ज्योतिष-शास्त्र में योगों का बहुत महत्व बताया गया है, एक कहावत है कि ‘मंदिर में भोग, अस्पताल में रोग और ज्योतिष में योग का अपना एक अलग महत्व है।’
जिस प्रकार से विभिन्न चीजों को आपस में एक विशेष अनुपात में मिलाने से सुस्वादु व्यंजनादि (भोजनादि) तैयार होते हैं, ठीक उसी प्रकार दो या अद्दिक ग्रहों के संयोग से विशेष योग बनता है, जिसका विशेष महत्व जातक के जीवन में पड़ता है। यहाँ पंच महापुरूष योगों एवं ग्रहों की युति से बनने वाले कुछ विशेष योगों पर एक लेख प्रस्तुत कर रही हूँ।
यदि मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र या शनि अपनी उच्च राशि या मूल त्रिकोण या स्वराशि में स्थित होकर लग्न से केन्द्र (1, 4, 7, 10) में हो तो महापुरूष योग होता है। यदि मंगल उपयुक्त प्रकार से योग करे तो रूचक, बुध करे तो भद्र, बृहस्पति से हंस, शुक्र योगकारक हो, तो मालव्य और शनि अपनी मूल त्रिकोण या उच्च राशि में स्थित केन्द्र में हो तो शश योग होता है। इस में मंत्रेश्वर का कथन है कि, उपयुक्त योग केवल लग्न से केन्द्र में स्वोच्च स्व-राशिस्थ मंगल आदि के होने से तो होता ही है, यदि लग्न से केन्द्र में न हो अपितु चन्द्रमा से केन्द्र में उच्चस्थ स्वराशिस्थ मंगल, बुध आदि पांचों ग्रहों में से केन्द्र में हो तो भी महापुरूष योग होता है। शोध के उपरान्त भी ऐसा फल दिखता है। मानसागरी के मत से मंगल आदि उच्च या स्वराशि में, लग्न से केन्द्र में हो तभी रूचक आदि महापुरूष योग होता है परन्तु यह भी लिखा है कि यदि उपर्युक्त योगकारक (मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र या शनि जो योग बना रहा हो) ग्रह के साथ सूर्य या चन्द्रमा हो तो महापुरूष योग भंग हो जाता है और इस योग का जो विशिष्ट फल लिखा है वह नहीं होता, केवल साधारण अच्छा फल होता है।
केन्द्रोच्चगा यद्यपि भूसुताद्या मार्तण्डशीतांशुयुता भवन्ति।
कुर्वन्ति नोर्वीपतिमात्मपाके यच्छन्ति ते केवल सत्फलानि।।
सारावली ( त्रिष्कन्ध ज्योतिषाचार्य ब्रह्मलीन पं. सीताराम झा कृत, उल्लेखनीय है कि मेरे पिता जी इनको शुरूआत से ही गुरूवत मानते रहे हैं) अध्याय 24 में पंच महापुरूष योग दिए गए हैं। बलरहितेन्दुरविभ्यां युक्तैर्भौमादिभिर्ग्रहैर्मिश्राः।
न भवन्ति महीपाला दशासु तेषां सुतार्थसंयुक्ताः।।
वराहमिहिर ने भी इन योगों की विवेचना की है। जिसका संकलन मैने किया है।
अब सर्वप्रथम रूचक योग का फल लिखती हूँ।
रूचक योग (मंगल-जनित)
जातः श्री रूचके बलान्वितवपुः श्रीकीर्तिशीलान्वितः
शास्त्री मन्त्रजपाभिचार कुशलो राजाऽथवा तत्समः।
लावण्यारूणकान्तिकोमलतनुस्त्यागी जितारिर्धनी
सप्तत्यब्दमितायुषा सह सुखी सेनातुर¯धिपः।
रूचक योग में उत्पन्न व्यक्ति बलान्वित शरीर, लक्ष्मी (श्री शब्द मूल में आया है इससे शरीर सौष्ठव तथा कान्ति युक्त, यह अर्थ भी लिया जा सकता है), शास्त्री (शास्त्र निष्णात), मंत्रों के जप और अभिचार में कुशल, राजा या राजा के समान, लावण्य युक्त शरीर, लालिमायुक्त, कोमल तन, शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने वाला, त्यागी, धनी 70 वर्ष की आयु प्राप्त करने वाला, सुखी, सेना और घोड़ों का स्वामी होता है।
अखण्ड साम्राज्य योग- यदि (1) नवमेश, लाभेश, धनेश (द्वितीय नवम या एकादश) के स्वामी में से कोई एक भी ग्रह चन्द्रमा से केन्द्र में हो और स्वयं गुरू (बृहस्पति) ग्यारहवें घर का स्वामी हो, और ऐसे गुरू की एकादश भाव में दृष्टि हो तो ऐसा जातक अखण्ड साम्राज्य का स्वामी होता है। फलदीपिका में जो पाठ है, उसमें तृतीय चरण में ‘स्वयं च के स्थान में ‘स्वपुत्र’ है-जिसका अर्थ हो जायेगा कि ‘यदि बृहस्पति, पंचम या एकादश का स्वामी हो। योग अच्छा है द्वितीयेश, नवमेश या लाभेश चन्द्रमा से केन्द्र में हो तो धनकारक, भाग्यकारक है परन्तु अखण्ड साम्राज्य पतित्व-इस योग का उत्कृष्ट फल केवल अतिशयोक्ति है, क्योंकि यह योग (सम्पूर्ण) मेरे पिता जी की कुण्डली में है, मगर अखण्ड साम्राज्यपतित्व जैसा कुछ दिखता नहीं, हाँ नाम ( सम्पूर्ण हिन्दी भाषी जगत में ) अवश्य प्रसिद्ध है, लेकिन धन के मामले में तो विशेष नहीं कहा जा सकता।
भद्र योग (बुध-जनित)
इस योग में उत्पन्न मनुष्य का सिंह के समान चेहरा, हाथी के समान गति, पुष्ट जाँघे, उन्नत वक्षस्थल होता है। उसके बाहु लम्बे गोल और पुष्ट होते हैं और उन्हीं के समान उसका मान होता है। मान क्या? यदि मनुष्य दोनों बाहुओं को फैला कर खड़ा हो तो एक हाथ की मध्यमा अंगुलि के अंत से दूसरे हाथ की मध्यमा अंगुलि के अन्त तक जितनी लम्बाई हो उतनी ही यदि जातक की ऊँचाई हो तो मनुष्य बहुत विशिष्ट पदवी प्राप्त करता है।
स्कन्दपुराण में लिखा है कि कुसुम से रंगे हुए सूत की तीन लड़ करें और गणेशादि का भक्तिपूर्वक स्मरण कर उत्तराभिमुख दोनों भुजा और हाथ फैला कर खड़े हो जाइये, अर्थात् उत्तर की ओर मुख कर खड़े हुए आदमी का दाहिना हाथ पूर्व की ओर,और बायां हाथ पश्चिम की ओर कंधे के समतल फैला हुआ होगा, दाहिने हाथ की मध्यांगुली (बीच की उंगली) के अन्त से बांये हाथ के बीच की उंगली तक नापे यदि यह ऊँचाई के बराबर हो तो ऐसा मनुष्य श्रेष्ठ अधिकारी होता है।
भद्र योग में उत्पन्न व्यक्ति, मानी, बन्धु जनों के उपकार में निपुण, विपुल प्रज्ञा, यश, धन वाला होता है 80 वर्ष की आयु होती है।
हंस योग (गुरू-जनित)
जो हंस योग में जन्म ले उसका मुख (ओष्ठ, तालु जिह्ना) लाल, ऊँची नाक, अच्छे चरण, हंस के समान स्वर, कफ प्रधान प्रकृति, गौर वर्ण, सुकुमार (कोमलांगी) पत्नी, कामदेव के समान सुन्दर सुखी, शास्त्र ज्ञान में अति निपुण, साद्दु (उत्तम) कार्य और आचार वाला होता है और 84 वर्ष की आयु होती है। अघरोष्ठ जिह्ना, तालू का लाल होना सुख और सौभाग्य का लक्षण माना जाता है।
मालव्य योग (शुक्र-जनित)
जिसका मालव्य योग में जन्म हो उसकी स्त्री के समान चेष्टा (हाथ मटकाना, चलना लज्जा आदि), शरीर संद्दियां ललित (मृदु और सुन्दर), सुन्दर आकर्षक नेत्र, सौन्दर्य युक्त शरीर, गुणी (अनेक सद्गुण सम्पन्न), तेजस्वी स्त्री पुत्र वाहन (सवारी से युक्त) धनी, शास्त्रों का अर्थ जानने वाला पण्डित (विद्वान्), उत्साहयुक्त, प्रभुता शक्तिसम्पन्न (औरों को आज्ञा देने वाला अधिकारी), मंत्रवेत्ता, पत्रकार, साहित्यानुरागी, चतुर, त्यागी, पर स्त्रीरत (दूसरे की स्त्रियां में आसक्त) होता है 80 वर्ष तक जीता है।
शश योग (शनि जनित)
जो इस योग में उत्पन्न हो वह राजा या राजा के समान वन और पर्वतों में रहने या घूमने वाला, सेनापति (अर्थात् उसके अधीन बहुत आदमी हों) क्रूर बुद्धि, धातु (लोहा, पीतल, चांदी सोना) के वाद विवाद में विनोद करने वाला और ठगने वाला (भावार्थ है कि धातु का काम करें और बेईमानी से कमावे), दाता (देने वाला), जिसकी दृष्टि में क्रोद्द हो, तेजस्वी अपनी माता का भक्त, शूर, श्यामवर्ण, सुखी, जार क्रिया (परस्त्री से मैथुन कार्य) स्वभाव वाला होता है और सत्तर वर्ष की आयु होती है। महापुरूष योग समाप्त।
चन्द्रमा के साथ अन्य ग्रहों की युति का फल
(1) यदि चन्द्रमा और मंगल एक साथ हो तो जातक शूरवीर सत्कुलोचित धर्म पालन करने वाला, धनी और गुणवान होता है। वराहमिहिर के मत से जातक कूट मारणोच्चाटनादि प्रयोग में निष्णात, स्त्री, आसव कुंभ आदि का क्रय-विक्रय (या गिरवी रखना) शील होता है। कूट का अर्थ नीतिपरक भी हो सकता है। माता के लिये यह योग अकल्याणकारी है। सारावली के अनुसार जातक शूर, रण में प्रतापी, मल्ल (युद्ध या कुश्ती करने वाला) मृत्तिका चर्म या धातु के (कूट का अन्य अर्थ) शिल्प में दक्ष होता है कि रक्त रोग के कारण शरीर में वेदना रहती है। पृथुयशस् के अनुसार चन्द्रमा और मंगल लग्न, पंचम नवम, दशम या एकादश में हो तो धनवान् और राजा के समान होता है। यदि यह योग अन्य स्थान में हो तो बन्धुओं के सुख से हीन हो।
