्मबल मनोबल की वृद्धि होगी।
    कन्या राशि वालों  को द्वितीयस्थ गुरू ज्यादा अच्छा नहीं है। यह दुख कलह विवाद करायेगा। कार्यक्षेत्र में उन्नति एवं सफलता तथा अभीष्ट सिद्धि कठिन संघर्ष से ही प्राप्त होगी।
    तुला राशि वालों को जन्मस्थ गुरू पूज्य हैं यह भाग्यवृद्धि में सहायक होगा। शारीरिक स्वास्थ्य के प्रति सावधानी बरतनी चाहिये। कर्तव्यनिष्ठ जीवन शैली के कारण सुख सौभाग्य, द्दन-ऐश्वर्य की वृद्धि होगी। पारिवारिक दायित्व का निर्वाह होगा।
    वृश्चिक राशि वालों को लिये बारहवें गुरू नेष्ट है अतः स्वास्थ्य कमजोर रहेगा। सहयोगीजनां से वैमनस्य बढे़गा। सामाजिक राजनीतिक क्षेत्र से जुड़े व्यक्तियां की समस्याआें का सहज समाद्दान नहीं हो पायेगा। धन-व्यय की अधिकता रहेगी।
    धनु राशि वालां के लिये ग्यारहवें गुरू शुभ और सर्वसिद्धिकारक रहेगा। सामायिक समस्याओं का समाधान अपनी इच्छा के अनुरूप होगा। आर्थिक पक्ष मजबूत होगा। नये निवेश या उद्यमों के प्रति आकर्षण ही नहीं बढे़गा, अपितु अपेक्षित सफलता भी मिलेगी। नौकरी में पदोन्नति।
    मकर राशि वालां के लिये दशमस्थ गुरू पूज्य है यह कठोर श्रम संघर्ष परेशानियों उलझनों को बढ़ाने वाला ही साबित होगा, अनावश्यक परिवर्तन से हानि, मानसिक चिन्ता में वृद्धि विरोध पक्ष के कारण कार्यो में गतिरोध, व्ययाधिक्य रहेगा।
    कुम्भ राशि वालों के लिये भाग्यस्थ गुरू शुभ फलप्रद है। गुरू का आगमन आपको श्रेष्ठ स्थिति की ओर ले जाने वाला साबित होगा। आयु आरोग्य सुख की वृद्धि अभीष्ट कामों में सफलता, संतानपक्ष से सुखद अनुभूति। धन-ऐश्वर्य की वृद्धि।
    मीन राशि वालां के लिये अष्टम भाव में गुरू नेष्ट माना गया है किन्तु कठिनाईयां में भी आशा की किरण दिखलाई पड़ेगी। मानसिक अशान्ति, मतिभ्रम, चित्त की अस्थिरता से परेशानी होगी। आर्थिक क्षेत्र में असंतुलन बढे़गा।

Wednesday, February 8, 2017

सम्वत् 2074 सन् 2017/18 में शनि का गोचर विचार

शनि का गोचर फल
    श्री शुभ सम्वत् 2073, कार्तिक शुक्ल पक्ष उदया तिथि दशमी, तदुपरान्त एकादशी तदनुसार अंग्रेजी तारीखानुसार 2 नवम्बर 2014 दिन रविवार को घं.20 मि.52 पर शनि देव का प्रवेश वृश्चिक राशि में हो चुका है। उस समय तात्कालिक चन्द्रमा शतभिषा नक्षत्र एवं कुम्भ राशि पर स्थित था।
    वर्ष 2017 की शुरूआत में शनि देव अपनी  मार्गी गति से वृश्चिक राशि पर भ्रमण करते हुए प्रवेश करेंगे। श्री शुभ सम्वत् 2073 माघ मास कृष्ण पक्ष चतुर्दशी गुरूवार तदनुसार अंग्रेजी तारीखानुसार ता. 26 जनवरी 2017 को घं.19 मि.29 पर शनि देव मार्गी गति से धनु राशि में प्रवेश करेंगे, उस समय तात्कालिक चन्द्रमा पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र एवं धनु राशि पर स्थित रहेगा। श्री शुभ सम्वत् 2074 चैत्र मास शुक्ल पक्ष उदया तिथि दशमी तात्कालिक तिथि एकादशी गुरूवार तदनुसार अंग्रेजी तारीखानुसार 06 अप्रैल 2017 को शनि देव घं.21 मि.46 पर वक्री होंगे, तत्पश्चात् श्री शुभ सम्वत् 2074 आषाढ़ मास कृष्ण पक्ष उदया तिथि द्वादशी, तात्कालिक तिथि त्रयोदशी मंगलवार तदनुसार अंग्रेजी तारीखानुसार ता. 20 जून 2017 को घं.28 मि.46 पर शनि देव वक्री गति से वृश्चिक राशि में पुनः प्रवेश करेंगे, उस समय तात्कालिक चन्द्रमा भरणी नक्षत्र एवं मेष राशि पर स्थित रहेगा, तत्पश्चात् श्री शुभ सम्वत् 2074 कार्तिक मास शुक्ल पक्ष उदया तिथि षष्ठी, तात्कालिक तिथि सप्तमी गुरूवार तदनुसार अंग्रेजी तारीखानुसार ता. 26 अक्टूबर 2017 को घं.19 मि.39 पर शनि देव मार्गी गति से पुनः धनु राशि में प्रवेश करेंगे, उस समय तात्कालिक चन्द्रमा पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र एवं धनु राशि पर स्थित रहेगा, सम्वत्सरान्त तक शनिदेव धनु राशि पर ही स्थित रहेंगे।
    विशेष तथ्य यह है कि वक्री शनि की अवधि में विपरीत फल समझें अर्थात् शुभ स्थान पर अशुभ व अशुभ की जगह शुभ फल मानें। शनि का पादबोधक एवं गोचर फल इसप्रकार है।
सन् 2017 में वृश्चिक के शनि का पाद बोधक फल
(वर्ष के प्रारम्भ से अन्त तक)

संक्षिप्त में मेष-कन्या-कुम्भ राशि वालों के लिए स्वर्णपाद से शनि का आगमन कुछ कष्टप्रद रहेगा, यश-प्रतिष्ठा में कमी प्रियजन या पारिवारिक जन का विछोह।
वृष-सिंह-धनु राशि वालों को ताम्रपाद से शनि का आगमन आर्थिक व्यावसायिक क्षेत्र में प्रगति, पूर्व निर्द्दारित कार्यों में सफलता, भौतिक सुख साधनों में वृद्धिकारक है।
मिथुन-तुला-मकर राशि वालों के लिये रजतपाद से शनि का आगमन किसी नये कार्य का शुभारम्भ आजीविका के साधनों में वृद्धि पारिवारिक सुख शांति, जन-सम्पर्क बढ़ेगा।
कर्क-वृश्चिक-मीन राशि वालों को लौहपाद से शनि का आगमन संघर्षपूर्ण होगा। आजीविका के लिए श्रम-संघर्ष, पारिवारिक तनाव, परिश्रम से ही स्थितियाँ अनुकूल हो सकती हैं।
वृश्चिक राशिस्थ शनि का गोचर फल
    ( 01 जनवरी 2017 से 26 जनवरी 2017 तक एवं 20 जून 2017 से 26 अक्टूबर 2017 तक )       
    मेष राशि वालों को- अष्टम शनि अशुभ है। कष्ट वाद-विवाद व कलह की स्थिति बनी रहेगी। राजकीय पक्ष से विरोध का सामना करना पड़ेगा। स्त्री को कष्ट, स्वास्थ्य में कमी गड़बड़ी एवं अत्यन्त अशुभ दशा वालों को पत्नी का वियोग भी सहना पड़ेगा। स्त्रियों को उदर विकार से भी कष्ट होगा।
    वृष राशि वालों को- सप्तम शनि पूज्य है। आर्थिक समस्याओं से छुटकारा, रूके हुये धन की प्राप्ति और आय में वृद्धि होगी, लेकिन दुख और कलह से चित्त अशान्त रहेगा।
    मिथुन राशि वालों को- छठा शनि शुभ है। यश कीर्ति तथा कार्य में लाभ एवं सफलता मिलेगी। रोगों से छुटकारा मिलेगा, एवं स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। अनेक तरह के उत्तम भोगों की प्राप्ति होगी। शत्रु पक्ष निर्बल होकर परास्त होगा।
    कर्क राशि वालों के लिए - पाँचवा शनि पूज्य है। परिश्रम एवं संघर्ष से ही कार्य में सफलता संभव है। कुसंगति से बुद्धि विवेक नष्ट होगा। धर्म पत्नी से सम्बन्ध तनाव की स्थिति तक जा सकते हैं आर्थिक पक्ष कमजोर होकर अशुभ दशा वालों के लिए चिंतनीय भी हो सकता है।
     सिंह राशि वालों को - चतुर्थ शनि अशुभ है। दुख एवं कलह विवाद की स्थिति बनायेगा। सामाजिक एवं राजकीय पक्ष से असहयोग एवं विरोद्द प्राप्त होगा। आर्थिक अभाव प्रबल रूप ले सकता है। नौकरी पेशा वालों को स्थान परिवर्तन संभव है।
    कन्या राशि वालों को-  तीसरा शनि श्रेष्ठ है, लेकिन श्रम संघर्ष की स्थिति बनी रहेगी। कभी-कभी चिंता व्यय की अधिकता और असफलता से कष्ट मिलेगा। ससुराल पक्ष से तनाव, पत्नी से वाद-विवाद कलह व पिता से असंतोष मिलेगा।
    तुला राशि वालों को - इस राशि वालांं को द्वितीय शनि पूज्य है। यह साढ़ेसाती की अन्तिम ढैय्या है, इसमें स्थान परिवर्तन की बहुत अधिक संभावना है। 
    वृश्चिक राशि वालों को -जन्मस्थ शनि पूज्य है, साढ़ेसाती की बीच की ढय्या है। शनि का रजत पाद कष्टप्रद है। अतः सुख-दुख समान रूप से चलते रहेंगे। मानसिक शक्ति कमजोर होगी। जीवन साथी व अपने घनिष्ठ कुटुम्बियों से विवाद होगा।
     धनु राशि वालों को- द्वादश शनि अशुभ है। विघ्न तथा कष्ट बने रहेंगे। अशुभ दशा वालों को संतान के प्रति विशेष चिंता रहेगी। संतान पक्ष को व्याधियों से कष्ट होगा। 
     मकर राशि वालों को - एकादश शनि शुभ है। लम्बी बीमारी से ग्रस्त लोगों को स्वास्थ्य लाभ होगा। नये पद एवं अधिकार में वृद्धि होगी। पत्नी पक्ष से सहयोग मिलेगा व धन की प्राप्ति भी होगी। स्त्री एवं संतान का सुख प्राप्त होगा।
     कुम्भ राशि वालों का - दशम शनि शुभ है। श्रम व संघर्ष की स्थिति बनी रहेगी पर समय -समय पर धन की प्राप्ति होती रहेगी। आर्थिक सफलता होते हुए भी सम्पत्ति क्षय का भी भय बना रहेगा। व्यक्तित्व आत्मनिर्भर होगा।
    मीन राशि वालों को - नवम शनि पूज्य है। अपने से छोटे लोगों के अवज्ञा करने से चित्त अशान्त होगा। मान सम्मान में कमी होगी। तीर्थाटन निष्प्रयोजन होने से असंतोष एवं धर्म के प्रति अनास्था होगी।
सन् 2017 में धनु के शनि का पाद बोधक फल (27 जनवरी 2017 से 19 जून 2017 तक एवं 27 अक्टूबर 2017 से सम्वत्सरान्त तक)
संक्षिप्त में मेष-सिंह-वृश्चिक राशि वालों के लिये रजतपाद से शनि का आगमन किसी नये कार्य का शुभारम्भ आजीविका के साधनों में वृद्धि पारिवारिक सुख शांति, जन-सम्पर्क बढ़ेगा।
वृष-कन्या-मकर राशि वालों को लौहपाद से शनि का आगमन संघर्षपूर्ण होगा। आजीविका के लिए श्रम-संघर्ष, पारिवारिक तनाव, परिश्रम से ही स्थितियाँ अनुकूल हो सकती हैं।
मिथुन-तुला-मीन राशि वालों को ताम्रपाद से शनि का आगमन आर्थिक व्यावसायिक क्षेत्र में प्रगति, पूर्व निर्द्दारित कार्यों में सफलता, भौतिक सुख साधनों में वृद्धिकारक है।
कर्क-धनु-कुम्भ राशि वालों के लिए स्वर्णपाद से शनि का आगमन कुछ कष्टप्रद रहेगा, यश-प्रतिष्ठा में कमी प्रियजन या पारिवारिक जन का विछोह।
धनु राशिस्थ शनि का गोचर फल
         ( 27 जनवरी 2017 से 19 जून 2017 तक एवं 27 अक्टूबर 2017 से सम्वत्सरान्त तक )            