(2) यदि चन्द्रमा और बुध एक साथ हों तो द्दार्मिक, शास्त्रज्ञ और तदनुसार कार्य और व्यवहार करने वाला, अद्भुत गुणों (या अनेक प्रकार के गुणों से) युक्त होता है। वराहमिहिर के अनुसार मीठे वचन बोलने वाला, अर्थनिपुण, सौभाग्यशाली, यशस्वी होता है। सारावली के अनुसार जातक काव्य तथा कथाओं में अति निपुण, द्दनी स्त्री सम्मत (स्त्रियां जिसको पसन्द करें) सुरूप युक्त, हंसमुख (हमारा अनुभव है कि जातक मजाकिया भी होता है) और विशिष्ट गुणों से युक्त होता है।
(3) यदि चन्द्रमा और बृहस्पति का योग हो तो जातक साद्दुजनावलम्बी और अत्यन्त मतिमान् (मति में वृद्धि, विवेक आदि का समावेश हो जाता है) होता है, वराहमिहिर के अनुसार जातक विक्रान्त, अपने कुल में मुख्य अति स्थिर मति वाला और अत्यन्त धनी होता है। सारावली के अनुसार देवता और ब्राह्मणों की पूजा और सत्कार में रत, शुभशील, दृढ़, मित्रता निभाने वाला, अपने बन्द्दुओं का सम्मान करने वाला और अत्यन्त धनी हो। पृथुयशस् के अनुसार कि जातक, विनीत, स्त्री, पुत्र सहित (अर्थात इनका सुख हो) और धनी होता है किन्तु यह योग लग्न से तृतीय या षष्ठ में हो या चन्द्रमा और बृहस्पति इन दोनों ग्रहों में कोई नीच (यदि यह युति वृश्चिक/मकर में हो) हो तो शुभ नहीं होता है।
(4) यदि चन्द्रमा और शुक्र का योग हो तो जातक क्रय-विक्रय (खरीद-फरोख्त) में कुशल किन्तु पापात्मा होता है। वराहमिहिर के मत से वस्त्रों के क्रय आदि में कुशल होता है। सारावली के अनुसार क्रय-विक्रय कुशल, अत्यन्त आलसी होता है। पृथुयशस् के अनुसार जातक धनाध्यक्ष होता है और यदि यह योग लग्न से दशम या द्वादश भाव में हो तो विदेश से धन प्राप्ति।
(5) यदि चन्द्रमा और शनि की युति हो तो जातक कु-स्त्री (जो स्त्री अच्छी न हो) का पुत्र होता है। जातक अपने पिता का दूषक होता है (अपने पिता की निन्दा करता है या अपने आचरण से पिता के कुल को दोष लगाता है) और उसका धन नष्ट हो जाता है, (लेकिन अन्य ग्रहों का योग देखना भी आवश्यक है)। वराहमिहिर के मत से जातक पुनर्भूसुत होता है। जिस स्त्री का द्वितीय बार विवाह हो उसे पुनर्भूसुत कहते हैं। सब जातियों में स्त्री का पुनर्विवाह प्रचलित नहीं है, इस कारण रुद्रभट्ट के अनुसार उसकी माता जारादि से उपभुक्त हो। सारावली के अनुसार जातक (अपने वय से) अधिक वय की स्त्रियों से रमण करता है, हाथी, घोड़ों का पालन करता है या उनको शिक्षा देता है, अब हाथी, घोड़े तो इतने रहे नहीं, इसलिये मोटर, स्कूटर, ट्रक, टैम्पो, इंजन, जहाज, हवाई जहाज, कल कारखानों में मशीन चलाने वाला या उस तत्व से सम्बन्धित व्यवसाय में लगा हुआ यहाँ यह अर्थ लेना होगा)। ऐसा जातक सौशील्यादि गुण रहित, पराजित, धन रहित होता है। दूसरे की मातहती में कार्य करता है। पृथुयशस् के अनुसार जातक दुर्बल देह युक्त अति नीच कार्य करने वाला, मातृद्वेषी (अपनी माता से बैर करने वाला) और बुद्धिहीन होता है किन्तु यदि यह युति लग्न से तृतीय, षष्ठ, दशम या एकादश में हो तो जातक सर्वसम्पन होता है।
केन्द्र में योग
अब चन्द्रमा यदि किसी ग्रह के साथ केन्द्र में युति करे तो सारावली में जो विशेष फल कहा है, उससे पाठकों को अवगत कराया जाता है।
(1) यदि चन्द्रमा और मंगल की युति लग्न में हो तो रक्त, अग्नि, और पित्त रोगों से पीड़ित हो। जातक राजा होता है किन्तु उसके स्वभाव में तीक्ष्णता होती है। यदि यह युति लग्न से चतुर्थ में हो तो जातक विकल, क्लेश युक्त, द्रव्यहीन, सुख, सुत धन और बन्धु इनसे हीन होता है। यदि चन्द्र और मंगल सप्तम में हो तो जातक क्षुद्र, दूसरे का धन प्राप्त करने का लोभी, बहुत प्रलाप करने वाला, ईर्ष्या युक्त, मिथ्यावादी हो। दशम में यदि यह युति हो तो हाथी और घोड़ां और सेना से युक्त, सम्पन्न, और विशेष विक्रमशाली होता है।
(2) यदि चन्द्रमा और बुध लग्न में योग करें तो सुखी, बुद्धिमान् देखने में सुन्दर, अत्यन्त निपुण और वाचाल हो। यदि यह युति चतुर्थ में हो तो जातक सुन्दर, सुवर्ण, अश्व रत्नों का स्वामी हो। उसके बन्धु, मित्र, सुत हों। ऐसा जातक प्रतापी और सुखी हो, यदि यह दोनों ग्रह लग्न से सप्तम में हो तो जातक का ललित शरीर हो। वह सत्कवि (काव्य कला युक्त अथवा बुद्धिमान्) विख्यात् और प्रतापी होता है। ऐसा जातक राजा हो या राजा का विशेष कृपापात्र हो। यदि यह योग दशम में हो जातक मानी, द्दनवान् और अति विख्यात हो। राजा का मंत्री हो किन्तु अपने जीवन के अंत में दुःखी हो, और सम्भव है कि उसके बन्धु उसे छोड़ दें।
(3) यदि चन्द्रमा और बृहस्पति की युति लग्न में हो तो विस्तृत और उच्च वक्षस्थल युक्त, अच्छे शरीर से युक्त बहुत मित्रों पुत्रों और स्त्रियों वाला (पहिले अनेक पत्नियों का होना या अनेक स्त्रियों का भोग सुख और सौभाग्य का लक्षण माना जाता था), बन्धुओं से युक्त राजा होता है। यदि यह युति लग्न से चतुर्थ में हो तो राजा के समान मंत्री, महावैभवशाली, बहुत शास्त्रों का ज्ञाता निर्मल बुद्धि युक्त, बन्धओं से समन्वित होता है। चन्द्रमा और बृहस्पति की युति यदि सप्तम स्थान में हो तो जातक कला कुशल, व्यापार करने वाला, धनवान् निर्मल, राजा का कृपापात्र या स्वयं राजा अत्यन्त बुद्धिमान् हो। यदि दशम भाव में यह युति हो तो प्रलम्ब बाहु (लम्बे बाहु होना सौभाग्य और अधिकार का सूचक है) ऐसा जातक विद्वान धनी और दानशील होता है और सम्मान तथा कीर्ति पाता है।
(4) यदि चन्द्रमा और शुक्र की युति लग्न में हो तो सुन्दर शरीर हो, गुरूजन उससे प्रसन्न रहें। सुन्दर वस्त्र, पुष्पमाला, सुगन्धि युक्त पदार्थों का सेवन करे (अर्थात् शौकीन हो)। वेश्या और स्त्रियों और परिवार से सुख हो। नौका या जहाजों (जलयानों) से या इनके माध्यम से लाए गये पदार्थों से धन की प्राप्ति हो। जातक जनप्रिय और भोग सम्पन्न होता है। चन्द्र और शुक्र यदि सप्तम में हो तो जातक बहुत सी युवतियों में रत हो, बहुत द्दन नहीं होता न बहुत पुत्र संतान होते हैं। कन्याएं अधिक होती हैं। राजा के समान (भोगशील) चरित्र वाला और मेधावी हो। यदि यह युति दशम में हो तो जातक के अधीन बहुत से आदमी होते हैं, वह उच्च, सम्मानित अद्दिकारी (हुकूमत करने वाला) विख्यात, मंत्री या राजा, वैभव युक्त होता है। वह क्षमावान् होता है।
(5) यदि चन्द्र और शनि की युति लग्न में हो तो जातक दास (मातहती में काम करने वाला) कर्म करने वाला, दुष्ट, क्रोधी, लोभी, हीन छोटे दर्जे का काम, चरित्र या पद में छोटी कक्षा का)। ऐसे जातक अधिक निद्राशील, आलसी और पापी होते हैं। यदि यह दोनों ग्रह चतुर्थ में हो तो जल (जल में उत्पन्न या जल मार्ग से लायी या ले जायी गई वस्तुओं) से नौका, जहाज, मुक्ता, मणि, आदि से आजीविका उपार्जन करता है या खुदाई (खनन-मकान, बावड़ी, कूप, तालाब, बाँध, आदि की खुदाई या तेल, पेट्रोल, खनिज पदार्थों से सम्बन्द्दित खुदाई), पत्रकारिता से द्रव्य कमाता है। ऐसे जातक श्रेष्ठ होते हैं और लोग उनकी प्रशंसा करते हैं। यदि चन्द्र-शनि योग लग्न से सप्तम में हो तो जातक नगर, ग्राम या पुर में महान, राजा से सम्मानित होता है, किन्तु युवति हीन (स्त्री रहित, अर्थात विवाह न हो या पत्नी जीवित न रहे) होता है। यदि चन्द्र शनि युति दशम में हो तो नराधिप (राजा या जन समुदाय पर हुकूमत करने वाला) होता है, अपने शत्रुओं का दमन करने में ऐसे लोग अत्यन्त कुशल होते हैं, विख्यात हो, माता का सुख कम होता है।