मेष राशि वालों को - नवम शनि पूज्य है। अपने से छोटे लोगों के अवज्ञा करने से चित्त अशान्त होगा। मान सम्मान में कमी होगी। तीर्थाटन निष्प्रयोजन होने से असंतोष एवं धर्म के प्रति अनास्था होगी। कलह एवं व्याधियों से जीवन दुखी होगा।
    वृष राशि वालों को- अष्टम शनि अशुभ है। कष्ट वाद-विवाद व कलह की स्थिति बनी रहेगी। राजकीय पक्ष से विरोध का सामना करना पड़ेगा। स्त्री को कष्ट, स्वास्थ्य में कमी गड़बड़ी एवं अत्यन्त अशुभ दशा वालों को पत्नी का वियोग भी सहना पड़ेगा। स्त्रियों को उदर विकार से भी कष्ट होगा।
    मिथुन राशि वालों को- सप्तम शनि पूज्य है। आर्थिक समस्याओं से छुटकारा, रूके हुये धन की प्राप्ति और आय में वृद्धि होगी, लेकिन दुख और कलह से चित्त अशान्त रहेगा।
    कर्क राशि वालों को- छठा शनि शुभ है। यश कीर्ति तथा कार्य में लाभ एवं सफलता मिलेगी। रोगों से छुटकारा मिलेगा, एवं स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। अनेक तरह के उत्तम भोगों की प्राप्ति होगी। शत्रु पक्ष निर्बल होकर परास्त होगा।
    सिंह राशि वालों के लिए - पाँचवा शनि पूज्य है। परिश्रम एवं संघर्ष से ही कार्य में सफलता संभव है। कुसंगति से बुद्धि विवेक नष्ट होगा। धर्म पत्नी से सम्बन्ध तनाव की स्थिति तक जा सकते हैं आर्थिक पक्ष कमजोर होकर अशुभ दशा वालों के लिए चिंतनीय भी हो सकता है।
     कन्या राशि वालों को - चतुर्थ शनि अशुभ है। दुख एवं कलह विवाद की स्थिति बनायेगा। सामाजिक एवं राजकीय पक्ष से असहयोग एवं विरोद्द प्राप्त होगा। आर्थिक अभाव प्रबल रूप ले सकता है। नौकरी पेशा वालों को स्थान परिवर्तन संभव है।
    तुला राशि वालों को-  तीसरा शनि श्रेष्ठ है, लेकिन श्रम संघर्ष की स्थिति बनी रहेगी। कभी-कभी चिंता व्यय की अधिकता और असफलता से कष्ट मिलेगा। ससुराल पक्ष से तनाव, पत्नी से वाद-विवाद कलह व पिता से असंतोष मिलेगा।
    वृश्चिक राशि वालों को - इस राशि वालांं को द्वितीय शनि पूज्य है। यह साढ़ेसाती की अन्तिम ढैय्या है, इसमें स्थान परिवर्तन की बहुत अधिक संभावना है। 
    धनु राशि वालों को -जन्मस्थ शनि पूज्य है, साढ़ेसाती की बीच की ढय्या है। शनि का रजत पाद कष्टप्रद है। अतः सुख-दुख समान रूप से चलते रहेंगे। मानसिक शक्ति कमजोर होगी। जीवन साथी व अपने घनिष्ठ कुटुम्बियों से विवाद होगा।
     मकर राशि वालों को- द्वादश शनि अशुभ है। विघ्न तथा कष्ट बने रहेंगे। अशुभ दशा वालों को संतान के प्रति विशेष चिंता रहेगी। संतान पक्ष को व्याधियों से कष्ट होगा। 
     कुम्भ राशि वालों को - एकादश शनि शुभ है। लम्बी बीमारी से ग्रस्त लोगों को स्वास्थ्य लाभ होगा। नये पद एवं अधिकार में वृद्धि होगी। पत्नी पक्ष से सहयोग मिलेगा व धन की प्राप्ति भी होगी। स्त्री एवं संतान का सुख प्राप्त होगा।
     मीन राशि वालों का - दशम शनि शुभ है। श्रम व संघर्ष की स्थिति बनी रहेगी पर समय -समय पर धन की प्राप्ति होती रहेगी। आर्थिक सफलता होते हुए भी सम्पत्ति क्षय का भी भय बना रहेगा। व्यक्तित्व आत्मनिर्भर होगा।

Monday, January 30, 2017

पंच महापुरूष योग एवं ग्रहों की युतियों का विशेष फल

    ज्योतिष-शास्त्र में योगों का बहुत महत्व बताया गया है, एक कहावत है कि ‘मंदिर में भोग, अस्पताल में रोग और ज्योतिष में योग का अपना एक अलग महत्व है।’
जिस प्रकार से विभिन्न चीजों को आपस में एक विशेष अनुपात में मिलाने से सुस्वादु व्यंजनादि (भोजनादि) तैयार होते हैं, ठीक उसी प्रकार दो या अद्दिक ग्रहों के संयोग से विशेष योग बनता है, जिसका विशेष महत्व जातक के जीवन में पड़ता है। यहाँ पंच महापुरूष योगों एवं ग्रहों की युति से बनने वाले कुछ विशेष योगों पर एक लेख प्रस्तुत कर रही हूँ।
    यदि मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र या शनि अपनी उच्च राशि या मूल त्रिकोण या स्वराशि में स्थित होकर लग्न से केन्द्र (1, 4, 7, 10) में हो तो महापुरूष योग होता है। यदि मंगल उपयुक्त प्रकार से योग करे तो रूचक, बुध करे तो भद्र, बृहस्पति से हंस, शुक्र योगकारक हो, तो मालव्य और शनि अपनी मूल त्रिकोण या उच्च राशि में स्थित केन्द्र में हो तो शश योग होता है। इस में मंत्रेश्वर का कथन है कि, उपयुक्त योग केवल लग्न से केन्द्र में स्वोच्च स्व-राशिस्थ मंगल आदि के होने से तो होता ही है, यदि लग्न से केन्द्र में न हो अपितु चन्द्रमा से केन्द्र में उच्चस्थ स्वराशिस्थ मंगल, बुध आदि पांचों ग्रहों में से केन्द्र में हो तो भी महापुरूष योग होता है। शोध के उपरान्त भी ऐसा फल दिखता है। मानसागरी के मत से मंगल आदि उच्च या स्वराशि में, लग्न से केन्द्र में हो तभी रूचक आदि महापुरूष योग होता है परन्तु यह भी लिखा है कि यदि उपर्युक्त योगकारक (मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र या शनि जो योग बना रहा हो) ग्रह के साथ सूर्य या चन्द्रमा हो तो महापुरूष योग भंग हो जाता है और इस योग का जो विशिष्ट फल लिखा है वह नहीं होता, केवल साधारण अच्छा फल होता है।
केन्द्रोच्चगा यद्यपि भूसुताद्या मार्तण्डशीतांशुयुता भवन्ति।
कुर्वन्ति नोर्वीपतिमात्मपाके यच्छन्ति ते केवल सत्फलानि।।
    सारावली ( त्रिष्कन्ध ज्योतिषाचार्य ब्रह्मलीन पं. सीताराम झा कृत, उल्लेखनीय है कि मेरे पिता जी इनको शुरूआत से ही गुरूवत मानते रहे हैं) अध्याय 24 में पंच महापुरूष योग दिए गए हैं।     बलरहितेन्दुरविभ्यां युक्तैर्भौमादिभिर्ग्रहैर्मिश्राः।
 न भवन्ति महीपाला दशासु तेषां सुतार्थसंयुक्ताः।।
    वराहमिहिर ने भी इन योगों की विवेचना की है। जिसका संकलन मैने किया है।
    अब सर्वप्रथम रूचक योग का फल लिखती हूँ।
रूचक योग (मंगल-जनित)
जातः श्री रूचके बलान्वितवपुः श्रीकीर्तिशीलान्वितः
शास्त्री मन्त्रजपाभिचार कुशलो राजाऽथवा तत्समः।
लावण्यारूणकान्तिकोमलतनुस्त्यागी  जितारिर्धनी
सप्तत्यब्दमितायुषा सह सुखी सेनातुर¯धिपः।
    रूचक योग में उत्पन्न व्यक्ति बलान्वित शरीर, लक्ष्मी (श्री शब्द मूल में आया है इससे शरीर सौष्ठव तथा कान्ति युक्त, यह अर्थ भी लिया जा सकता है), शास्त्री (शास्त्र निष्णात), मंत्रों के जप और अभिचार में कुशल, राजा या राजा के समान, लावण्य युक्त शरीर, लालिमायुक्त, कोमल तन, शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने वाला, त्यागी, धनी 70 वर्ष की आयु प्राप्त करने वाला, सुखी, सेना और घोड़ों का स्वामी होता है।
    अखण्ड साम्राज्य योग- यदि (1) नवमेश, लाभेश, धनेश (द्वितीय नवम या एकादश) के स्वामी में से कोई एक भी ग्रह चन्द्रमा से केन्द्र में हो और स्वयं गुरू (बृहस्पति) ग्यारहवें घर का स्वामी हो, और ऐसे गुरू की एकादश भाव में दृष्टि हो तो ऐसा जातक अखण्ड साम्राज्य का स्वामी होता है। फलदीपिका में जो पाठ है, उसमें तृतीय चरण में ‘स्वयं च के स्थान में ‘स्वपुत्र’ है-जिसका अर्थ हो जायेगा कि ‘यदि बृहस्पति, पंचम या एकादश का स्वामी हो। योग अच्छा है द्वितीयेश, नवमेश या लाभेश चन्द्रमा से केन्द्र में हो तो धनकारक, भाग्यकारक है परन्तु अखण्ड साम्राज्य पतित्व-इस योग का उत्कृष्ट फल केवल अतिशयोक्ति है, क्योंकि यह योग (सम्पूर्ण) मेरे पिता जी की कुण्डली में है, मगर अखण्ड साम्राज्यपतित्व जैसा कुछ दिखता नहीं, हाँ नाम ( सम्पूर्ण हिन्दी भाषी जगत में ) अवश्य प्रसिद्ध है, लेकिन धन के मामले में तो विशेष नहीं कहा जा सकता।
भद्र योग (बुध-जनित)
    इस योग में उत्पन्न मनुष्य का सिंह के समान चेहरा, हाथी के समान गति, पुष्ट जाँघे, उन्नत वक्षस्थल होता है। उसके बाहु लम्बे गोल और पुष्ट होते हैं और उन्हीं के समान उसका मान होता है। मान क्या? यदि मनुष्य दोनों बाहुओं को फैला कर खड़ा हो तो एक हाथ की मध्यमा अंगुलि के अंत से दूसरे हाथ की मध्यमा अंगुलि के अन्त तक जितनी लम्बाई हो उतनी ही यदि जातक की ऊँचाई हो तो मनुष्य बहुत विशिष्ट पदवी प्राप्त करता है।
    स्कन्दपुराण में लिखा है कि कुसुम से रंगे हुए सूत की तीन लड़ करें और गणेशादि का भक्तिपूर्वक स्मरण कर उत्तराभिमुख दोनों भुजा और हाथ फैला कर खड़े हो जाइये, अर्थात् उत्तर की ओर मुख कर खड़े हुए आदमी का दाहिना हाथ पूर्व की ओर,और बायां हाथ पश्चिम की ओर कंधे के समतल फैला हुआ होगा, दाहिने हाथ की मध्यांगुली (बीच की उंगली) के अन्त से बांये हाथ के बीच की उंगली तक नापे यदि यह ऊँचाई के बराबर हो तो ऐसा मनुष्य श्रेष्ठ अधिकारी होता है।
    भद्र योग में उत्पन्न व्यक्ति, मानी, बन्धु जनों के उपकार में निपुण, विपुल प्रज्ञा, यश, धन वाला होता है 80 वर्ष की आयु होती है।
हंस योग (गुरू-जनित)
    जो हंस योग में जन्म ले उसका मुख (ओष्ठ, तालु जिह्ना) लाल, ऊँची नाक, अच्छे चरण, हंस के समान स्वर, कफ प्रधान प्रकृति, गौर वर्ण, सुकुमार (कोमलांगी) पत्नी, कामदेव के समान सुन्दर सुखी, शास्त्र ज्ञान में अति निपुण, साद्दु (उत्तम) कार्य और आचार वाला होता है और 84 वर्ष की आयु होती है। अघरोष्ठ जिह्ना, तालू का लाल होना सुख और सौभाग्य का लक्षण माना जाता है।
मालव्य योग (शुक्र-जनित)
    जिसका मालव्य योग में जन्म हो उसकी स्त्री के समान चेष्टा (हाथ मटकाना, चलना लज्जा आदि), शरीर संद्दियां ललित (मृदु और सुन्दर), सुन्दर आकर्षक नेत्र, सौन्दर्य युक्त शरीर, गुणी (अनेक सद्गुण सम्पन्न), तेजस्वी स्त्री पुत्र वाहन (सवारी से युक्त) धनी, शास्त्रों का अर्थ जानने वाला पण्डित (विद्वान्), उत्साहयुक्त, प्रभुता शक्तिसम्पन्न (औरों को आज्ञा देने वाला अधिकारी), मंत्रवेत्ता, पत्रकार, साहित्यानुरागी, चतुर, त्यागी, पर स्त्रीरत (दूसरे की स्त्रियां में आसक्त) होता है 80 वर्ष तक जीता है।
शश योग (शनि जनित)
    जो इस योग में उत्पन्न हो वह राजा या राजा के समान वन और पर्वतों में रहने या घूमने वाला, सेनापति (अर्थात् उसके अधीन बहुत आदमी हों) क्रूर बुद्धि, धातु (लोहा, पीतल, चांदी सोना) के वाद विवाद में विनोद करने वाला और ठगने वाला (भावार्थ है कि धातु का काम करें और बेईमानी से कमावे), दाता (देने वाला), जिसकी दृष्टि में क्रोद्द हो, तेजस्वी अपनी माता का भक्त, शूर, श्यामवर्ण, सुखी, जार क्रिया (परस्त्री से मैथुन कार्य) स्वभाव वाला होता है और सत्तर वर्ष की आयु होती है। महापुरूष योग समाप्त।
चन्द्रमा के साथ अन्य ग्रहों की युति का फल
    (1) यदि चन्द्रमा और मंगल एक साथ हो तो जातक शूरवीर सत्कुलोचित धर्म पालन करने वाला, धनी और गुणवान होता है। वराहमिहिर के मत से जातक कूट मारणोच्चाटनादि प्रयोग में निष्णात, स्त्री, आसव कुंभ आदि का क्रय-विक्रय (या गिरवी रखना) शील होता है। कूट का अर्थ नीतिपरक भी हो सकता है। माता के लिये यह योग अकल्याणकारी है। सारावली के अनुसार जातक शूर, रण में प्रतापी, मल्ल (युद्ध या कुश्ती करने वाला) मृत्तिका चर्म या धातु के (कूट का अन्य अर्थ) शिल्प में दक्ष होता है कि रक्त रोग के कारण शरीर में वेदना रहती है। पृथुयशस् के अनुसार चन्द्रमा और मंगल लग्न, पंचम नवम, दशम या एकादश में हो तो धनवान् और राजा के समान होता है। यदि यह योग अन्य स्थान में हो तो बन्धुओं के सुख से हीन हो।
    (2) यदि चन्द्रमा और बुध एक साथ हों तो द्दार्मिक, शास्त्रज्ञ और तदनुसार कार्य और व्यवहार करने वाला, अद्भुत गुणों (या अनेक प्रकार के गुणों से) युक्त होता है। वराहमिहिर के अनुसार मीठे वचन बोलने वाला, अर्थनिपुण, सौभाग्यशाली, यशस्वी होता है। सारावली के अनुसार जातक काव्य तथा कथाओं में अति निपुण, द्दनी स्त्री सम्मत (स्त्रियां जिसको पसन्द करें) सुरूप युक्त, हंसमुख (हमारा अनुभव है कि जातक मजाकिया भी होता है) और विशिष्ट गुणों से युक्त होता है।
    (3) यदि चन्द्रमा और बृहस्पति का योग हो तो जातक साद्दुजनावलम्बी और अत्यन्त मतिमान् (मति में वृद्धि, विवेक आदि का समावेश हो जाता है) होता है, वराहमिहिर के अनुसार जातक विक्रान्त, अपने कुल में मुख्य अति स्थिर मति वाला और अत्यन्त धनी होता है। सारावली के अनुसार देवता और ब्राह्मणों की पूजा और सत्कार में रत, शुभशील, दृढ़, मित्रता निभाने वाला, अपने बन्द्दुओं का सम्मान करने वाला और अत्यन्त धनी हो। पृथुयशस् के अनुसार कि जातक, विनीत, स्त्री, पुत्र सहित (अर्थात इनका सुख हो) और धनी होता है किन्तु यह योग लग्न से तृतीय या षष्ठ में हो या चन्द्रमा और बृहस्पति इन दोनों ग्रहों में कोई नीच (यदि यह युति वृश्चिक/मकर में हो) हो तो शुभ नहीं होता है।
    (4) यदि चन्द्रमा और शुक्र का योग हो तो जातक क्रय-विक्रय (खरीद-फरोख्त) में कुशल किन्तु पापात्मा होता है। वराहमिहिर के मत से वस्त्रों के क्रय आदि में कुशल होता है। सारावली के अनुसार क्रय-विक्रय कुशल, अत्यन्त आलसी होता है। पृथुयशस् के अनुसार जातक धनाध्यक्ष होता है और यदि यह योग लग्न से दशम या द्वादश भाव में हो तो विदेश से धन प्राप्ति।
    (5) यदि चन्द्रमा और शनि की युति हो तो जातक कु-स्त्री (जो स्त्री अच्छी न हो) का पुत्र होता है। जातक अपने पिता का दूषक होता है (अपने पिता की निन्दा करता है या अपने आचरण से पिता के कुल को दोष लगाता है) और उसका धन नष्ट हो जाता है, (लेकिन अन्य ग्रहों का योग देखना भी आवश्यक है)। वराहमिहिर के मत से जातक पुनर्भूसुत होता है। जिस स्त्री का द्वितीय बार विवाह हो उसे पुनर्भूसुत कहते हैं। सब जातियों में स्त्री का पुनर्विवाह प्रचलित नहीं है, इस कारण रुद्रभट्ट के अनुसार उसकी माता जारादि से उपभुक्त हो। सारावली के अनुसार जातक (अपने वय से) अधिक वय की स्त्रियों से रमण करता है, हाथी, घोड़ों का पालन करता है या उनको शिक्षा देता है, अब हाथी, घोड़े तो इतने रहे नहीं, इसलिये मोटर, स्कूटर, ट्रक, टैम्पो, इंजन, जहाज, हवाई जहाज, कल कारखानों में मशीन चलाने वाला या उस तत्व से सम्बन्धित व्यवसाय में लगा हुआ यहाँ यह अर्थ लेना होगा)। ऐसा जातक सौशील्यादि गुण रहित, पराजित, धन रहित होता है। दूसरे की मातहती में कार्य करता है। पृथुयशस् के अनुसार जातक दुर्बल देह युक्त अति नीच कार्य करने वाला, मातृद्वेषी (अपनी माता से बैर करने वाला) और बुद्धिहीन होता है किन्तु यदि यह युति लग्न से तृतीय, षष्ठ, दशम या एकादश में हो तो जातक सर्वसम्पन होता है।
केन्द्र में योग
    अब चन्द्रमा यदि किसी ग्रह के साथ केन्द्र में युति करे तो सारावली में जो विशेष फल कहा है, उससे पाठकों को अवगत कराया जाता है।
    (1) यदि चन्द्रमा और मंगल की युति लग्न में हो तो रक्त, अग्नि, और पित्त रोगों से पीड़ित हो। जातक राजा होता है किन्तु उसके स्वभाव में तीक्ष्णता होती है। यदि यह युति लग्न से चतुर्थ में हो तो जातक विकल, क्लेश युक्त, द्रव्यहीन, सुख, सुत धन और बन्धु इनसे हीन होता है। यदि चन्द्र और मंगल सप्तम में हो तो जातक क्षुद्र, दूसरे का धन प्राप्त करने का लोभी, बहुत प्रलाप करने वाला, ईर्ष्या युक्त, मिथ्यावादी हो। दशम में यदि यह युति हो तो हाथी और घोड़ां और सेना से युक्त, सम्पन्न, और विशेष विक्रमशाली होता है।
    (2) यदि चन्द्रमा और बुध लग्न में योग करें तो सुखी, बुद्धिमान् देखने में सुन्दर, अत्यन्त निपुण और वाचाल हो। यदि यह युति चतुर्थ में हो तो जातक सुन्दर, सुवर्ण, अश्व रत्नों का स्वामी हो। उसके बन्धु, मित्र, सुत हों। ऐसा जातक प्रतापी और सुखी हो, यदि यह दोनों ग्रह लग्न से सप्तम में हो तो जातक का ललित शरीर हो। वह सत्कवि (काव्य कला युक्त अथवा बुद्धिमान्) विख्यात् और प्रतापी होता है। ऐसा जातक राजा हो या राजा का विशेष कृपापात्र हो। यदि यह योग दशम में हो जातक मानी, द्दनवान् और अति विख्यात हो। राजा का मंत्री हो किन्तु अपने जीवन के अंत में दुःखी हो, और सम्भव है कि उसके बन्धु उसे छोड़ दें।
    (3) यदि चन्द्रमा और बृहस्पति की युति लग्न में हो तो विस्तृत और उच्च वक्षस्थल युक्त, अच्छे शरीर से युक्त बहुत मित्रों पुत्रों और स्त्रियों वाला (पहिले अनेक पत्नियों का होना या अनेक स्त्रियों का भोग सुख और सौभाग्य का लक्षण माना जाता था), बन्धुओं से युक्त राजा होता है। यदि यह युति लग्न से चतुर्थ में हो तो राजा के समान मंत्री, महावैभवशाली, बहुत शास्त्रों का ज्ञाता निर्मल बुद्धि युक्त, बन्धओं से समन्वित होता है। चन्द्रमा और बृहस्पति की युति यदि सप्तम स्थान में हो तो जातक कला कुशल, व्यापार करने वाला, धनवान् निर्मल, राजा का कृपापात्र या स्वयं राजा अत्यन्त बुद्धिमान् हो। यदि दशम भाव में यह युति हो तो प्रलम्ब बाहु (लम्बे बाहु होना सौभाग्य और अधिकार का सूचक है) ऐसा जातक विद्वान धनी और दानशील होता है और सम्मान तथा कीर्ति पाता है।
    (4) यदि चन्द्रमा और शुक्र की युति लग्न में हो तो सुन्दर शरीर हो, गुरूजन उससे प्रसन्न रहें। सुन्दर वस्त्र, पुष्पमाला, सुगन्धि युक्त पदार्थों का सेवन करे (अर्थात् शौकीन हो)। वेश्या और स्त्रियों और परिवार से सुख हो। नौका या जहाजों (जलयानों) से या इनके माध्यम से लाए गये पदार्थों से धन की प्राप्ति हो। जातक जनप्रिय और भोग सम्पन्न होता है। चन्द्र और शुक्र यदि सप्तम में हो तो जातक बहुत सी युवतियों में रत हो, बहुत द्दन नहीं होता न बहुत पुत्र संतान होते हैं। कन्याएं अधिक होती हैं। राजा के समान (भोगशील) चरित्र वाला और मेधावी हो। यदि यह युति दशम में हो तो जातक के अधीन बहुत से आदमी होते हैं, वह उच्च, सम्मानित अद्दिकारी (हुकूमत करने वाला) विख्यात, मंत्री या राजा, वैभव युक्त होता है। वह क्षमावान् होता है।   
    (5) यदि चन्द्र और शनि की युति लग्न में हो तो जातक दास (मातहती में काम करने वाला) कर्म करने वाला, दुष्ट, क्रोधी, लोभी, हीन छोटे दर्जे का काम, चरित्र या पद में छोटी कक्षा का)। ऐसे जातक अधिक निद्राशील, आलसी और पापी होते हैं। यदि यह दोनों ग्रह चतुर्थ में हो तो जल (जल में उत्पन्न या जल मार्ग से लायी या ले जायी गई वस्तुओं) से नौका, जहाज, मुक्ता, मणि, आदि से आजीविका उपार्जन करता है या खुदाई (खनन-मकान, बावड़ी, कूप, तालाब, बाँध, आदि की खुदाई या तेल, पेट्रोल, खनिज पदार्थों से सम्बन्द्दित खुदाई), पत्रकारिता से द्रव्य कमाता है। ऐसे जातक श्रेष्ठ होते हैं और लोग उनकी प्रशंसा करते हैं। यदि चन्द्र-शनि योग लग्न से सप्तम में हो तो जातक नगर, ग्राम या पुर में महान, राजा से सम्मानित होता है, किन्तु युवति हीन (स्त्री रहित, अर्थात विवाह न हो या पत्नी जीवित न रहे) होता है। यदि चन्द्र शनि युति दशम में हो तो नराधिप (राजा या जन समुदाय पर हुकूमत करने वाला) होता है, अपने शत्रुओं का दमन करने में ऐसे लोग अत्यन्त कुशल होते हैं, विख्यात हो, माता का सुख कम होता है।