मंगल की अन्य ग्रहों से युति
अब मंगल की अन्य ग्रहों से युति का फल कहते हैं। सर्वप्रथम जातक पारिजात का मत देखिये, तदन्तर अन्य आचार्यों का मत भी दिया जा रहा है। चन्द्र-मंगल युति पीछे लिखी हैं।
(1) यदि मंगल और बुध की युति हो तो वाग्मी, औषद्दि, शिल्प और शास्त्र में (या शिल्प शास्त्र में) कुशल होता है। वराहमिहिर के मत से मूल (नाल, पत्र, पुष्प, फल, वल्कल आदि), स्नेह (तैल, घृत, वसा, मज्जा-सम्प्रति, ग्रीज, वैसलीन, मोबिल आयल आदि भी) कूट (विविध द्दातुओं से मिश्रित जो वस्तुएं बनायी जाती हैं) आदि का व्यापार करता है और बाहु योद्धा (पहलवान, मल्ल कुश्ती लड़ने वाला) होता है। कूट से कूटनीतिज्ञ, सत्य, असत्य वचनों से अपना काम निकालने वाला जानना चाहिये, क्योंकि बुध वाणी का मुख्य कारक है। सारावली के अनुसार जातक की स्त्री अच्छी न हो, सोने, लोहे मशीनरी का काम करने वाला, दुष्ट स्त्री और विधवा जिसकी रखैल हो, तथा औषध क्रिया में निपुण (वैद्य, हकीम, डाक्टर, कम्पाउण्डर, केमिस्ट, ड्रगिस्ट, सर्जन आदि) होता है।
(2) यदि मंगल और बृहस्पति का योग हो तो कामी, पूज्य गुणान्वित और गणित शास्त्र का ज्ञानी होता है। वराहमिहिर के अनुसार मंगल सत्व तथा बृहस्पति (ज्ञान) के योग बल से नगर अध्यक्ष, सभासद, मेयर, पालिका चेयरमैन आदि हो, या राजा (या सरकार) से धन प्राप्त करता है। सारावली के मत से शिल्प, वेद तथा अन्य शास्त्रों में निष्णात् मेधावी, वाग्विशारद (वाणी-शूर), बुद्धिमान् और दीर्घायु, पुत्रवान् और विनीत होता है, किन्तु यदि यह युति लग्न से षष्ठ, अष्टम या द्वादश में हो तो व्यसनी, रोगी और कम धन, आलसी, निष्ठुर वाला हो।
(3) यदि मंगल और शुक्र एक साथ हो तो धातुओं (लोहा आदि) के कार्य में संलग्न, प्रपंच-रसिक (मायावी, सत्य असत्य का विचार न करने वाला) और कपटी होता है। वराहमिहिर के अनुसार गायों का पालन करने वाला, मल्ल (कुश्ती लड़ने वाला) शीघ्र कार्य-कर्त्ता कुशल, परदारा गमन में रूचिशील, जुआँ, सट्टा, रेस, लॉटरी, मटका आदि में रूपया लगान में अग्रणी होता है। पृथुयशस् के अनुसार जातक, चपल, स्त्री या स्त्रियों के वश में दुष्ट कर्म कर्ता होता है किन्तु यदि यह युति लग्न, चतुर्थ या दशम में हो तो वह अपने कुल की अपेक्षा अधिक उच्च स्थान प्राप्त करता है, या अपने ग्राम-शहर का नेता होता है।
(4) यदि मंगल और शनि की युति हो तो वादी, वकील, गान, विनोद, हँसी, मजाक, कौतुक का रचने वाला किन्तु प्रायः मन्दमति (बुद्धिमान कम) होता है। वराहमिहिर के अनुसार दुःख से पीड़ित, असत्य वाणी तथा मिथ्या व्यवहार शील तथा निन्दित होता है। सारावली के अनुसार धातु के कार्यों में कुशल, इन्द्रजाल में (जादूगरी) निपुण, धोखा देने वाला चोरी के कार्यों में चतुर, कलह प्रिय, शस्त्र या विष से पीड़ित, विधर्मी (अपने धर्म का पालन न करने वाला) होता है। पृथुयशस् के अनुसार मंगल और शनि की युति हो तो सदैव दुःखी (मानसिक या शारीरिक पीड़ायुक्त-विशेष कर वात और पित्त रोगों से) रहता है। किन्तु यदि यह युति लग्न से तृतीय, षष्ठ, दशम या एकादश भाव में हो तो विख्यात्, राजा के समान होता है और लोग उसे पसन्द करते हैं अर्थात् जन प्रिय होता है।
केन्द्र में योग
मंगल का अन्य ग्रहों के साथ यदि केन्द्र में योग हो तो सारावली में विशेष फल दिया गया है। अब मंगल का योग बुध, बृहस्पति, शुक्र या शनि के साथ केन्द्र में हो तो सारावली के अनुसार उसका फल नीचे है।
(1) मंगल और बुध की युति यदि लग्न में हो तो हिंसक (क्रूर, भयानक), अग्नि कर्म में कुशल (फैक्ट्री आदि जहाँ अग्नि का कार्य होता है) धातुओं का कार्य करने वाला, दूत, होता है और जो वस्तु गुप्त रखी जाती है, उनका अधिकारी होता है। यदि यह युति चतुर्थ में हो तो अपने परिवार जनों से निरादृत, तिरस्कृत, बन्धु-बान्धव से रहित या उनका विरोद्दी होता है किन्तु मित्र बहुत होते हैं और धन, अन्न, भोग-विलास, वाहन आदि से सम्पन्न होता है। यदि इन दोनों ग्रहों का योग लग्न से सप्तम में हो तो जातक की प्रथम स्त्री की मृत्यु या विच्छेद हो जाता है, विवाद प्रिय होता है, एक स्थान से दूसरे स्थान में जाता है। स्थायी रूप से एक स्थान में वास नहीं रहता, नीचों की मातहती, में काम करता है। यदि मंगल बुद्द युति दशम में हो तो सेना का अधिपति, शूर, शठ, दुष्ट स्वभाव, अति क्रूर होता है किन्तु द्दैर्य की मात्रा विशेष होती है, राजा का कृपा-पात्र होता है।
(2) यदि मंगल बृहस्पति की युति लग्न में हो तो मंत्री या अपने विशिष्ट गुणों के कारण प्रधान पद प्राप्त करे। सदैव उत्साही रहे और धार्मिक क्षेत्र में कीर्तियुक्त होता है। यदि इन दोनों ग्रहों की युति लग्न से चतुर्थ स्थान में हो तो जातक गुरू और देवताओं का भक्त होता है, राजा की सेवा करता है। बन्धु और मित्रों से सम्पन्न सुखी जीवन व्यतीत करता है। जिस जातक के सप्तम स्थान में मंगल बृहस्पति हो वह रण में शूरवीर होता है, पर्वत, किला, वन और नदी तट या समुद्र तट उसे प्रिय होते हैं। उसके अच्छे भाई-बन्धु होते हैं किन्तु पत्नी से कष्ट होता है अर्थात् (यह योग सप्तम में मंगल होने के कारण मंगलीक योग कारक है) पत्नी सुख के लिये हानिकारक है। यदि यह युति लग्न से दशम में हो तो विख्यात कीर्तिवाला हो, बहुत धनी और विस्तृत परिवार हो, कार्यों में बहुत दक्ष हो और राजा होता है।
(3) यदि मंगल और शुक्र की युति लग्न में हो तो जातक कुशील, निष्ठुर, नैतिकताहीन, वेश्यागामी होता है। दीर्घायु भी नहीं होता और स्त्रियों पर या स्त्रियों के लिये धन नष्ट करता है। यदि इन दोनों ग्रहों की युति चतुर्थ भाव में हो तो बन्धु पुत्र, और मित्रों से हीन होता है, मानसिक पीड़ा से कष्ट होता है। यदि इन दोनों ग्रहों का योग लग्न से सप्तम में हो तो स्त्री-लोलुप, कुचरित्रवान् आचारहीन होता है। स्त्रियों के कारण दुःख पाता है। यदि यह युति दशम में हो तो शस्त्र विद्या में निष्णात, बुद्धिमान, विद्या द्दन से युक्त, विख्यात पुरूष या राजमन्त्री होता है।
(4) यदि मंगल तथा शनि की युति लग्न में हो तो अल्पायु, (किन्तु मंगल या शनि लग्नाधिपति होकर लग्न में हो तो यह अशुभ दोष नहीं होगा यह बात ध्यान में रखना चाहिए), माता से द्वेष करता है, क्षीण भाग्य, संग्रामजयी होता है। यदि यह युति लग्न से चतुर्थ में हो तो पापकर्म में रत होता है। उसके स्वजन उसका त्याग कर देते हैं, मित्र नहीं होते, भोजन और सुख से रहित होता है अर्थात् सुखी नहीं होता। चतुर्थ भाव सुख स्थान है इस कारण क्रूर ग्रह की युति चतुर्थ स्थान में सुख की हानि करती है। यदि सप्तम में यह युति हो तो पत्नी के सुख से रहित, पुत्र के सुख से विरत, अल्प-धनी, रोगी, व्यसनी, कृपण, होता है।
बुध की अन्य ग्रहों से युति
बुध की सूर्य, चन्द्र या मंगल के साथ युति का फल पहले लिख चुकी हूँ। अब यदि बुध, बृहस्पति, शुक्र या शनि के साथ योग करे तो उसका फल कहते है।
(1) जातक पारिजात के अनुसार यदि बुध और बृहस्पति एक साथ हो तो जातक वाग्मी, सारपूर्ण वक्ता, स्वरूपवान्, सद्गुणी और विशेष धनी होता है। वराहमिहिर के अनुसार संगीत प्रिय नृत्य-प्रिय, रंगकर्मी, नाटक, सिनेमा आदि की वृत्ति से धनोपार्जन करने वाला होता है। सारावली के मत से जातक सुखी, विद्वान, मतिमान, गाने बजाने, नृत्य आदि का ज्ञाता होता है। पृथुयशस् के अनुसार बुध-बृहस्पति की युति से जातक बहरा, नेत्र रोग से पीड़ित, पर विद्वान होता है, यदि यह युति लग्न से छठे, आठवें या बारहवें घर में हो तो सुन्दर, धार्मिक और विख्यात् होता है।
(2) यदि बुध और शुक्र की युति हो तो शास्त्रज्ञ, गान, विनोद तथा हास्य का रसिक होता है। वराहमिहिर के अनुसार वाग्मी, व्यक्तियों के समूह का पालक होगा। रुद्रभट्ट के अनुसार यदि बुध और शुक्र दोनों बलवान् हो तो भूमि-पति या सेनापति होगा। सारावली के अनुसार जातक अतिशय धनी, नीतिज्ञ, शिल्पवान्, वेदों का विद्वान अच्छे सारपूर्ण और मधुर वचन बोलने वाला, गीतज्ञ, हंसी-मजाक में निपुण होता है।
(3) यदि बुध और शनि की युति हो तो विद्वान उच्च पदारूढ़, धार्मिक मायावी (मिथ्याचरण का आश्रय लेकर, दूसरों के मन में भ्रम पैदा करने वाला) और शास्त्रीय वृत्ति तथा लोक वृत्ति का उल्लंघन करने वाला होता है। सारावली के अनुसार जातक ऋणवान पाठान्तर से गुणवान् भी, दाम्भिक, प्रपंची, सत्कवि, घूमने का शौकीन, निपुण तथा मोहक वक्ता होता है।
केन्द्र में योग
(1) बुध-बृहस्पति युति यदि लग्न में हो तो शुभ स्वरूप, सौशील्यादि गुण सम्पन्न, विद्वान, राजाओं से सम्मानित, अनेक भोगों का भोक्ता, वाहन युक्त, सुखी और भोगी होता है। यदि यह युति चतुर्थ स्थान में हो तो राजा का कृपा पात्र, स्त्री मित्रों बन्धुओं से सम्पन्न, सौभाग्यशाली धनी और सुखी होता है। यदि बुध-बृहस्पति योग सप्तम में हो तो अच्छी पत्नी का स्वामी सत्व (साहस, पुरूषार्थ बल) सम्पन्न होता है, शत्रुओं पर विजय प्राप्त हो, धनी, बहुत परिजनों और मित्रों से युक्त और अपने पिता की अपेक्षा बहुत उच्च पद, मान-प्रतिष्ठा आदि में होता है। यदि इन दोनों ग्रहों की युति लग्न से दशम में हो तो राजा या मंत्री हो, उसका बहुत सम्मान हो, हुकूमत करे, धनी और विद्वान हो, उसकी बहुत ख्याति होती है।
(2) यदि बुध और शुक्र की युति लग्न में हो तो सुन्दर और स्वस्थ हो, ब्राह्मणों और देवताओं का भक्त हो, स्वयं विद्वान और राजा से सम्मानित होता है। ऐसा व्यक्ति विख्यात और प्रशंसनीय होता है। यदि यह युति लग्न से चतुर्थ में हो तो सुन्दर शरीर हो मित्र, पुत्र बन्धओं से युत हो। ऐसा व्यक्ति, कल्याण, सम्पन्न (शुभगुण, सम्पत्ति युक्त) राजा या राजा का मंत्री हो। यह युति सप्तम में होने से बहुत सी सुन्दर स्त्रियों से रति-सुख होता है।
(3) यदि बुध और शनि की युति लग्न में हो तो मलिन शरीर, पापी, विद्या, धन और वाहन से हीन, अल्पायु और मन्द भाग्य, होता है। चतुर्थ में यह युति होने से, भोजन पेय, तथा बन्धुओं से रहित मूढ़, स्वजनों से तिरस्कृत, पापकर्मी होता है उसके मित्र कम हों। सप्तम में यदि इन दोनों ग्रहों का योग हो तो अति मलिन होता है, न साधु होता है, न परोपकारी अर्थात दुष्ट होता है। मिथ्यावादी होता है, किन्तु इन दोनों ग्रहों का योग यदि लग्न से दशम में हो तो अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करे, ब्राह्मणों, गुरूओं तथा देवताओं में श्रद्धा रखे, स्वजनों तथा मित्रों से युक्त, वाहनों का स्वामी, धन से सम्पन्न होता।
बृहस्पति की अन्य ग्रहों की युति
अब बृहस्पति की शुक्र तथा शनि से युति का फल कहते हैं। बृहस्पति की अन्य ग्रहों से युति पहले लिख चुकी हूँ।
(1) जातक पारिजात के अनुसार यदि बृहस्पति और शुक्र की युति हो तो तेजस्वी, राजा का प्रिय, अत्यन्त बुद्धिमान् और शूरवीर होता है। वराहमिहिर के मत से जातक सज्जन, विद्वान् अनेक गुण सम्पन्न, धनी और पत्नी सुख सम्पन्न होता है। सारावली के अनुसार जातक की विशिष्ट (उत्कृष्ट धन कुलादि के कारण या सौन्दर्य सौशील्य विद्यादि गुण सम्पन्न) पत्नी हो, प्रामाणिक बात बोलने वाला और जिसमें विश्वास किया जा सके विशेष रूप से धार्मिक, विद्या से धन उपार्जन करने वाला होता है।
(2) यदि बृहस्पति और शनि एक साथ हों तो शिल्प शास्त्र में निपुण हो। वराहमिहिर के मत से नापित (नाई) का काम करने वाला, कुम्हार या अन्न दान कर्म तत्पर होता है। रुद्रभट्ट के अनुसार नाई या कुम्हार के काम में कुशल हो (शनि के संयोग से कर्म कुशलता दिखलायी और अन्न दान कर्म कर्तव्य से सद्गुणातिरेक कहा गया है।
सारावली के अनुसार जातक शूर धन समृद्ध, यशस्वी, श्रेणि, सभा, ग्राम, संघ आदि का प्रद्दान होता है। किसी कार्य विशेष के करने वालों के समुदाय को श्रेणि कहते हैं। पृथुयशस् के अनुसार यदि अनुपचय (लग्न, द्वितीय, चतुर्थ, पंचम, सप्तम, अष्टम, नवम या द्वादश) स्थान में बृहस्पति और शनि का योग हो तो मान और धन से हीन होता है।
केन्द्र में योग
लग्न, चतुर्थ, सप्तम या दशम, में बृहस्पति शुक्र या बृहस्पति शनि के युति का विशेष फल सारावली में कहा है। वह लिख रही हूँ।
(1) यदि बृहस्पति और शुक्र की युति लग्न में हो तो राजा के समान भूमि-पति होता है। चतुर्थ में यह युति होने से देव गुरू, द्विजों की अर्चना करता है। अपने कुटुम्बीजनों-आत्मीयों मित्रों से युक्त धन सम्पन्न होता है। उसके अनेक वाहन होते हैं और शत्रुओं को परास्त करता है। यदि बृहस्पति शुक्र का योग सप्तम में हो तो अच्छी पत्नी प्राप्त हो, धन और रत्नों का स्वामी, सुखी और भोगवान होता है, उत्कृष्ट वाहन (सवारी रथ, घोड़े, हाथी, पालकी सम्प्रति मोटर आदि) होते हैं और विख्यात होता है, (यह योग मेरे पिता जी की कुण्डली में स्पष्ट है, मगर नाम अवश्य प्रसिद्ध है, लेकिन धन-मोटर आदि के मामले में उत्कृष्ट तो नहीं कहा जा सकता, हाँ अपने कार्य-व्यापार के सिलसिले में जब वे अपने भक्तों आदि के साथ बाहर जाते हैं, तब तो एक से एक बड़े वाहन (यहाँ तक कि बी.एम.डब्ल्यू, मर्सिडीज, लैंड-क्रूजर, हवाई जहाज आदि तक का सुख काफी कुछ उन्हें मिलता है, हाँलांकि 1 मारूति 1 कॉन्टेसा 1 अम्बेसडर 1 फियेट, 1 रॉयल इन्फील्ड वे रख चुके हैं जिसमें वर्तमान् समय में 1 मारूति 1 कॉन्टेसा ही है, जिसमें कॉन्टेसा तो नगण्य ही मानी जायगी, का सुख भोगते हैं)। यदि यह युति दशम में हो तो बहुत से सेवक हों, अद्दिक सम्पन्न (द्दनी) हों, तथा गुण से समन्वित होता है।
ज्योतिष-शास्त्र में योगों का बहुत महत्व बताया गया है, एक कहावत है कि ‘मंदिर में भोग, अस्पताल में रोग और ज्योतिष में योग का अपना एक अलग महत्व है।’
जिस प्रकार से विभिन्न चीजों को आपस में एक विशेष अनुपात में मिलाने से सुस्वादु व्यंजनादि (भोजनादि) तैयार होते हैं, ठीक उसी प्रकार दो या अद्दिक ग्रहों के संयोग से विशेष योग बनता है, जिसका विशेष महत्व जातक के जीवन में पड़ता है। यहाँ पंच महापुरूष योगों एवं ग्रहों की युति से बनने वाले कुछ विशेष योगों पर एक लेख प्रस्तुत कर रही हूँ।
यदि मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र या शनि अपनी उच्च राशि या मूल त्रिकोण या स्वराशि में स्थित होकर लग्न से केन्द्र (1, 4, 7, 10) में हो तो महापुरूष योग होता है। यदि मंगल उपयुक्त प्रकार से योग करे तो रूचक, बुध करे तो भद्र, बृहस्पति से हंस, शुक्र योगकारक हो, तो मालव्य और शनि अपनी मूल त्रिकोण या उच्च राशि में स्थित केन्द्र में हो तो शश योग होता है। इस में मंत्रेश्वर का कथन है कि, उपयुक्त योग केवल लग्न से केन्द्र में स्वोच्च स्व-राशिस्थ मंगल आदि के होने से तो होता ही है, यदि लग्न से केन्द्र में न हो अपितु चन्द्रमा से केन्द्र में उच्चस्थ स्वराशिस्थ मंगल, बुध आदि पांचों ग्रहों में से केन्द्र में हो तो भी महापुरूष योग होता है। शोध के उपरान्त भी ऐसा फल दिखता है। मानसागरी के मत से मंगल आदि उच्च या स्वराशि में, लग्न से केन्द्र में हो तभी रूचक आदि महापुरूष योग होता है परन्तु यह भी लिखा है कि यदि उपर्युक्त योगकारक (मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र या शनि जो योग बना रहा हो) ग्रह के साथ सूर्य या चन्द्रमा हो तो महापुरूष योग भंग हो जाता है और इस योग का जो विशिष्ट फल लिखा है वह नहीं होता, केवल साधारण अच्छा फल होता है।