मंगल की अन्य ग्रहों से युति
    अब मंगल की अन्य ग्रहों से युति का फल कहते हैं। सर्वप्रथम जातक पारिजात का मत देखिये, तदन्तर अन्य आचार्यों का मत भी दिया जा रहा है। चन्द्र-मंगल युति पीछे लिखी हैं।
    (1) यदि मंगल और बुध की युति हो तो वाग्मी, औषद्दि, शिल्प और शास्त्र में (या शिल्प शास्त्र में) कुशल होता है। वराहमिहिर के मत से मूल (नाल, पत्र, पुष्प, फल, वल्कल आदि), स्नेह (तैल, घृत, वसा, मज्जा-सम्प्रति, ग्रीज, वैसलीन, मोबिल आयल आदि भी) कूट (विविध द्दातुओं से मिश्रित जो वस्तुएं बनायी जाती हैं) आदि का व्यापार करता है और बाहु योद्धा (पहलवान, मल्ल कुश्ती लड़ने वाला) होता है। कूट से कूटनीतिज्ञ, सत्य, असत्य वचनों से अपना काम निकालने वाला जानना चाहिये, क्योंकि बुध वाणी का मुख्य कारक है। सारावली के अनुसार जातक की स्त्री अच्छी न हो, सोने, लोहे मशीनरी का काम करने वाला, दुष्ट स्त्री और विधवा जिसकी रखैल हो, तथा औषध क्रिया में निपुण (वैद्य, हकीम, डाक्टर, कम्पाउण्डर, केमिस्ट, ड्रगिस्ट, सर्जन आदि) होता है।
    (2) यदि मंगल और बृहस्पति का योग हो तो कामी, पूज्य गुणान्वित और गणित शास्त्र का ज्ञानी होता है। वराहमिहिर के अनुसार मंगल सत्व तथा बृहस्पति (ज्ञान) के योग बल से नगर  अध्यक्ष, सभासद, मेयर, पालिका चेयरमैन आदि हो, या राजा (या सरकार) से धन प्राप्त करता है। सारावली के मत से शिल्प, वेद तथा अन्य शास्त्रों में निष्णात् मेधावी, वाग्विशारद (वाणी-शूर), बुद्धिमान् और दीर्घायु, पुत्रवान् और विनीत होता है, किन्तु यदि यह युति लग्न से षष्ठ, अष्टम या द्वादश में हो तो व्यसनी, रोगी और कम धन, आलसी, निष्ठुर वाला हो।
    (3) यदि मंगल और शुक्र एक साथ हो तो धातुओं (लोहा आदि) के कार्य में संलग्न, प्रपंच-रसिक (मायावी, सत्य असत्य का विचार न करने वाला) और कपटी होता है। वराहमिहिर के अनुसार गायों का पालन करने वाला, मल्ल (कुश्ती लड़ने वाला) शीघ्र कार्य-कर्त्ता कुशल, परदारा गमन में रूचिशील, जुआँ, सट्टा, रेस, लॉटरी, मटका आदि में रूपया लगान में अग्रणी होता है। पृथुयशस् के अनुसार जातक, चपल, स्त्री या स्त्रियों के वश में दुष्ट कर्म कर्ता होता है किन्तु यदि यह युति लग्न, चतुर्थ या दशम में हो तो वह अपने कुल की अपेक्षा अधिक उच्च स्थान प्राप्त करता है, या अपने ग्राम-शहर का नेता होता है।
    (4) यदि मंगल और शनि की युति हो तो वादी, वकील, गान, विनोद, हँसी, मजाक, कौतुक का रचने वाला किन्तु प्रायः मन्दमति (बुद्धिमान कम) होता है। वराहमिहिर के अनुसार दुःख से पीड़ित, असत्य वाणी तथा मिथ्या व्यवहार शील तथा निन्दित होता है। सारावली के अनुसार धातु के कार्यों में कुशल, इन्द्रजाल में (जादूगरी) निपुण, धोखा देने वाला चोरी के कार्यों में चतुर, कलह प्रिय, शस्त्र या विष से पीड़ित, विधर्मी (अपने धर्म का पालन न करने वाला) होता है। पृथुयशस् के अनुसार मंगल और शनि की युति हो तो सदैव दुःखी (मानसिक या शारीरिक पीड़ायुक्त-विशेष कर वात और पित्त रोगों से) रहता है। किन्तु यदि यह युति लग्न से तृतीय, षष्ठ, दशम या एकादश भाव में हो तो विख्यात्, राजा के समान होता है और लोग उसे पसन्द करते हैं अर्थात् जन प्रिय होता है।
केन्द्र में योग
    मंगल का अन्य ग्रहों के साथ यदि केन्द्र में योग हो तो सारावली में विशेष फल दिया गया है। अब मंगल का योग बुध, बृहस्पति, शुक्र या शनि के साथ केन्द्र में हो तो सारावली के अनुसार उसका फल नीचे है।
    (1) मंगल और बुध की युति यदि लग्न में हो तो हिंसक (क्रूर, भयानक), अग्नि कर्म में कुशल (फैक्ट्री आदि जहाँ अग्नि का कार्य होता है) धातुओं का कार्य करने वाला, दूत, होता है और जो वस्तु गुप्त रखी जाती है, उनका अधिकारी होता है। यदि यह युति चतुर्थ में हो तो अपने परिवार जनों से निरादृत, तिरस्कृत, बन्धु-बान्धव से रहित या उनका विरोद्दी होता है किन्तु मित्र बहुत होते हैं और धन, अन्न, भोग-विलास, वाहन आदि से सम्पन्न होता है। यदि इन दोनों ग्रहों का योग लग्न से सप्तम में हो तो जातक की प्रथम स्त्री की मृत्यु या विच्छेद हो जाता है, विवाद प्रिय होता है, एक स्थान से दूसरे स्थान में जाता है। स्थायी रूप से एक स्थान में वास नहीं रहता, नीचों की मातहती, में काम करता है। यदि मंगल बुद्द युति दशम में हो तो सेना का अधिपति, शूर, शठ, दुष्ट स्वभाव, अति क्रूर होता है किन्तु द्दैर्य की मात्रा विशेष होती है, राजा का कृपा-पात्र होता है।
    (2) यदि मंगल बृहस्पति की युति लग्न में हो तो मंत्री या अपने विशिष्ट गुणों के कारण प्रधान पद प्राप्त करे। सदैव उत्साही रहे और धार्मिक क्षेत्र में कीर्तियुक्त होता है। यदि इन दोनों ग्रहों की युति लग्न से चतुर्थ स्थान में हो तो जातक गुरू और देवताओं का भक्त होता है, राजा की सेवा करता है। बन्धु और मित्रों से सम्पन्न सुखी जीवन व्यतीत करता है। जिस जातक के सप्तम स्थान में मंगल बृहस्पति हो वह रण में शूरवीर होता है, पर्वत, किला, वन और नदी तट या समुद्र तट उसे प्रिय होते हैं। उसके अच्छे भाई-बन्धु होते हैं किन्तु पत्नी से कष्ट होता है अर्थात् (यह योग सप्तम में मंगल होने के कारण मंगलीक योग कारक है) पत्नी सुख के लिये हानिकारक है। यदि यह युति लग्न से दशम में हो तो विख्यात कीर्तिवाला हो, बहुत धनी और विस्तृत परिवार हो, कार्यों में बहुत दक्ष हो और राजा होता है।
    (3) यदि मंगल और शुक्र की युति लग्न में हो तो जातक कुशील, निष्ठुर, नैतिकताहीन, वेश्यागामी होता है। दीर्घायु भी नहीं होता और स्त्रियों पर या स्त्रियों के लिये धन नष्ट करता है। यदि इन दोनों ग्रहों की युति चतुर्थ भाव में हो तो बन्धु पुत्र, और मित्रों से हीन होता है, मानसिक पीड़ा से कष्ट होता है। यदि इन दोनों ग्रहों का योग लग्न से सप्तम में हो तो स्त्री-लोलुप, कुचरित्रवान् आचारहीन होता है। स्त्रियों के कारण दुःख पाता है। यदि यह युति दशम में हो तो शस्त्र विद्या में निष्णात, बुद्धिमान, विद्या द्दन से युक्त, विख्यात पुरूष या राजमन्त्री होता है।
    (4) यदि मंगल तथा शनि की युति लग्न में हो तो अल्पायु, (किन्तु मंगल या शनि लग्नाधिपति होकर लग्न में हो तो यह अशुभ दोष नहीं होगा यह बात ध्यान में रखना चाहिए), माता से द्वेष करता है, क्षीण भाग्य, संग्रामजयी होता है। यदि यह युति लग्न से चतुर्थ में हो तो पापकर्म में रत होता है। उसके स्वजन उसका त्याग कर देते हैं, मित्र नहीं होते, भोजन और सुख से रहित होता है अर्थात् सुखी नहीं होता। चतुर्थ भाव सुख स्थान है इस कारण क्रूर ग्रह की युति चतुर्थ स्थान में सुख की हानि करती है। यदि सप्तम में यह युति हो तो पत्नी के सुख से रहित, पुत्र के सुख से विरत, अल्प-धनी, रोगी, व्यसनी, कृपण, होता है।
बुध की अन्य ग्रहों से युति
    बुध की सूर्य, चन्द्र या मंगल के साथ युति का फल पहले लिख चुकी हूँ। अब यदि बुध, बृहस्पति, शुक्र या शनि के साथ योग करे तो उसका फल कहते है।
    (1) जातक पारिजात के अनुसार यदि बुध और बृहस्पति एक साथ हो तो जातक वाग्मी, सारपूर्ण वक्ता, स्वरूपवान्, सद्गुणी और विशेष धनी होता है। वराहमिहिर के अनुसार संगीत प्रिय  नृत्य-प्रिय, रंगकर्मी, नाटक, सिनेमा आदि की वृत्ति से धनोपार्जन करने वाला होता है। सारावली के मत से जातक सुखी, विद्वान, मतिमान, गाने बजाने, नृत्य आदि का ज्ञाता होता  है। पृथुयशस् के अनुसार बुध-बृहस्पति की युति से जातक बहरा, नेत्र रोग से पीड़ित, पर विद्वान होता है, यदि यह युति लग्न से छठे, आठवें या बारहवें घर में हो तो सुन्दर, धार्मिक और विख्यात् होता है।
    (2) यदि बुध और शुक्र की युति हो तो शास्त्रज्ञ, गान, विनोद तथा हास्य का रसिक होता है। वराहमिहिर के अनुसार वाग्मी, व्यक्तियों के समूह का पालक होगा। रुद्रभट्ट के अनुसार यदि बुध और शुक्र दोनों बलवान् हो तो भूमि-पति या सेनापति होगा। सारावली के अनुसार जातक अतिशय धनी, नीतिज्ञ, शिल्पवान्, वेदों का विद्वान अच्छे सारपूर्ण और मधुर वचन बोलने वाला, गीतज्ञ, हंसी-मजाक में निपुण होता है।
    (3) यदि बुध और शनि की युति हो तो विद्वान उच्च पदारूढ़, धार्मिक मायावी (मिथ्याचरण का आश्रय लेकर, दूसरों के मन में भ्रम पैदा करने वाला) और शास्त्रीय वृत्ति तथा लोक वृत्ति का उल्लंघन करने वाला होता है। सारावली के अनुसार जातक ऋणवान पाठान्तर से गुणवान् भी, दाम्भिक, प्रपंची, सत्कवि, घूमने का शौकीन, निपुण तथा मोहक वक्ता होता है।
केन्द्र में योग