केन्द्रोच्चगा यद्यपि भूसुताद्या मार्तण्डशीतांशुयुता भवन्ति।
कुर्वन्ति नोर्वीपतिमात्मपाके यच्छन्ति ते केवल सत्फलानि।।
सारावली ( त्रिष्कन्ध ज्योतिषाचार्य ब्रह्मलीन पं. सीताराम झा कृत, उल्लेखनीय है कि मेरे पिता जी इनको शुरूआत से ही गुरूवत मानते रहे हैं) अध्याय 24 में पंच महापुरूष योग दिए गए हैं। बलरहितेन्दुरविभ्यां युक्तैर्भौमादिभिर्ग्रहैर्मिश्राः।
न भवन्ति महीपाला दशासु तेषां सुतार्थसंयुक्ताः।।
वराहमिहिर ने भी इन योगों की विवेचना की है। जिसका संकलन मैने किया है।
अब सर्वप्रथम रूचक योग का फल लिखती हूँ।
रूचक योग (मंगल-जनित)
जातः श्री रूचके बलान्वितवपुः श्रीकीर्तिशीलान्वितः
शास्त्री मन्त्रजपाभिचार कुशलो राजाऽथवा तत्समः।
लावण्यारूणकान्तिकोमलतनुस्त्यागी जितारिर्धनी
सप्तत्यब्दमितायुषा सह सुखी सेनातुर¯धिपः।
रूचक योग में उत्पन्न व्यक्ति बलान्वित शरीर, लक्ष्मी (श्री शब्द मूल में आया है इससे शरीर सौष्ठव तथा कान्ति युक्त, यह अर्थ भी लिया जा सकता है), शास्त्री (शास्त्र निष्णात), मंत्रों के जप और अभिचार में कुशल, राजा या राजा के समान, लावण्य युक्त शरीर, लालिमायुक्त, कोमल तन, शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने वाला, त्यागी, धनी 70 वर्ष की आयु प्राप्त करने वाला, सुखी, सेना और घोड़ों का स्वामी होता है।
अखण्ड साम्राज्य योग- यदि (1) नवमेश, लाभेश, धनेश (द्वितीय नवम या एकादश) के स्वामी में से कोई एक भी ग्रह चन्द्रमा से केन्द्र में हो और स्वयं गुरू (बृहस्पति) ग्यारहवें घर का स्वामी हो, और ऐसे गुरू की एकादश भाव में दृष्टि हो तो ऐसा जातक अखण्ड साम्राज्य का स्वामी होता है। फलदीपिका में जो पाठ है, उसमें तृतीय चरण में ‘स्वयं च के स्थान में ‘स्वपुत्र’ है-जिसका अर्थ हो जायेगा कि ‘यदि बृहस्पति, पंचम या एकादश का स्वामी हो। योग अच्छा है द्वितीयेश, नवमेश या लाभेश चन्द्रमा से केन्द्र में हो तो धनकारक, भाग्यकारक है परन्तु अखण्ड साम्राज्य पतित्व-इस योग का उत्कृष्ट फल केवल अतिशयोक्ति है, क्योंकि यह योग (सम्पूर्ण) मेरे पिता जी की कुण्डली में है, मगर अखण्ड साम्राज्यपतित्व जैसा कुछ दिखता नहीं, हाँ नाम ( सम्पूर्ण हिन्दी भाषी जगत में ) अवश्य प्रसिद्ध है, लेकिन धन के मामले में तो विशेष नहीं कहा जा सकता।
भद्र योग (बुध-जनित)
इस योग में उत्पन्न मनुष्य का सिंह के समान चेहरा, हाथी के समान गति, पुष्ट जाँघे, उन्नत वक्षस्थल होता है। उसके बाहु लम्बे गोल और पुष्ट होते हैं और उन्हीं के समान उसका मान होता है। मान क्या? यदि मनुष्य दोनों बाहुओं को फैला कर खड़ा हो तो एक हाथ की मध्यमा अंगुलि के अंत से दूसरे हाथ की मध्यमा अंगुलि के अन्त तक जितनी लम्बाई हो उतनी ही यदि जातक की ऊँचाई हो तो मनुष्य बहुत विशिष्ट पदवी प्राप्त करता है।
स्कन्दपुराण में लिखा है कि कुसुम से रंगे हुए सूत की तीन लड़ करें और गणेशादि का भक्तिपूर्वक स्मरण कर उत्तराभिमुख दोनों भुजा और हाथ फैला कर खड़े हो जाइये, अर्थात् उत्तर की ओर मुख कर खड़े हुए आदमी का दाहिना हाथ पूर्व की ओर,और बायां हाथ पश्चिम की ओर कंधे के समतल फैला हुआ होगा, दाहिने हाथ की मध्यांगुली (बीच की उंगली) के अन्त से बांये हाथ के बीच की उंगली तक नापे यदि यह ऊँचाई के बराबर हो तो ऐसा मनुष्य श्रेष्ठ अधिकारी होता है।
भद्र योग में उत्पन्न व्यक्ति, मानी, बन्धु जनों के उपकार में निपुण, विपुल प्रज्ञा, यश, धन वाला होता है 80 वर्ष की आयु होती है।
हंस योग (गुरू-जनित)
जो हंस योग में जन्म ले उसका मुख (ओष्ठ, तालु जिह्ना) लाल, ऊँची नाक, अच्छे चरण, हंस के समान स्वर, कफ प्रधान प्रकृति, गौर वर्ण, सुकुमार (कोमलांगी) पत्नी, कामदेव के समान सुन्दर सुखी, शास्त्र ज्ञान में अति निपुण, साद्दु (उत्तम) कार्य और आचार वाला होता है और 84 वर्ष की आयु होती है। अघरोष्ठ जिह्ना, तालू का लाल होना सुख और सौभाग्य का लक्षण माना जाता है।
मालव्य योग (शुक्र-जनित)
जिसका मालव्य योग में जन्म हो उसकी स्त्री के समान चेष्टा (हाथ मटकाना, चलना लज्जा आदि), शरीर संद्दियां ललित (मृदु और सुन्दर), सुन्दर आकर्षक नेत्र, सौन्दर्य युक्त शरीर, गुणी (अनेक सद्गुण सम्पन्न), तेजस्वी स्त्री पुत्र वाहन (सवारी से युक्त) धनी, शास्त्रों का अर्थ जानने वाला पण्डित (विद्वान्), उत्साहयुक्त, प्रभुता शक्तिसम्पन्न (औरों को आज्ञा देने वाला अधिकारी), मंत्रवेत्ता, पत्रकार, साहित्यानुरागी, चतुर, त्यागी, पर स्त्रीरत (दूसरे की स्त्रियां में आसक्त) होता है 80 वर्ष तक जीता है।
शश योग (शनि जनित)
जो इस योग में उत्पन्न हो वह राजा या राजा के समान वन और पर्वतों में रहने या घूमने वाला, सेनापति (अर्थात् उसके अधीन बहुत आदमी हों) क्रूर बुद्धि, धातु (लोहा, पीतल, चांदी सोना) के वाद विवाद में विनोद करने वाला और ठगने वाला (भावार्थ है कि धातु का काम करें और बेईमानी से कमावे), दाता (देने वाला), जिसकी दृष्टि में क्रोद्द हो, तेजस्वी अपनी माता का भक्त, शूर, श्यामवर्ण, सुखी, जार क्रिया (परस्त्री से मैथुन कार्य) स्वभाव वाला होता है और सत्तर वर्ष की आयु होती है। महापुरूष योग समाप्त।
चन्द्रमा के साथ अन्य ग्रहों की युति का फल
(1) यदि चन्द्रमा और मंगल एक साथ हो तो जातक शूरवीर सत्कुलोचित धर्म पालन करने वाला, धनी और गुणवान होता है। वराहमिहिर के मत से जातक कूट मारणोच्चाटनादि प्रयोग में निष्णात, स्त्री, आसव कुंभ आदि का क्रय-विक्रय (या गिरवी रखना) शील होता है। कूट का अर्थ नीतिपरक भी हो सकता है। माता के लिये यह योग अकल्याणकारी है। सारावली के अनुसार जातक शूर, रण में प्रतापी, मल्ल (युद्ध या कुश्ती करने वाला) मृत्तिका चर्म या धातु के (कूट का अन्य अर्थ) शिल्प में दक्ष होता है कि रक्त रोग के कारण शरीर में वेदना रहती है। पृथुयशस् के अनुसार चन्द्रमा और मंगल लग्न, पंचम नवम, दशम या एकादश में हो तो धनवान् और राजा के समान होता है। यदि यह योग अन्य स्थान में हो तो बन्धुओं के सुख से हीन हो।
(2) यदि चन्द्रमा और बुध एक साथ हों तो द्दार्मिक, शास्त्रज्ञ और तदनुसार कार्य और व्यवहार करने वाला, अद्भुत गुणों (या अनेक प्रकार के गुणों से) युक्त होता है। वराहमिहिर के अनुसार मीठे वचन बोलने वाला, अर्थनिपुण, सौभाग्यशाली, यशस्वी होता है। सारावली के अनुसार जातक काव्य तथा कथाओं में अति निपुण, द्दनी स्त्री सम्मत (स्त्रियां जिसको पसन्द करें) सुरूप युक्त, हंसमुख (हमारा अनुभव है कि जातक मजाकिया भी होता है) और विशिष्ट गुणों से युक्त होता है।
(3) यदि चन्द्रमा और बृहस्पति का योग हो तो जातक साद्दुजनावलम्बी और अत्यन्त मतिमान् (मति में वृद्धि, विवेक आदि का समावेश हो जाता है) होता है, वराहमिहिर के अनुसार जातक विक्रान्त, अपने कुल में मुख्य अति स्थिर मति वाला और अत्यन्त धनी होता है। सारावली के अनुसार देवता और ब्राह्मणों की पूजा और सत्कार में रत, शुभशील, दृढ़, मित्रता निभाने वाला, अपने बन्द्दुओं का सम्मान करने वाला और अत्यन्त धनी हो। पृथुयशस् के अनुसार कि जातक, विनीत, स्त्री, पुत्र सहित (अर्थात इनका सुख हो) और धनी होता है किन्तु यह योग लग्न से तृतीय या षष्ठ में हो या चन्द्रमा और बृहस्पति इन दोनों ग्रहों में कोई नीच (यदि यह युति वृश्चिक/मकर में हो) हो तो शुभ नहीं होता है।
(4) यदि चन्द्रमा और शुक्र का योग हो तो जातक क्रय-विक्रय (खरीद-फरोख्त) में कुशल किन्तु पापात्मा होता है। वराहमिहिर के मत से वस्त्रों के क्रय आदि में कुशल होता है। सारावली के अनुसार क्रय-विक्रय कुशल, अत्यन्त आलसी होता है। पृथुयशस् के अनुसार जातक धनाध्यक्ष होता है और यदि यह योग लग्न से दशम या द्वादश भाव में हो तो विदेश से धन प्राप्ति।
(5) यदि चन्द्रमा और शनि की युति हो तो जातक कु-स्त्री (जो स्त्री अच्छी न हो) का पुत्र होता है। जातक अपने पिता का दूषक होता है (अपने पिता की निन्दा करता है या अपने आचरण से पिता के कुल को दोष लगाता है) और उसका धन नष्ट हो जाता है, (लेकिन अन्य ग्रहों का योग देखना भी आवश्यक है)। वराहमिहिर के मत से जातक पुनर्भूसुत होता है। जिस स्त्री का द्वितीय बार विवाह हो उसे पुनर्भूसुत कहते हैं। सब जातियों में स्त्री का पुनर्विवाह प्रचलित नहीं है, इस कारण रुद्रभट्ट के अनुसार उसकी माता जारादि से उपभुक्त हो। सारावली के अनुसार जातक (अपने वय से) अधिक वय की स्त्रियों से रमण करता है, हाथी, घोड़ों का पालन करता है या उनको शिक्षा देता है, अब हाथी, घोड़े तो इतने रहे नहीं, इसलिये मोटर, स्कूटर, ट्रक, टैम्पो, इंजन, जहाज, हवाई जहाज, कल कारखानों में मशीन चलाने वाला या उस तत्व से सम्बन्धित व्यवसाय में लगा हुआ यहाँ यह अर्थ लेना होगा)। ऐसा जातक सौशील्यादि गुण रहित, पराजित, धन रहित होता है। दूसरे की मातहती में कार्य करता है। पृथुयशस् के अनुसार जातक दुर्बल देह युक्त अति नीच कार्य करने वाला, मातृद्वेषी (अपनी माता से बैर करने वाला) और बुद्धिहीन होता है किन्तु यदि यह युति लग्न से तृतीय, षष्ठ, दशम या एकादश में हो तो जातक सर्वसम्पन होता है।
केन्द्र में योग
अब चन्द्रमा यदि किसी ग्रह के साथ केन्द्र में युति करे तो सारावली में जो विशेष फल कहा है, उससे पाठकों को अवगत कराया जाता है।
(1) यदि चन्द्रमा और मंगल की युति लग्न में हो तो रक्त, अग्नि, और पित्त रोगों से पीड़ित हो। जातक राजा होता है किन्तु उसके स्वभाव में तीक्ष्णता होती है। यदि यह युति लग्न से चतुर्थ में हो तो जातक विकल, क्लेश युक्त, द्रव्यहीन, सुख, सुत धन और बन्धु इनसे हीन होता है। यदि चन्द्र और मंगल सप्तम में हो तो जातक क्षुद्र, दूसरे का धन प्राप्त करने का लोभी, बहुत प्रलाप करने वाला, ईर्ष्या युक्त, मिथ्यावादी हो। दशम में यदि यह युति हो तो हाथी और घोड़ां और सेना से युक्त, सम्पन्न, और विशेष विक्रमशाली होता है।
(2) यदि चन्द्रमा और बुध लग्न में योग करें तो सुखी, बुद्धिमान् देखने में सुन्दर, अत्यन्त निपुण और वाचाल हो। यदि यह युति चतुर्थ में हो तो जातक सुन्दर, सुवर्ण, अश्व रत्नों का स्वामी हो। उसके बन्धु, मित्र, सुत हों। ऐसा जातक प्रतापी और सुखी हो, यदि यह दोनों ग्रह लग्न से सप्तम में हो तो जातक का ललित शरीर हो। वह सत्कवि (काव्य कला युक्त अथवा बुद्धिमान्) विख्यात् और प्रतापी होता है। ऐसा जातक राजा हो या राजा का विशेष कृपापात्र हो। यदि यह योग दशम में हो जातक मानी, द्दनवान् और अति विख्यात हो। राजा का मंत्री हो किन्तु अपने जीवन के अंत में दुःखी हो, और सम्भव है कि उसके बन्धु उसे छोड़ दें।
(3) यदि चन्द्रमा और बृहस्पति की युति लग्न में हो तो विस्तृत और उच्च वक्षस्थल युक्त, अच्छे शरीर से युक्त बहुत मित्रों पुत्रों और स्त्रियों वाला (पहिले अनेक पत्नियों का होना या अनेक स्त्रियों का भोग सुख और सौभाग्य का लक्षण माना जाता था), बन्धुओं से युक्त राजा होता है। यदि यह युति लग्न से चतुर्थ में हो तो राजा के समान मंत्री, महावैभवशाली, बहुत शास्त्रों का ज्ञाता निर्मल बुद्धि युक्त, बन्धओं से समन्वित होता है। चन्द्रमा और बृहस्पति की युति यदि सप्तम स्थान में हो तो जातक कला कुशल, व्यापार करने वाला, धनवान् निर्मल, राजा का कृपापात्र या स्वयं राजा अत्यन्त बुद्धिमान् हो। यदि दशम भाव में यह युति हो तो प्रलम्ब बाहु (लम्बे बाहु होना सौभाग्य और अधिकार का सूचक है) ऐसा जातक विद्वान धनी और दानशील होता है और सम्मान तथा कीर्ति पाता है।
(4) यदि चन्द्रमा और शुक्र की युति लग्न में हो तो सुन्दर शरीर हो, गुरूजन उससे प्रसन्न रहें। सुन्दर वस्त्र, पुष्पमाला, सुगन्धि युक्त पदार्थों का सेवन करे (अर्थात् शौकीन हो)। वेश्या और स्त्रियों और परिवार से सुख हो। नौका या जहाजों (जलयानों) से या इनके माध्यम से लाए गये पदार्थों से धन की प्राप्ति हो। जातक जनप्रिय और भोग सम्पन्न होता है। चन्द्र और शुक्र यदि सप्तम में हो तो जातक बहुत सी युवतियों में रत हो, बहुत द्दन नहीं होता न बहुत पुत्र संतान होते हैं। कन्याएं अधिक होती हैं। राजा के समान (भोगशील) चरित्र वाला और मेधावी हो। यदि यह युति दशम में हो तो जातक के अधीन बहुत से आदमी होते हैं, वह उच्च, सम्मानित अद्दिकारी (हुकूमत करने वाला) विख्यात, मंत्री या राजा, वैभव युक्त होता है। वह क्षमावान् होता है।
(5) यदि चन्द्र और शनि की युति लग्न में हो तो जातक दास (मातहती में काम करने वाला) कर्म करने वाला, दुष्ट, क्रोधी, लोभी, हीन छोटे दर्जे का काम, चरित्र या पद में छोटी कक्षा का)। ऐसे जातक अधिक निद्राशील, आलसी और पापी होते हैं। यदि यह दोनों ग्रह चतुर्थ में हो तो जल (जल में उत्पन्न या जल मार्ग से लायी या ले जायी गई वस्तुओं) से नौका, जहाज, मुक्ता, मणि, आदि से आजीविका उपार्जन करता है या खुदाई (खनन-मकान, बावड़ी, कूप, तालाब, बाँध, आदि की खुदाई या तेल, पेट्रोल, खनिज पदार्थों से सम्बन्द्दित खुदाई), पत्रकारिता से द्रव्य कमाता है। ऐसे जातक श्रेष्ठ होते हैं और लोग उनकी प्रशंसा करते हैं। यदि चन्द्र-शनि योग लग्न से सप्तम में हो तो जातक नगर, ग्राम या पुर में महान, राजा से सम्मानित होता है, किन्तु युवति हीन (स्त्री रहित, अर्थात विवाह न हो या पत्नी जीवित न रहे) होता है। यदि चन्द्र शनि युति दशम में हो तो नराधिप (राजा या जन समुदाय पर हुकूमत करने वाला) होता है, अपने शत्रुओं का दमन करने में ऐसे लोग अत्यन्त कुशल होते हैं, विख्यात हो, माता का सुख कम होता है।
मंगल की अन्य ग्रहों से युति
अब मंगल की अन्य ग्रहों से युति का फल कहते हैं। सर्वप्रथम जातक पारिजात का मत देखिये, तदन्तर अन्य आचार्यों का मत भी दिया जा रहा है। चन्द्र-मंगल युति पीछे लिखी हैं।
(1) यदि मंगल और बुध की युति हो तो वाग्मी, औषद्दि, शिल्प और शास्त्र में (या शिल्प शास्त्र में) कुशल होता है। वराहमिहिर के मत से मूल (नाल, पत्र, पुष्प, फल, वल्कल आदि), स्नेह (तैल, घृत, वसा, मज्जा-सम्प्रति, ग्रीज, वैसलीन, मोबिल आयल आदि भी) कूट (विविध द्दातुओं से मिश्रित जो वस्तुएं बनायी जाती हैं) आदि का व्यापार करता है और बाहु योद्धा (पहलवान, मल्ल कुश्ती लड़ने वाला) होता है। कूट से कूटनीतिज्ञ, सत्य, असत्य वचनों से अपना काम निकालने वाला जानना चाहिये, क्योंकि बुध वाणी का मुख्य कारक है। सारावली के अनुसार जातक की स्त्री अच्छी न हो, सोने, लोहे मशीनरी का काम करने वाला, दुष्ट स्त्री और विधवा जिसकी रखैल हो, तथा औषध क्रिया में निपुण (वैद्य, हकीम, डाक्टर, कम्पाउण्डर, केमिस्ट, ड्रगिस्ट, सर्जन आदि) होता है।