    (1) बुध-बृहस्पति युति यदि लग्न में हो तो शुभ स्वरूप, सौशील्यादि गुण सम्पन्न, विद्वान, राजाओं से सम्मानित, अनेक भोगों का भोक्ता, वाहन युक्त, सुखी और भोगी होता है। यदि यह युति चतुर्थ स्थान में हो तो राजा का कृपा पात्र, स्त्री मित्रों बन्धुओं से सम्पन्न, सौभाग्यशाली धनी और सुखी होता है। यदि बुध-बृहस्पति योग सप्तम में हो तो अच्छी पत्नी का स्वामी सत्व (साहस, पुरूषार्थ बल) सम्पन्न होता है, शत्रुओं पर विजय प्राप्त हो, धनी, बहुत परिजनों और मित्रों से युक्त और अपने पिता की अपेक्षा बहुत उच्च पद, मान-प्रतिष्ठा आदि में होता है। यदि इन दोनों ग्रहों की युति लग्न से दशम में हो तो राजा या मंत्री हो, उसका बहुत सम्मान हो, हुकूमत करे, धनी और विद्वान हो, उसकी बहुत ख्याति होती है।
    (2) यदि बुध और शुक्र की युति लग्न में हो तो सुन्दर और स्वस्थ हो, ब्राह्मणों और देवताओं का भक्त हो, स्वयं विद्वान और राजा से सम्मानित होता है। ऐसा व्यक्ति विख्यात और प्रशंसनीय होता है। यदि यह युति लग्न से चतुर्थ में हो तो सुन्दर शरीर हो मित्र, पुत्र बन्धओं से युत हो। ऐसा व्यक्ति, कल्याण, सम्पन्न (शुभगुण, सम्पत्ति युक्त) राजा या राजा का मंत्री हो। यह युति सप्तम में होने से बहुत सी सुन्दर स्त्रियों से रति-सुख होता है।
    (3) यदि बुध और शनि की युति लग्न में हो तो मलिन शरीर, पापी, विद्या, धन और वाहन से हीन, अल्पायु और मन्द भाग्य, होता है। चतुर्थ में यह युति होने से, भोजन पेय, तथा बन्धुओं से रहित मूढ़, स्वजनों से तिरस्कृत, पापकर्मी होता है उसके मित्र कम हों। सप्तम में यदि इन दोनों ग्रहों का योग हो तो अति मलिन होता है, न साधु होता है, न परोपकारी अर्थात दुष्ट होता है। मिथ्यावादी होता है, किन्तु इन दोनों ग्रहों का योग यदि लग्न से दशम में हो तो अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करे, ब्राह्मणों, गुरूओं तथा देवताओं में श्रद्धा रखे, स्वजनों तथा मित्रों से युक्त, वाहनों का स्वामी, धन से सम्पन्न होता।
बृहस्पति की अन्य ग्रहों की युति
    अब बृहस्पति की शुक्र तथा शनि से युति का फल कहते हैं। बृहस्पति की अन्य ग्रहों से युति पहले लिख चुकी हूँ।
    (1) जातक पारिजात के अनुसार यदि बृहस्पति और शुक्र की युति हो तो तेजस्वी, राजा का प्रिय, अत्यन्त बुद्धिमान् और शूरवीर होता है। वराहमिहिर के मत से जातक सज्जन, विद्वान् अनेक गुण सम्पन्न, धनी और पत्नी सुख सम्पन्न होता है। सारावली के अनुसार जातक की विशिष्ट (उत्कृष्ट धन कुलादि के कारण या सौन्दर्य सौशील्य विद्यादि गुण सम्पन्न) पत्नी हो, प्रामाणिक बात बोलने वाला और जिसमें विश्वास किया जा सके विशेष रूप से धार्मिक, विद्या से धन उपार्जन करने वाला होता है।
    (2) यदि बृहस्पति और शनि एक साथ हों तो शिल्प शास्त्र में निपुण हो। वराहमिहिर के मत से नापित (नाई) का काम करने वाला, कुम्हार या अन्न दान कर्म तत्पर होता है। रुद्रभट्ट के अनुसार नाई या कुम्हार के काम में कुशल हो (शनि के संयोग से कर्म कुशलता दिखलायी और अन्न दान कर्म कर्तव्य से सद्गुणातिरेक कहा गया है।
    सारावली के अनुसार जातक शूर धन समृद्ध, यशस्वी, श्रेणि, सभा, ग्राम, संघ आदि का प्रद्दान होता है। किसी कार्य विशेष के करने वालों के समुदाय को श्रेणि कहते हैं। पृथुयशस् के अनुसार यदि अनुपचय (लग्न, द्वितीय, चतुर्थ, पंचम, सप्तम, अष्टम, नवम या द्वादश) स्थान में बृहस्पति और शनि का योग हो तो मान और धन से हीन होता है।
केन्द्र में योग
    लग्न, चतुर्थ, सप्तम या दशम, में बृहस्पति शुक्र या बृहस्पति शनि के युति का विशेष फल सारावली में कहा है। वह लिख रही हूँ।
    (1) यदि बृहस्पति और शुक्र की युति लग्न में हो तो राजा के समान भूमि-पति होता है। चतुर्थ में यह युति होने से देव गुरू, द्विजों की अर्चना करता है। अपने कुटुम्बीजनों-आत्मीयों मित्रों से युक्त धन सम्पन्न होता है। उसके अनेक वाहन होते हैं और शत्रुओं को परास्त करता है। यदि बृहस्पति शुक्र का योग सप्तम में हो तो अच्छी पत्नी प्राप्त हो, धन और रत्नों का स्वामी, सुखी और भोगवान होता है, उत्कृष्ट वाहन (सवारी रथ, घोड़े, हाथी, पालकी सम्प्रति मोटर आदि) होते हैं और विख्यात होता है, (यह योग मेरे पिता जी की कुण्डली में स्पष्ट है, मगर नाम अवश्य प्रसिद्ध है, लेकिन धन-मोटर आदि के मामले में उत्कृष्ट तो नहीं कहा जा सकता, हाँ अपने कार्य-व्यापार के सिलसिले में जब वे अपने भक्तों आदि के साथ बाहर जाते हैं, तब तो एक से एक बड़े वाहन (यहाँ तक कि बी.एम.डब्ल्यू, मर्सिडीज, लैंड-क्रूजर, हवाई जहाज आदि तक का सुख काफी कुछ उन्हें मिलता है, हाँलांकि 1 मारूति 1 कॉन्टेसा 1 अम्बेसडर 1 फियेट, 1 रॉयल इन्फील्ड वे रख चुके हैं जिसमें वर्तमान् समय में 1 मारूति 1 कॉन्टेसा ही है, जिसमें कॉन्टेसा तो नगण्य ही मानी जायगी, का सुख भोगते हैं)। यदि यह युति दशम में हो तो बहुत से सेवक हों, अद्दिक सम्पन्न (द्दनी) हों, तथा गुण से समन्वित होता है।
        ज्योतिष-शास्त्र में योगों का बहुत महत्व बताया गया है, एक कहावत है कि ‘मंदिर में भोग, अस्पताल में रोग और ज्योतिष में योग का अपना एक अलग महत्व है।’
जिस प्रकार से विभिन्न चीजों को आपस में एक विशेष अनुपात में मिलाने से सुस्वादु व्यंजनादि (भोजनादि) तैयार होते हैं, ठीक उसी प्रकार दो या अद्दिक ग्रहों के संयोग से विशेष योग बनता है, जिसका विशेष महत्व जातक के जीवन में पड़ता है। यहाँ पंच महापुरूष योगों एवं ग्रहों की युति से बनने वाले कुछ विशेष योगों पर एक लेख प्रस्तुत कर रही हूँ।
    यदि मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र या शनि अपनी उच्च राशि या मूल त्रिकोण या स्वराशि में स्थित होकर लग्न से केन्द्र (1, 4, 7, 10) में हो तो महापुरूष योग होता है। यदि मंगल उपयुक्त प्रकार से योग करे तो रूचक, बुध करे तो भद्र, बृहस्पति से हंस, शुक्र योगकारक हो, तो मालव्य और शनि अपनी मूल त्रिकोण या उच्च राशि में स्थित केन्द्र में हो तो शश योग होता है। इस में मंत्रेश्वर का कथन है कि, उपयुक्त योग केवल लग्न से केन्द्र में स्वोच्च स्व-राशिस्थ मंगल आदि के होने से तो होता ही है, यदि लग्न से केन्द्र में न हो अपितु चन्द्रमा से केन्द्र में उच्चस्थ स्वराशिस्थ मंगल, बुध आदि पांचों ग्रहों में से केन्द्र में हो तो भी महापुरूष योग होता है। शोध के उपरान्त भी ऐसा फल दिखता है। मानसागरी के मत से मंगल आदि उच्च या स्वराशि में, लग्न से केन्द्र में हो तभी रूचक आदि महापुरूष योग होता है परन्तु यह भी लिखा है कि यदि उपर्युक्त योगकारक (मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र या शनि जो योग बना रहा हो) ग्रह के साथ सूर्य या चन्द्रमा हो तो महापुरूष योग भंग हो जाता है और इस योग का जो विशिष्ट फल लिखा है वह नहीं होता, केवल साधारण अच्छा फल होता है।
केन्द्रोच्चगा यद्यपि भूसुताद्या मार्तण्डशीतांशुयुता भवन्ति।
कुर्वन्ति नोर्वीपतिमात्मपाके यच्छन्ति ते केवल सत्फलानि।।
    सारावली ( त्रिष्कन्ध ज्योतिषाचार्य ब्रह्मलीन पं. सीताराम झा कृत, उल्लेखनीय है कि मेरे पिता जी इनको शुरूआत से ही गुरूवत मानते रहे हैं) अध्याय 24 में पंच महापुरूष योग दिए गए हैं।     बलरहितेन्दुरविभ्यां युक्तैर्भौमादिभिर्ग्रहैर्मिश्राः।
 न भवन्ति महीपाला दशासु तेषां सुतार्थसंयुक्ताः।।
    वराहमिहिर ने भी इन योगों की विवेचना की है। जिसका संकलन मैने किया है।
    अब सर्वप्रथम रूचक योग का फल लिखती हूँ।
रूचक योग (मंगल-जनित)
जातः श्री रूचके बलान्वितवपुः श्रीकीर्तिशीलान्वितः
शास्त्री मन्त्रजपाभिचार कुशलो राजाऽथवा तत्समः।
लावण्यारूणकान्तिकोमलतनुस्त्यागी  जितारिर्धनी
सप्तत्यब्दमितायुषा सह सुखी सेनातुर¯धिपः।
    रूचक योग में उत्पन्न व्यक्ति बलान्वित शरीर, लक्ष्मी (श्री शब्द मूल में आया है इससे शरीर सौष्ठव तथा कान्ति युक्त, यह अर्थ भी लिया जा सकता है), शास्त्री (शास्त्र निष्णात), मंत्रों के जप और अभिचार में कुशल, राजा या राजा के समान, लावण्य युक्त शरीर, लालिमायुक्त, कोमल तन, शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने वाला, त्यागी, धनी 70 वर्ष की आयु प्राप्त करने वाला, सुखी, सेना और घोड़ों का स्वामी होता है।
    अखण्ड साम्राज्य योग- यदि (1) नवमेश, लाभेश, धनेश (द्वितीय नवम या एकादश) के स्वामी में से कोई एक भी ग्रह चन्द्रमा से केन्द्र में हो और स्वयं गुरू (बृहस्पति) ग्यारहवें घर का स्वामी हो, और ऐसे गुरू की एकादश भाव में दृष्टि हो तो ऐसा जातक अखण्ड साम्राज्य का स्वामी होता है। फलदीपिका में जो पाठ है, उसमें तृतीय चरण में ‘स्वयं च के स्थान में ‘स्वपुत्र’ है-जिसका अर्थ हो जायेगा कि ‘यदि बृहस्पति, पंचम या एकादश का स्वामी हो। योग अच्छा है द्वितीयेश, नवमेश या लाभेश चन्द्रमा से केन्द्र में हो तो धनकारक, भाग्यकारक है परन्तु अखण्ड साम्राज्य पतित्व-इस योग का उत्कृष्ट फल केवल अतिशयोक्ति है, क्योंकि यह योग (सम्पूर्ण) मेरे पिता जी की कुण्डली में है, मगर अखण्ड साम्राज्यपतित्व जैसा कुछ दिखता नहीं, हाँ नाम ( सम्पूर्ण हिन्दी भाषी जगत में ) अवश्य प्रसिद्ध है, लेकिन धन के मामले में तो विशेष नहीं कहा जा सकता।
भद्र योग (बुध-जनित)