(2) यदि मंगल और बृहस्पति का योग हो तो कामी, पूज्य गुणान्वित और गणित शास्त्र का ज्ञानी होता है। वराहमिहिर के अनुसार मंगल सत्व तथा बृहस्पति (ज्ञान) के योग बल से नगर अध्यक्ष, सभासद, मेयर, पालिका चेयरमैन आदि हो, या राजा (या सरकार) से धन प्राप्त करता है। सारावली के मत से शिल्प, वेद तथा अन्य शास्त्रों में निष्णात् मेधावी, वाग्विशारद (वाणी-शूर), बुद्धिमान् और दीर्घायु, पुत्रवान् और विनीत होता है, किन्तु यदि यह युति लग्न से षष्ठ, अष्टम या द्वादश में हो तो व्यसनी, रोगी और कम धन, आलसी, निष्ठुर वाला हो।
(3) यदि मंगल और शुक्र एक साथ हो तो धातुओं (लोहा आदि) के कार्य में संलग्न, प्रपंच-रसिक (मायावी, सत्य असत्य का विचार न करने वाला) और कपटी होता है। वराहमिहिर के अनुसार गायों का पालन करने वाला, मल्ल (कुश्ती लड़ने वाला) शीघ्र कार्य-कर्त्ता कुशल, परदारा गमन में रूचिशील, जुआँ, सट्टा, रेस, लॉटरी, मटका आदि में रूपया लगान में अग्रणी होता है। पृथुयशस् के अनुसार जातक, चपल, स्त्री या स्त्रियों के वश में दुष्ट कर्म कर्ता होता है किन्तु यदि यह युति लग्न, चतुर्थ या दशम में हो तो वह अपने कुल की अपेक्षा अधिक उच्च स्थान प्राप्त करता है, या अपने ग्राम-शहर का नेता होता है।
(4) यदि मंगल और शनि की युति हो तो वादी, वकील, गान, विनोद, हँसी, मजाक, कौतुक का रचने वाला किन्तु प्रायः मन्दमति (बुद्धिमान कम) होता है। वराहमिहिर के अनुसार दुःख से पीड़ित, असत्य वाणी तथा मिथ्या व्यवहार शील तथा निन्दित होता है। सारावली के अनुसार धातु के कार्यों में कुशल, इन्द्रजाल में (जादूगरी) निपुण, धोखा देने वाला चोरी के कार्यों में चतुर, कलह प्रिय, शस्त्र या विष से पीड़ित, विधर्मी (अपने धर्म का पालन न करने वाला) होता है। पृथुयशस् के अनुसार मंगल और शनि की युति हो तो सदैव दुःखी (मानसिक या शारीरिक पीड़ायुक्त-विशेष कर वात और पित्त रोगों से) रहता है। किन्तु यदि यह युति लग्न से तृतीय, षष्ठ, दशम या एकादश भाव में हो तो विख्यात्, राजा के समान होता है और लोग उसे पसन्द करते हैं अर्थात् जन प्रिय होता है।
केन्द्र में योग
मंगल का अन्य ग्रहों के साथ यदि केन्द्र में योग हो तो सारावली में विशेष फल दिया गया है। अब मंगल का योग बुध, बृहस्पति, शुक्र या शनि के साथ केन्द्र में हो तो सारावली के अनुसार उसका फल नीचे है।
(1) मंगल और बुध की युति यदि लग्न में हो तो हिंसक (क्रूर, भयानक), अग्नि कर्म में कुशल (फैक्ट्री आदि जहाँ अग्नि का कार्य होता है) धातुओं का कार्य करने वाला, दूत, होता है और जो वस्तु गुप्त रखी जाती है, उनका अधिकारी होता है। यदि यह युति चतुर्थ में हो तो अपने परिवार जनों से निरादृत, तिरस्कृत, बन्धु-बान्धव से रहित या उनका विरोद्दी होता है किन्तु मित्र बहुत होते हैं और धन, अन्न, भोग-विलास, वाहन आदि से सम्पन्न होता है। यदि इन दोनों ग्रहों का योग लग्न से सप्तम में हो तो जातक की प्रथम स्त्री की मृत्यु या विच्छेद हो जाता है, विवाद प्रिय होता है, एक स्थान से दूसरे स्थान में जाता है। स्थायी रूप से एक स्थान में वास नहीं रहता, नीचों की मातहती, में काम करता है। यदि मंगल बुद्द युति दशम में हो तो सेना का अधिपति, शूर, शठ, दुष्ट स्वभाव, अति क्रूर होता है किन्तु द्दैर्य की मात्रा विशेष होती है, राजा का कृपा-पात्र होता है।
(2) यदि मंगल बृहस्पति की युति लग्न में हो तो मंत्री या अपने विशिष्ट गुणों के कारण प्रधान पद प्राप्त करे। सदैव उत्साही रहे और धार्मिक क्षेत्र में कीर्तियुक्त होता है। यदि इन दोनों ग्रहों की युति लग्न से चतुर्थ स्थान में हो तो जातक गुरू और देवताओं का भक्त होता है, राजा की सेवा करता है। बन्धु और मित्रों से सम्पन्न सुखी जीवन व्यतीत करता है। जिस जातक के सप्तम स्थान में मंगल बृहस्पति हो वह रण में शूरवीर होता है, पर्वत, किला, वन और नदी तट या समुद्र तट उसे प्रिय होते हैं। उसके अच्छे भाई-बन्धु होते हैं किन्तु पत्नी से कष्ट होता है अर्थात् (यह योग सप्तम में मंगल होने के कारण मंगलीक योग कारक है) पत्नी सुख के लिये हानिकारक है। यदि यह युति लग्न से दशम में हो तो विख्यात कीर्तिवाला हो, बहुत धनी और विस्तृत परिवार हो, कार्यों में बहुत दक्ष हो और राजा होता है।
(3) यदि मंगल और शुक्र की युति लग्न में हो तो जातक कुशील, निष्ठुर, नैतिकताहीन, वेश्यागामी होता है। दीर्घायु भी नहीं होता और स्त्रियों पर या स्त्रियों के लिये धन नष्ट करता है। यदि इन दोनों ग्रहों की युति चतुर्थ भाव में हो तो बन्धु पुत्र, और मित्रों से हीन होता है, मानसिक पीड़ा से कष्ट होता है। यदि इन दोनों ग्रहों का योग लग्न से सप्तम में हो तो स्त्री-लोलुप, कुचरित्रवान् आचारहीन होता है। स्त्रियों के कारण दुःख पाता है। यदि यह युति दशम में हो तो शस्त्र विद्या में निष्णात, बुद्धिमान, विद्या द्दन से युक्त, विख्यात पुरूष या राजमन्त्री होता है।
(4) यदि मंगल तथा शनि की युति लग्न में हो तो अल्पायु, (किन्तु मंगल या शनि लग्नाधिपति होकर लग्न में हो तो यह अशुभ दोष नहीं होगा यह बात ध्यान में रखना चाहिए), माता से द्वेष करता है, क्षीण भाग्य, संग्रामजयी होता है। यदि यह युति लग्न से चतुर्थ में हो तो पापकर्म में रत होता है। उसके स्वजन उसका त्याग कर देते हैं, मित्र नहीं होते, भोजन और सुख से रहित होता है अर्थात् सुखी नहीं होता। चतुर्थ भाव सुख स्थान है इस कारण क्रूर ग्रह की युति चतुर्थ स्थान में सुख की हानि करती है। यदि सप्तम में यह युति हो तो पत्नी के सुख से रहित, पुत्र के सुख से विरत, अल्प-धनी, रोगी, व्यसनी, कृपण, होता है।
बुध की अन्य ग्रहों से युति
बुध की सूर्य, चन्द्र या मंगल के साथ युति का फल पहले लिख चुकी हूँ। अब यदि बुध, बृहस्पति, शुक्र या शनि के साथ योग करे तो उसका फल कहते है।
(1) जातक पारिजात के अनुसार यदि बुध और बृहस्पति एक साथ हो तो जातक वाग्मी, सारपूर्ण वक्ता, स्वरूपवान्, सद्गुणी और विशेष धनी होता है। वराहमिहिर के अनुसार संगीत प्रिय नृत्य-प्रिय, रंगकर्मी, नाटक, सिनेमा आदि की वृत्ति से धनोपार्जन करने वाला होता है। सारावली के मत से जातक सुखी, विद्वान, मतिमान, गाने बजाने, नृत्य आदि का ज्ञाता होता है। पृथुयशस् के अनुसार बुध-बृहस्पति की युति से जातक बहरा, नेत्र रोग से पीड़ित, पर विद्वान होता है, यदि यह युति लग्न से छठे, आठवें या बारहवें घर में हो तो सुन्दर, धार्मिक और विख्यात् होता है।
(2) यदि बुध और शुक्र की युति हो तो शास्त्रज्ञ, गान, विनोद तथा हास्य का रसिक होता है। वराहमिहिर के अनुसार वाग्मी, व्यक्तियों के समूह का पालक होगा। रुद्रभट्ट के अनुसार यदि बुध और शुक्र दोनों बलवान् हो तो भूमि-पति या सेनापति होगा। सारावली के अनुसार जातक अतिशय धनी, नीतिज्ञ, शिल्पवान्, वेदों का विद्वान अच्छे सारपूर्ण और मधुर वचन बोलने वाला, गीतज्ञ, हंसी-मजाक में निपुण होता है।
(3) यदि बुध और शनि की युति हो तो विद्वान उच्च पदारूढ़, धार्मिक मायावी (मिथ्याचरण का आश्रय लेकर, दूसरों के मन में भ्रम पैदा करने वाला) और शास्त्रीय वृत्ति तथा लोक वृत्ति का उल्लंघन करने वाला होता है। सारावली के अनुसार जातक ऋणवान पाठान्तर से गुणवान् भी, दाम्भिक, प्रपंची, सत्कवि, घूमने का शौकीन, निपुण तथा मोहक वक्ता होता है।
केन्द्र में योग
(1) बुध-बृहस्पति युति यदि लग्न में हो तो शुभ स्वरूप, सौशील्यादि गुण सम्पन्न, विद्वान, राजाओं से सम्मानित, अनेक भोगों का भोक्ता, वाहन युक्त, सुखी और भोगी होता है। यदि यह युति चतुर्थ स्थान में हो तो राजा का कृपा पात्र, स्त्री मित्रों बन्धुओं से सम्पन्न, सौभाग्यशाली धनी और सुखी होता है। यदि बुध-बृहस्पति योग सप्तम में हो तो अच्छी पत्नी का स्वामी सत्व (साहस, पुरूषार्थ बल) सम्पन्न होता है, शत्रुओं पर विजय प्राप्त हो, धनी, बहुत परिजनों और मित्रों से युक्त और अपने पिता की अपेक्षा बहुत उच्च पद, मान-प्रतिष्ठा आदि में होता है। यदि इन दोनों ग्रहों की युति लग्न से दशम में हो तो राजा या मंत्री हो, उसका बहुत सम्मान हो, हुकूमत करे, धनी और विद्वान हो, उसकी बहुत ख्याति होती है।
(2) यदि बुध और शुक्र की युति लग्न में हो तो सुन्दर और स्वस्थ हो, ब्राह्मणों और देवताओं का भक्त हो, स्वयं विद्वान और राजा से सम्मानित होता है। ऐसा व्यक्ति विख्यात और प्रशंसनीय होता है। यदि यह युति लग्न से चतुर्थ में हो तो सुन्दर शरीर हो मित्र, पुत्र बन्धओं से युत हो। ऐसा व्यक्ति, कल्याण, सम्पन्न (शुभगुण, सम्पत्ति युक्त) राजा या राजा का मंत्री हो। यह युति सप्तम में होने से बहुत सी सुन्दर स्त्रियों से रति-सुख होता है।
(3) यदि बुध और शनि की युति लग्न में हो तो मलिन शरीर, पापी, विद्या, धन और वाहन से हीन, अल्पायु और मन्द भाग्य, होता है। चतुर्थ में यह युति होने से, भोजन पेय, तथा बन्धुओं से रहित मूढ़, स्वजनों से तिरस्कृत, पापकर्मी होता है उसके मित्र कम हों। सप्तम में यदि इन दोनों ग्रहों का योग हो तो अति मलिन होता है, न साधु होता है, न परोपकारी अर्थात दुष्ट होता है। मिथ्यावादी होता है, किन्तु इन दोनों ग्रहों का योग यदि लग्न से दशम में हो तो अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करे, ब्राह्मणों, गुरूओं तथा देवताओं में श्रद्धा रखे, स्वजनों तथा मित्रों से युक्त, वाहनों का स्वामी, धन से सम्पन्न होता।
बृहस्पति की अन्य ग्रहों की युति
अब बृहस्पति की शुक्र तथा शनि से युति का फल कहते हैं। बृहस्पति की अन्य ग्रहों से युति पहले लिख चुकी हूँ।
(1) जातक पारिजात के अनुसार यदि बृहस्पति और शुक्र की युति हो तो तेजस्वी, राजा का प्रिय, अत्यन्त बुद्धिमान् और शूरवीर होता है। वराहमिहिर के मत से जातक सज्जन, विद्वान् अनेक गुण सम्पन्न, धनी और पत्नी सुख सम्पन्न होता है। सारावली के अनुसार जातक की विशिष्ट (उत्कृष्ट धन कुलादि के कारण या सौन्दर्य सौशील्य विद्यादि गुण सम्पन्न) पत्नी हो, प्रामाणिक बात बोलने वाला और जिसमें विश्वास किया जा सके विशेष रूप से धार्मिक, विद्या से धन उपार्जन करने वाला होता है।
(2) यदि बृहस्पति और शनि एक साथ हों तो शिल्प शास्त्र में निपुण हो। वराहमिहिर के मत से नापित (नाई) का काम करने वाला, कुम्हार या अन्न दान कर्म तत्पर होता है। रुद्रभट्ट के अनुसार नाई या कुम्हार के काम में कुशल हो (शनि के संयोग से कर्म कुशलता दिखलायी और अन्न दान कर्म कर्तव्य से सद्गुणातिरेक कहा गया है।
सारावली के अनुसार जातक शूर धन समृद्ध, यशस्वी, श्रेणि, सभा, ग्राम, संघ आदि का प्रद्दान होता है। किसी कार्य विशेष के करने वालों के समुदाय को श्रेणि कहते हैं। पृथुयशस् के अनुसार यदि अनुपचय (लग्न, द्वितीय, चतुर्थ, पंचम, सप्तम, अष्टम, नवम या द्वादश) स्थान में बृहस्पति और शनि का योग हो तो मान और धन से हीन होता है।
केन्द्र में योग
लग्न, चतुर्थ, सप्तम या दशम, में बृहस्पति शुक्र या बृहस्पति शनि के युति का विशेष फल सारावली में कहा है। वह लिख रही हूँ।
(1) यदि बृहस्पति और शुक्र की युति लग्न में हो तो राजा के समान भूमि-पति होता है। चतुर्थ में यह युति होने से देव गुरू, द्विजों की अर्चना करता है। अपने कुटुम्बीजनों-आत्मीयों मित्रों से युक्त धन सम्पन्न होता है। उसके अनेक वाहन होते हैं और शत्रुओं को परास्त करता है। यदि बृहस्पति शुक्र का योग सप्तम में हो तो अच्छी पत्नी प्राप्त हो, धन और रत्नों का स्वामी, सुखी और भोगवान होता है, उत्कृष्ट वाहन (सवारी रथ, घोड़े, हाथी, पालकी सम्प्रति मोटर आदि) होते हैं और विख्यात होता है, (यह योग मेरे पिता जी की कुण्डली में स्पष्ट है, मगर नाम अवश्य प्रसिद्ध है, लेकिन धन-मोटर आदि के मामले में उत्कृष्ट तो नहीं कहा जा सकता, हाँ अपने कार्य-व्यापार के सिलसिले में जब वे अपने भक्तों आदि के साथ बाहर जाते हैं, तब तो एक से एक बड़े वाहन (यहाँ तक कि बी.एम.डब्ल्यू, मर्सिडीज, लैंड-क्रूजर, हवाई जहाज आदि तक का सुख काफी कुछ उन्हें मिलता है, हाँलांकि 1 मारूति 1 कॉन्टेसा 1 अम्बेसडर 1 फियेट, 1 रॉयल इन्फील्ड वे रख चुके हैं जिसमें वर्तमान् समय में 1 मारूति 1 कॉन्टेसा ही है, जिसमें कॉन्टेसा तो नगण्य ही मानी जायगी, का सुख भोगते हैं)। यदि यह युति दशम में हो तो बहुत से सेवक हों, अद्दिक सम्पन्न (द्दनी) हों, तथा गुण से समन्वित होता है।
(2) यदि बृहस्पति-शनि की युति लग्न में हो तो जातक मदयुक्त, आलसी, निष्ठुर, विद्वान, किन्तु खल होता है अल्प सुख प्राप्त करता है। यदि युति चतुर्थ स्थान में हो तो स्वास्थ्य उत्तम रहे, शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर अभ्युदय हो, बन्धु और मित्रों से युक्त हो। लोकप्रिय और सुखी हो। बृहस्पति और शनि सप्तम में हो तो देखने में आकर्षक न हो। ऐसा जातक शूरवीर किन्तु व्यसनी (दुर्व्यसन संलग्न) और दुष्ट होता है। पिता का धन प्राप्त करने का लोभी तथा बुद्धि रहित होता है। यदि यह युति लग्न से दशम में हो, राजा का प्रिय या स्वयं ही राजा हो, सन्तान थोड़ी हों किन्तु गायें और वाहन अनेक हों।
शुक्र और शनि की युति
जातक पारिजात के अनुसार शुक्र और शनि की यदि युति हो तो अनेक पशुओं का स्वामी और मल्ल (पहलवान) हो। वराहमिहिर के मत से अल्पदृष्टि हो (पास की वस्तु को बारीकी से देखना अल्पदृष्टि है) युवतियों के आश्रय से धन वृद्धि हो। लिपि (लिखना, नक्काशी आदि) पुस्तकों का तथा चित्रों का जानकार होता है। सारावली के मत से लकड़ी की चिराई फड़ाई में कुशल, छुरे (उस्तरे का काम हजामत आपरेशन आदि) चित्र पत्थर के शिल्प कार्य (संगतराशी, मूर्ति निर्माण कार्य) पहलवानी आदि में निपुण होता है।
केन्द्र योग
यदि शुक्र तथा शनि का योग केन्द्र में हो तो सारावली के अनुसार फल लिखती हूँ। यदि लग्न में इन दोनों ग्रहों की युति हो तो सुन्दर शरीर हो, द्दनवान भोगी और सुख के साधनों से समन्वित होता है। बहुत से भृत्य होते हैं, व्यभिचारी होता है। ऐसा जातक धन भोग आदि होने पर भी शोक से संतप्त होता है। यदि यह युति चतुर्थ में हो तो मित्रों से धन प्राप्ति हो, बन्धुओं से सत्कार, उपकार की प्राप्ति हो। राजा उसका सम्मान करता है। यह दोनों ग्रह यदि लग्न से सप्तम में हो तो जातक को विषय-लाभ, अनेक अच्छी स्त्रियों से सम्पर्क, सुख, धन, कीर्ति और विभूति प्राप्त होती है। यदि यह युति दशम में हो तो जातक सर्व दर्शन विमुक्त, लोक में विख्यात् उच्चपद प्राप्त करता है।
यह लेख लिखने में मैंने अपने पूज्य पिता जी द्वारा लिखे जा रहे ज्योतिष शास्त्र के महान ग्रन्थ ‘ज्योतिष ज्ञान दर्शन’ और पिता जी के गुरूवत् रहे ब्रह्मलीन त्रिष्कन्ध ज्योतिषाचार्य पं. सीताराम झा जी के द्वारा रचित ग्रन्थ मानसागरी और फलदीपिका तथा अन्य ग्रन्थों का सहारा ले कर लिखा है। आशा है कि इस पंचांग के पाठकों को यह पसन्द आयेगा, इस लेख पर अपने विचार/सुझाव आप astroworldindia.com@gmail.com या astroworldindia@hotmail.com पर भेज सकते हैं..... ऋद्धि विजय त्रिपाठी