    इस योग में उत्पन्न मनुष्य का सिंह के समान चेहरा, हाथी के समान गति, पुष्ट जाँघे, उन्नत वक्षस्थल होता है। उसके बाहु लम्बे गोल और पुष्ट होते हैं और उन्हीं के समान उसका मान होता है। मान क्या? यदि मनुष्य दोनों बाहुओं को फैला कर खड़ा हो तो एक हाथ की मध्यमा अंगुलि के अंत से दूसरे हाथ की मध्यमा अंगुलि के अन्त तक जितनी लम्बाई हो उतनी ही यदि जातक की ऊँचाई हो तो मनुष्य बहुत विशिष्ट पदवी प्राप्त करता है।
    स्कन्दपुराण में लिखा है कि कुसुम से रंगे हुए सूत की तीन लड़ करें और गणेशादि का भक्तिपूर्वक स्मरण कर उत्तराभिमुख दोनों भुजा और हाथ फैला कर खड़े हो जाइये, अर्थात् उत्तर की ओर मुख कर खड़े हुए आदमी का दाहिना हाथ पूर्व की ओर,और बायां हाथ पश्चिम की ओर कंधे के समतल फैला हुआ होगा, दाहिने हाथ की मध्यांगुली (बीच की उंगली) के अन्त से बांये हाथ के बीच की उंगली तक नापे यदि यह ऊँचाई के बराबर हो तो ऐसा मनुष्य श्रेष्ठ अधिकारी होता है।
    भद्र योग में उत्पन्न व्यक्ति, मानी, बन्धु जनों के उपकार में निपुण, विपुल प्रज्ञा, यश, धन वाला होता है 80 वर्ष की आयु होती है।
हंस योग (गुरू-जनित)
    जो हंस योग में जन्म ले उसका मुख (ओष्ठ, तालु जिह्ना) लाल, ऊँची नाक, अच्छे चरण, हंस के समान स्वर, कफ प्रधान प्रकृति, गौर वर्ण, सुकुमार (कोमलांगी) पत्नी, कामदेव के समान सुन्दर सुखी, शास्त्र ज्ञान में अति निपुण, साद्दु (उत्तम) कार्य और आचार वाला होता है और 84 वर्ष की आयु होती है। अघरोष्ठ जिह्ना, तालू का लाल होना सुख और सौभाग्य का लक्षण माना जाता है।
मालव्य योग (शुक्र-जनित)
    जिसका मालव्य योग में जन्म हो उसकी स्त्री के समान चेष्टा (हाथ मटकाना, चलना लज्जा आदि), शरीर संद्दियां ललित (मृदु और सुन्दर), सुन्दर आकर्षक नेत्र, सौन्दर्य युक्त शरीर, गुणी (अनेक सद्गुण सम्पन्न), तेजस्वी स्त्री पुत्र वाहन (सवारी से युक्त) धनी, शास्त्रों का अर्थ जानने वाला पण्डित (विद्वान्), उत्साहयुक्त, प्रभुता शक्तिसम्पन्न (औरों को आज्ञा देने वाला अधिकारी), मंत्रवेत्ता, पत्रकार, साहित्यानुरागी, चतुर, त्यागी, पर स्त्रीरत (दूसरे की स्त्रियां में आसक्त) होता है 80 वर्ष तक जीता है।
शश योग (शनि जनित)
    जो इस योग में उत्पन्न हो वह राजा या राजा के समान वन और पर्वतों में रहने या घूमने वाला, सेनापति (अर्थात् उसके अधीन बहुत आदमी हों) क्रूर बुद्धि, धातु (लोहा, पीतल, चांदी सोना) के वाद विवाद में विनोद करने वाला और ठगने वाला (भावार्थ है कि धातु का काम करें और बेईमानी से कमावे), दाता (देने वाला), जिसकी दृष्टि में क्रोद्द हो, तेजस्वी अपनी माता का भक्त, शूर, श्यामवर्ण, सुखी, जार क्रिया (परस्त्री से मैथुन कार्य) स्वभाव वाला होता है और सत्तर वर्ष की आयु होती है। महापुरूष योग समाप्त।
चन्द्रमा के साथ अन्य ग्रहों की युति का फल
    (1) यदि चन्द्रमा और मंगल एक साथ हो तो जातक शूरवीर सत्कुलोचित धर्म पालन करने वाला, धनी और गुणवान होता है। वराहमिहिर के मत से जातक कूट मारणोच्चाटनादि प्रयोग में निष्णात, स्त्री, आसव कुंभ आदि का क्रय-विक्रय (या गिरवी रखना) शील होता है। कूट का अर्थ नीतिपरक भी हो सकता है। माता के लिये यह योग अकल्याणकारी है। सारावली के अनुसार जातक शूर, रण में प्रतापी, मल्ल (युद्ध या कुश्ती करने वाला) मृत्तिका चर्म या धातु के (कूट का अन्य अर्थ) शिल्प में दक्ष होता है कि रक्त रोग के कारण शरीर में वेदना रहती है। पृथुयशस् के अनुसार चन्द्रमा और मंगल लग्न, पंचम नवम, दशम या एकादश में हो तो धनवान् और राजा के समान होता है। यदि यह योग अन्य स्थान में हो तो बन्धुओं के सुख से हीन हो।
    (2) यदि चन्द्रमा और बुध एक साथ हों तो द्दार्मिक, शास्त्रज्ञ और तदनुसार कार्य और व्यवहार करने वाला, अद्भुत गुणों (या अनेक प्रकार के गुणों से) युक्त होता है। वराहमिहिर के अनुसार मीठे वचन बोलने वाला, अर्थनिपुण, सौभाग्यशाली, यशस्वी होता है। सारावली के अनुसार जातक काव्य तथा कथाओं में अति निपुण, द्दनी स्त्री सम्मत (स्त्रियां जिसको पसन्द करें) सुरूप युक्त, हंसमुख (हमारा अनुभव है कि जातक मजाकिया भी होता है) और विशिष्ट गुणों से युक्त होता है।
    (3) यदि चन्द्रमा और बृहस्पति का योग हो तो जातक साद्दुजनावलम्बी और अत्यन्त मतिमान् (मति में वृद्धि, विवेक आदि का समावेश हो जाता है) होता है, वराहमिहिर के अनुसार जातक विक्रान्त, अपने कुल में मुख्य अति स्थिर मति वाला और अत्यन्त धनी होता है। सारावली के अनुसार देवता और ब्राह्मणों की पूजा और सत्कार में रत, शुभशील, दृढ़, मित्रता निभाने वाला, अपने बन्द्दुओं का सम्मान करने वाला और अत्यन्त धनी हो। पृथुयशस् के अनुसार कि जातक, विनीत, स्त्री, पुत्र सहित (अर्थात इनका सुख हो) और धनी होता है किन्तु यह योग लग्न से तृतीय या षष्ठ में हो या चन्द्रमा और बृहस्पति इन दोनों ग्रहों में कोई नीच (यदि यह युति वृश्चिक/मकर में हो) हो तो शुभ नहीं होता है।
    (4) यदि चन्द्रमा और शुक्र का योग हो तो जातक क्रय-विक्रय (खरीद-फरोख्त) में कुशल किन्तु पापात्मा होता है। वराहमिहिर के मत से वस्त्रों के क्रय आदि में कुशल होता है। सारावली के अनुसार क्रय-विक्रय कुशल, अत्यन्त आलसी होता है। पृथुयशस् के अनुसार जातक धनाध्यक्ष होता है और यदि यह योग लग्न से दशम या द्वादश भाव में हो तो विदेश से धन प्राप्ति।
    (5) यदि चन्द्रमा और शनि की युति हो तो जातक कु-स्त्री (जो स्त्री अच्छी न हो) का पुत्र होता है। जातक अपने पिता का दूषक होता है (अपने पिता की निन्दा करता है या अपने आचरण से पिता के कुल को दोष लगाता है) और उसका धन नष्ट हो जाता है, (लेकिन अन्य ग्रहों का योग देखना भी आवश्यक है)। वराहमिहिर के मत से जातक पुनर्भूसुत होता है। जिस स्त्री का द्वितीय बार विवाह हो उसे पुनर्भूसुत कहते हैं। सब जातियों में स्त्री का पुनर्विवाह प्रचलित नहीं है, इस कारण रुद्रभट्ट के अनुसार उसकी माता जारादि से उपभुक्त हो। सारावली के अनुसार जातक (अपने वय से) अधिक वय की स्त्रियों से रमण करता है, हाथी, घोड़ों का पालन करता है या उनको शिक्षा देता है, अब हाथी, घोड़े तो इतने रहे नहीं, इसलिये मोटर, स्कूटर, ट्रक, टैम्पो, इंजन, जहाज, हवाई जहाज, कल कारखानों में मशीन चलाने वाला या उस तत्व से सम्बन्धित व्यवसाय में लगा हुआ यहाँ यह अर्थ लेना होगा)। ऐसा जातक सौशील्यादि गुण रहित, पराजित, धन रहित होता है। दूसरे की मातहती में कार्य करता है। पृथुयशस् के अनुसार जातक दुर्बल देह युक्त अति नीच कार्य करने वाला, मातृद्वेषी (अपनी माता से बैर करने वाला) और बुद्धिहीन होता है किन्तु यदि यह युति लग्न से तृतीय, षष्ठ, दशम या एकादश में हो तो जातक सर्वसम्पन होता है।
केन्द्र में योग
    अब चन्द्रमा यदि किसी ग्रह के साथ केन्द्र में युति करे तो सारावली में जो विशेष फल कहा है, उससे पाठकों को अवगत कराया जाता है।
    (1) यदि चन्द्रमा और मंगल की युति लग्न में हो तो रक्त, अग्नि, और पित्त रोगों से पीड़ित हो। जातक राजा होता है किन्तु उसके स्वभाव में तीक्ष्णता होती है। यदि यह युति लग्न से चतुर्थ में हो तो जातक विकल, क्लेश युक्त, द्रव्यहीन, सुख, सुत धन और बन्धु इनसे हीन होता है। यदि चन्द्र और मंगल सप्तम में हो तो जातक क्षुद्र, दूसरे का धन प्राप्त करने का लोभी, बहुत प्रलाप करने वाला, ईर्ष्या युक्त, मिथ्यावादी हो। दशम में यदि यह युति हो तो हाथी और घोड़ां और सेना से युक्त, सम्पन्न, और विशेष विक्रमशाली होता है।
    (2) यदि चन्द्रमा और बुध लग्न में योग करें तो सुखी, बुद्धिमान् देखने में सुन्दर, अत्यन्त निपुण और वाचाल हो। यदि यह युति चतुर्थ में हो तो जातक सुन्दर, सुवर्ण, अश्व रत्नों का स्वामी हो। उसके बन्धु, मित्र, सुत हों। ऐसा जातक प्रतापी और सुखी हो, यदि यह दोनों ग्रह लग्न से सप्तम में हो तो जातक का ललित शरीर हो। वह सत्कवि (काव्य कला युक्त अथवा बुद्धिमान्) विख्यात् और प्रतापी होता है। ऐसा जातक राजा हो या राजा का विशेष कृपापात्र हो। यदि यह योग दशम में हो जातक मानी, द्दनवान् और अति विख्यात हो। राजा का मंत्री हो किन्तु अपने जीवन के अंत में दुःखी हो, और सम्भव है कि उसके बन्धु उसे छोड़ दें।
    (3) यदि चन्द्रमा और बृहस्पति की युति लग्न में हो तो विस्तृत और उच्च वक्षस्थल युक्त, अच्छे शरीर से युक्त बहुत मित्रों पुत्रों और स्त्रियों वाला (पहिले अनेक पत्नियों का होना या अनेक स्त्रियों का भोग सुख और सौभाग्य का लक्षण माना जाता था), बन्धुओं से युक्त राजा होता है। यदि यह युति लग्न से चतुर्थ में हो तो राजा के समान मंत्री, महावैभवशाली, बहुत शास्त्रों का ज्ञाता निर्मल बुद्धि युक्त, बन्धओं से समन्वित होता है। चन्द्रमा और बृहस्पति की युति यदि सप्तम स्थान में हो तो जातक कला कुशल, व्यापार करने वाला, धनवान् निर्मल, राजा का कृपापात्र या स्वयं राजा अत्यन्त बुद्धिमान् हो। यदि दशम भाव में यह युति हो तो प्रलम्ब बाहु (लम्बे बाहु होना सौभाग्य और अधिकार का सूचक है) ऐसा जातक विद्वान धनी और दानशील होता है और सम्मान तथा कीर्ति पाता है।
    (4) यदि चन्द्रमा और शुक्र की युति लग्न में हो तो सुन्दर शरीर हो, गुरूजन उससे प्रसन्न रहें। सुन्दर वस्त्र, पुष्पमाला, सुगन्धि युक्त पदार्थों का सेवन करे (अर्थात् शौकीन हो)। वेश्या और स्त्रियों और परिवार से सुख हो। नौका या जहाजों (जलयानों) से या इनके माध्यम से लाए गये पदार्थों से धन की प्राप्ति हो। जातक जनप्रिय और भोग सम्पन्न होता है। चन्द्र और शुक्र यदि सप्तम में हो तो जातक बहुत सी युवतियों में रत हो, बहुत द्दन नहीं होता न बहुत पुत्र संतान होते हैं। कन्याएं अधिक होती हैं। राजा के समान (भोगशील) चरित्र वाला और मेधावी हो। यदि यह युति दशम में हो तो जातक के अधीन बहुत से आदमी होते हैं, वह उच्च, सम्मानित अद्दिकारी (हुकूमत करने वाला) विख्यात, मंत्री या राजा, वैभव युक्त होता है। वह क्षमावान् होता है।   
    (5) यदि चन्द्र और शनि की युति लग्न में हो तो जातक दास (मातहती में काम करने वाला) कर्म करने वाला, दुष्ट, क्रोधी, लोभी, हीन छोटे दर्जे का काम, चरित्र या पद में छोटी कक्षा का)। ऐसे जातक अधिक निद्राशील, आलसी और पापी होते हैं। यदि यह दोनों ग्रह चतुर्थ में हो तो जल (जल में उत्पन्न या जल मार्ग से लायी या ले जायी गई वस्तुओं) से नौका, जहाज, मुक्ता, मणि, आदि से आजीविका उपार्जन करता है या खुदाई (खनन-मकान, बावड़ी, कूप, तालाब, बाँध, आदि की खुदाई या तेल, पेट्रोल, खनिज पदार्थों से सम्बन्द्दित खुदाई), पत्रकारिता से द्रव्य कमाता है। ऐसे जातक श्रेष्ठ होते हैं और लोग उनकी प्रशंसा करते हैं। यदि चन्द्र-शनि योग लग्न से सप्तम में हो तो जातक नगर, ग्राम या पुर में महान, राजा से सम्मानित होता है, किन्तु युवति हीन (स्त्री रहित, अर्थात विवाह न हो या पत्नी जीवित न रहे) होता है। यदि चन्द्र शनि युति दशम में हो तो नराधिप (राजा या जन समुदाय पर हुकूमत करने वाला) होता है, अपने शत्रुओं का दमन करने में ऐसे लोग अत्यन्त कुशल होते हैं, विख्यात हो, माता का सुख कम होता है।
मंगल की अन्य ग्रहों से युति
    अब मंगल की अन्य ग्रहों से युति का फल कहते हैं। सर्वप्रथम जातक पारिजात का मत देखिये, तदन्तर अन्य आचार्यों का मत भी दिया जा रहा है। चन्द्र-मंगल युति पीछे लिखी हैं।
    (1) यदि मंगल और बुध की युति हो तो वाग्मी, औषद्दि, शिल्प और शास्त्र में (या शिल्प शास्त्र में) कुशल होता है। वराहमिहिर के मत से मूल (नाल, पत्र, पुष्प, फल, वल्कल आदि), स्नेह (तैल, घृत, वसा, मज्जा-सम्प्रति, ग्रीज, वैसलीन, मोबिल आयल आदि भी) कूट (विविध द्दातुओं से मिश्रित जो वस्तुएं बनायी जाती हैं) आदि का व्यापार करता है और बाहु योद्धा (पहलवान, मल्ल कुश्ती लड़ने वाला) होता है। कूट से कूटनीतिज्ञ, सत्य, असत्य वचनों से अपना काम निकालने वाला जानना चाहिये, क्योंकि बुध वाणी का मुख्य कारक है। सारावली के अनुसार जातक की स्त्री अच्छी न हो, सोने, लोहे मशीनरी का काम करने वाला, दुष्ट स्त्री और विधवा जिसकी रखैल हो, तथा औषध क्रिया में निपुण (वैद्य, हकीम, डाक्टर, कम्पाउण्डर, केमिस्ट, ड्रगिस्ट, सर्जन आदि) होता है।
    (2) यदि मंगल और बृहस्पति का योग हो तो कामी, पूज्य गुणान्वित और गणित शास्त्र का ज्ञानी होता है। वराहमिहिर के अनुसार मंगल सत्व तथा बृहस्पति (ज्ञान) के योग बल से नगर  अध्यक्ष, सभासद, मेयर, पालिका चेयरमैन आदि हो, या राजा (या सरकार) से धन प्राप्त करता है। सारावली के मत से शिल्प, वेद तथा अन्य शास्त्रों में निष्णात् मेधावी, वाग्विशारद (वाणी-शूर), बुद्धिमान् और दीर्घायु, पुत्रवान् और विनीत होता है, किन्तु यदि यह युति लग्न से षष्ठ, अष्टम या द्वादश में हो तो व्यसनी, रोगी और कम धन, आलसी, निष्ठुर वाला हो।
    (3) यदि मंगल और शुक्र एक साथ हो तो धातुओं (लोहा आदि) के कार्य में संलग्न, प्रपंच-रसिक (मायावी, सत्य असत्य का विचार न करने वाला) और कपटी होता है। वराहमिहिर के अनुसार गायों का पालन करने वाला, मल्ल (कुश्ती लड़ने वाला) शीघ्र कार्य-कर्त्ता कुशल, परदारा गमन में रूचिशील, जुआँ, सट्टा, रेस, लॉटरी, मटका आदि में रूपया लगान में अग्रणी होता है। पृथुयशस् के अनुसार जातक, चपल, स्त्री या स्त्रियों के वश में दुष्ट कर्म कर्ता होता है किन्तु यदि यह युति लग्न, चतुर्थ या दशम में हो तो वह अपने कुल की अपेक्षा अधिक उच्च स्थान प्राप्त करता है, या अपने ग्राम-शहर का नेता होता है।
    (4) यदि मंगल और शनि की युति हो तो वादी, वकील, गान, विनोद, हँसी, मजाक, कौतुक का रचने वाला किन्तु प्रायः मन्दमति (बुद्धिमान कम) होता है। वराहमिहिर के अनुसार दुःख से पीड़ित, असत्य वाणी तथा मिथ्या व्यवहार शील तथा निन्दित होता है। सारावली के अनुसार धातु के कार्यों में कुशल, इन्द्रजाल में (जादूगरी) निपुण, धोखा देने वाला चोरी के कार्यों में चतुर, कलह प्रिय, शस्त्र या विष से पीड़ित, विधर्मी (अपने धर्म का पालन न करने वाला) होता है। पृथुयशस् के अनुसार मंगल और शनि की युति हो तो सदैव दुःखी (मानसिक या शारीरिक पीड़ायुक्त-विशेष कर वात और पित्त रोगों से) रहता है। किन्तु यदि यह युति लग्न से तृतीय, षष्ठ, दशम या एकादश भाव में हो तो विख्यात्, राजा के समान होता है और लोग उसे पसन्द करते हैं अर्थात् जन प्रिय होता है।
केन्द्र में योग
    मंगल का अन्य ग्रहों के साथ यदि केन्द्र में योग हो तो सारावली में विशेष फल दिया गया है। अब मंगल का योग बुध, बृहस्पति, शुक्र या शनि के साथ केन्द्र में हो तो सारावली के अनुसार उसका फल नीचे है।
    (1) मंगल और बुध की युति यदि लग्न में हो तो हिंसक (क्रूर, भयानक), अग्नि कर्म में कुशल (फैक्ट्री आदि जहाँ अग्नि का कार्य होता है) धातुओं का कार्य करने वाला, दूत, होता है और जो वस्तु गुप्त रखी जाती है, उनका अधिकारी होता है। यदि यह युति चतुर्थ में हो तो अपने परिवार जनों से निरादृत, तिरस्कृत, बन्धु-बान्धव से रहित या उनका विरोद्दी होता है किन्तु मित्र बहुत होते हैं और धन, अन्न, भोग-विलास, वाहन आदि से सम्पन्न होता है। यदि इन दोनों ग्रहों का योग लग्न से सप्तम में हो तो जातक की प्रथम स्त्री की मृत्यु या विच्छेद हो जाता है, विवाद प्रिय होता है, एक स्थान से दूसरे स्थान में जाता है। स्थायी रूप से एक स्थान में वास नहीं रहता, नीचों की मातहती, में काम करता है। यदि मंगल बुद्द युति दशम में हो तो सेना का अधिपति, शूर, शठ, दुष्ट स्वभाव, अति क्रूर होता है किन्तु द्दैर्य की मात्रा विशेष होती है, राजा का कृपा-पात्र होता है।
    (2) यदि मंगल बृहस्पति की युति लग्न में हो तो मंत्री या अपने विशिष्ट गुणों के कारण प्रधान पद प्राप्त करे। सदैव उत्साही रहे और धार्मिक क्षेत्र में कीर्तियुक्त होता है। यदि इन दोनों ग्रहों की युति लग्न से चतुर्थ स्थान में हो तो जातक गुरू और देवताओं का भक्त होता है, राजा की सेवा करता है। बन्धु और मित्रों से सम्पन्न सुखी जीवन व्यतीत करता है। जिस जातक के सप्तम स्थान में मंगल बृहस्पति हो वह रण में शूरवीर होता है, पर्वत, किला, वन और नदी तट या समुद्र तट उसे प्रिय होते हैं। उसके अच्छे भाई-बन्धु होते हैं किन्तु पत्नी से कष्ट होता है अर्थात् (यह योग सप्तम में मंगल होने के कारण मंगलीक योग कारक है) पत्नी सुख के लिये हानिकारक है। यदि यह युति लग्न से दशम में हो तो विख्यात कीर्तिवाला हो, बहुत धनी और विस्तृत परिवार हो, कार्यों में बहुत दक्ष हो और राजा होता है।
    (3) यदि मंगल और शुक्र की युति लग्न में हो तो जातक कुशील, निष्ठुर, नैतिकताहीन, वेश्यागामी होता है। दीर्घायु भी नहीं होता और स्त्रियों पर या स्त्रियों के लिये धन नष्ट करता है। यदि इन दोनों ग्रहों की युति चतुर्थ भाव में हो तो बन्धु पुत्र, और मित्रों से हीन होता है, मानसिक पीड़ा से कष्ट होता है। यदि इन दोनों ग्रहों का योग लग्न से सप्तम में हो तो स्त्री-लोलुप, कुचरित्रवान् आचारहीन होता है। स्त्रियों के कारण दुःख पाता है। यदि यह युति दशम में हो तो शस्त्र विद्या में निष्णात, बुद्धिमान, विद्या द्दन से युक्त, विख्यात पुरूष या राजमन्त्री होता है।
    (4) यदि मंगल तथा शनि की युति लग्न में हो तो अल्पायु, (किन्तु मंगल या शनि लग्नाधिपति होकर लग्न में हो तो यह अशुभ दोष नहीं होगा यह बात ध्यान में रखना चाहिए), माता से द्वेष करता है, क्षीण भाग्य, संग्रामजयी होता है। यदि यह युति लग्न से चतुर्थ में हो तो पापकर्म में रत होता है। उसके स्वजन उसका त्याग कर देते हैं, मित्र नहीं होते, भोजन और सुख से रहित होता है अर्थात् सुखी नहीं होता। चतुर्थ भाव सुख स्थान है इस कारण क्रूर ग्रह की युति चतुर्थ स्थान में सुख की हानि करती है। यदि सप्तम में यह युति हो तो पत्नी के सुख से रहित, पुत्र के सुख से विरत, अल्प-धनी, रोगी, व्यसनी, कृपण, होता है।
बुध की अन्य ग्रहों से युति
    बुध की सूर्य, चन्द्र या मंगल के साथ युति का फल पहले लिख चुकी हूँ। अब यदि बुध, बृहस्पति, शुक्र या शनि के साथ योग करे तो उसका फल कहते है।
    (1) जातक पारिजात के अनुसार यदि बुध और बृहस्पति एक साथ हो तो जातक वाग्मी, सारपूर्ण वक्ता, स्वरूपवान्, सद्गुणी और विशेष धनी होता है। वराहमिहिर के अनुसार संगीत प्रिय  नृत्य-प्रिय, रंगकर्मी, नाटक, सिनेमा आदि की वृत्ति से धनोपार्जन करने वाला होता है। सारावली के मत से जातक सुखी, विद्वान, मतिमान, गाने बजाने, नृत्य आदि का ज्ञाता होता  है। पृथुयशस् के अनुसार बुध-बृहस्पति की युति से जातक बहरा, नेत्र रोग से पीड़ित, पर विद्वान होता है, यदि यह युति लग्न से छठे, आठवें या बारहवें घर में हो तो सुन्दर, धार्मिक और विख्यात् होता है।
    (2) यदि बुध और शुक्र की युति हो तो शास्त्रज्ञ, गान, विनोद तथा हास्य का रसिक होता है। वराहमिहिर के अनुसार वाग्मी, व्यक्तियों के समूह का पालक होगा। रुद्रभट्ट के अनुसार यदि बुध और शुक्र दोनों बलवान् हो तो भूमि-पति या सेनापति होगा। सारावली के अनुसार जातक अतिशय धनी, नीतिज्ञ, शिल्पवान्, वेदों का विद्वान अच्छे सारपूर्ण और मधुर वचन बोलने वाला, गीतज्ञ, हंसी-मजाक में निपुण होता है।
    (3) यदि बुध और शनि की युति हो तो विद्वान उच्च पदारूढ़, धार्मिक मायावी (मिथ्याचरण का आश्रय लेकर, दूसरों के मन में भ्रम पैदा करने वाला) और शास्त्रीय वृत्ति तथा लोक वृत्ति का उल्लंघन करने वाला होता है। सारावली के अनुसार जातक ऋणवान पाठान्तर से गुणवान् भी, दाम्भिक, प्रपंची, सत्कवि, घूमने का शौकीन, निपुण तथा मोहक वक्ता होता है।
केन्द्र में योग
    (1) बुध-बृहस्पति युति यदि लग्न में हो तो शुभ स्वरूप, सौशील्यादि गुण सम्पन्न, विद्वान, राजाओं से सम्मानित, अनेक भोगों का भोक्ता, वाहन युक्त, सुखी और भोगी होता है। यदि यह युति चतुर्थ स्थान में हो तो राजा का कृपा पात्र, स्त्री मित्रों बन्धुओं से सम्पन्न, सौभाग्यशाली धनी और सुखी होता है। यदि बुध-बृहस्पति योग सप्तम में हो तो अच्छी पत्नी का स्वामी सत्व (साहस, पुरूषार्थ बल) सम्पन्न होता है, शत्रुओं पर विजय प्राप्त हो, धनी, बहुत परिजनों और मित्रों से युक्त और अपने पिता की अपेक्षा बहुत उच्च पद, मान-प्रतिष्ठा आदि में होता है। यदि इन दोनों ग्रहों की युति लग्न से दशम में हो तो राजा या मंत्री हो, उसका बहुत सम्मान हो, हुकूमत करे, धनी और विद्वान हो, उसकी बहुत ख्याति होती है।
    (2) यदि बुध और शुक्र की युति लग्न में हो तो सुन्दर और स्वस्थ हो, ब्राह्मणों और देवताओं का भक्त हो, स्वयं विद्वान और राजा से सम्मानित होता है। ऐसा व्यक्ति विख्यात और प्रशंसनीय होता है। यदि यह युति लग्न से चतुर्थ में हो तो सुन्दर शरीर हो मित्र, पुत्र बन्धओं से युत हो। ऐसा व्यक्ति, कल्याण, सम्पन्न (शुभगुण, सम्पत्ति युक्त) राजा या राजा का मंत्री हो। यह युति सप्तम में होने से बहुत सी सुन्दर स्त्रियों से रति-सुख होता है।
    (3) यदि बुध और शनि की युति लग्न में हो तो मलिन शरीर, पापी, विद्या, धन और वाहन से हीन, अल्पायु और मन्द भाग्य, होता है। चतुर्थ में यह युति होने से, भोजन पेय, तथा बन्धुओं से रहित मूढ़, स्वजनों से तिरस्कृत, पापकर्मी होता है उसके मित्र कम हों। सप्तम में यदि इन दोनों ग्रहों का योग हो तो अति मलिन होता है, न साधु होता है, न परोपकारी अर्थात दुष्ट होता है। मिथ्यावादी होता है, किन्तु इन दोनों ग्रहों का योग यदि लग्न से दशम में हो तो अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करे, ब्राह्मणों, गुरूओं तथा देवताओं में श्रद्धा रखे, स्वजनों तथा मित्रों से युक्त, वाहनों का स्वामी, धन से सम्पन्न होता।
बृहस्पति की अन्य ग्रहों की युति
    अब बृहस्पति की शुक्र तथा शनि से युति का फल कहते हैं। बृहस्पति की अन्य ग्रहों से युति पहले लिख चुकी हूँ।
    (1) जातक पारिजात के अनुसार यदि बृहस्पति और शुक्र की युति हो तो तेजस्वी, राजा का प्रिय, अत्यन्त बुद्धिमान् और शूरवीर होता है। वराहमिहिर के मत से जातक सज्जन, विद्वान् अनेक गुण सम्पन्न, धनी और पत्नी सुख सम्पन्न होता है। सारावली के अनुसार जातक की विशिष्ट (उत्कृष्ट धन कुलादि के कारण या सौन्दर्य सौशील्य विद्यादि गुण सम्पन्न) पत्नी हो, प्रामाणिक बात बोलने वाला और जिसमें विश्वास किया जा सके विशेष रूप से धार्मिक, विद्या से धन उपार्जन करने वाला होता है।
    (2) यदि बृहस्पति और शनि एक साथ हों तो शिल्प शास्त्र में निपुण हो। वराहमिहिर के मत से नापित (नाई) का काम करने वाला, कुम्हार या अन्न दान कर्म तत्पर होता है। रुद्रभट्ट के अनुसार नाई या कुम्हार के काम में कुशल हो (शनि के संयोग से कर्म कुशलता दिखलायी और अन्न दान कर्म कर्तव्य से सद्गुणातिरेक कहा गया है।
    सारावली के अनुसार जातक शूर धन समृद्ध, यशस्वी, श्रेणि, सभा, ग्राम, संघ आदि का प्रद्दान होता है। किसी कार्य विशेष के करने वालों के समुदाय को श्रेणि कहते हैं। पृथुयशस् के अनुसार यदि अनुपचय (लग्न, द्वितीय, चतुर्थ, पंचम, सप्तम, अष्टम, नवम या द्वादश) स्थान में बृहस्पति और शनि का योग हो तो मान और धन से हीन होता है।
केन्द्र में योग
    लग्न, चतुर्थ, सप्तम या दशम, में बृहस्पति शुक्र या बृहस्पति शनि के युति का विशेष फल सारावली में कहा है। वह लिख रही हूँ।
    (1) यदि बृहस्पति और शुक्र की युति लग्न में हो तो राजा के समान भूमि-पति होता है। चतुर्थ में यह युति होने से देव गुरू, द्विजों की अर्चना करता है। अपने कुटुम्बीजनों-आत्मीयों मित्रों से युक्त धन सम्पन्न होता है। उसके अनेक वाहन होते हैं और शत्रुओं को परास्त करता है। यदि बृहस्पति शुक्र का योग सप्तम में हो तो अच्छी पत्नी प्राप्त हो, धन और रत्नों का स्वामी, सुखी और भोगवान होता है, उत्कृष्ट वाहन (सवारी रथ, घोड़े, हाथी, पालकी सम्प्रति मोटर आदि) होते हैं और विख्यात होता है, (यह योग मेरे पिता जी की कुण्डली में स्पष्ट है, मगर नाम अवश्य प्रसिद्ध है, लेकिन धन-मोटर आदि के मामले में उत्कृष्ट तो नहीं कहा जा सकता, हाँ अपने कार्य-व्यापार के सिलसिले में जब वे अपने भक्तों आदि के साथ बाहर जाते हैं, तब तो एक से एक बड़े वाहन (यहाँ तक कि बी.एम.डब्ल्यू, मर्सिडीज, लैंड-क्रूजर, हवाई जहाज आदि तक का सुख काफी कुछ उन्हें मिलता है, हाँलांकि 1 मारूति 1 कॉन्टेसा 1 अम्बेसडर 1 फियेट, 1 रॉयल इन्फील्ड वे रख चुके हैं जिसमें वर्तमान् समय में 1 मारूति 1 कॉन्टेसा ही है, जिसमें कॉन्टेसा तो नगण्य ही मानी जायगी, का सुख भोगते हैं)। यदि यह युति दशम में हो तो बहुत से सेवक हों, अद्दिक सम्पन्न (द्दनी) हों, तथा गुण से समन्वित होता है।
    (2) यदि बृहस्पति-शनि की युति लग्न में हो तो जातक मदयुक्त, आलसी, निष्ठुर, विद्वान, किन्तु खल होता है अल्प सुख प्राप्त करता है। यदि युति चतुर्थ स्थान में हो तो स्वास्थ्य उत्तम रहे, शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर अभ्युदय हो, बन्धु और मित्रों से युक्त हो। लोकप्रिय और सुखी हो। बृहस्पति और शनि सप्तम में हो तो देखने में आकर्षक न हो। ऐसा जातक शूरवीर किन्तु व्यसनी (दुर्व्यसन संलग्न) और दुष्ट होता है। पिता का धन प्राप्त करने का लोभी तथा बुद्धि रहित होता है। यदि यह युति लग्न से दशम में हो, राजा का प्रिय या स्वयं ही राजा हो, सन्तान थोड़ी हों किन्तु गायें और वाहन अनेक हों।
शुक्र और शनि की युति
    जातक पारिजात के अनुसार शुक्र और शनि की यदि युति हो तो अनेक पशुओं का स्वामी और मल्ल (पहलवान) हो। वराहमिहिर के मत से अल्पदृष्टि हो (पास की वस्तु को बारीकी से देखना अल्पदृष्टि है) युवतियों के आश्रय से धन वृद्धि हो। लिपि (लिखना, नक्काशी आदि) पुस्तकों का तथा चित्रों का जानकार होता है। सारावली के मत से लकड़ी की चिराई फड़ाई में कुशल, छुरे (उस्तरे का काम हजामत आपरेशन आदि) चित्र पत्थर के शिल्प कार्य (संगतराशी, मूर्ति निर्माण कार्य) पहलवानी आदि में निपुण होता है।
केन्द्र योग
    यदि शुक्र तथा शनि का योग केन्द्र में हो तो सारावली के अनुसार फल लिखती हूँ। यदि लग्न में इन दोनों ग्रहों की युति हो तो सुन्दर शरीर हो, द्दनवान भोगी और सुख के साधनों से समन्वित होता है। बहुत से भृत्य होते हैं, व्यभिचारी होता है। ऐसा जातक धन भोग आदि होने पर भी शोक से संतप्त होता है। यदि यह युति चतुर्थ में हो तो मित्रों से धन प्राप्ति हो, बन्धुओं से सत्कार, उपकार की प्राप्ति हो। राजा उसका सम्मान करता है। यह दोनों ग्रह यदि लग्न से सप्तम में हो तो जातक को विषय-लाभ, अनेक अच्छी स्त्रियों से सम्पर्क, सुख, धन, कीर्ति और विभूति प्राप्त होती है। यदि यह युति दशम में हो तो जातक सर्व दर्शन विमुक्त, लोक में विख्यात् उच्चपद प्राप्त करता है।
    यह लेख लिखने में मैंने अपने पूज्य पिता जी द्वारा लिखे जा रहे ज्योतिष शास्त्र के महान ग्रन्थ ‘ज्योतिष ज्ञान दर्शन’ और पिता जी के गुरूवत् रहे ब्रह्मलीन त्रिष्कन्ध ज्योतिषाचार्य पं. सीताराम झा जी के द्वारा रचित ग्रन्थ मानसागरी और फलदीपिका तथा अन्य ग्रन्थों का सहारा ले कर लिखा है। आशा है कि इस पंचांग के पाठकों को यह पसन्द आयेगा, इस लेख पर अपने विचार/सुझाव आप astroworldindia.com@gmail.com या astroworldindia@hotmail.com पर भेज सकते हैं..... ऋद्धि विजय त्रिपाठी